मिथिलांचल की पहचान रही मखाना खेती अब पूर्वी चंपारण में नई उम्मीदों के साथ दोबारा जीवित होती नजर आ रही है। केंद्र सरकार द्वारा मखाने को जीआई टैग मिलने के बाद किसानों का रुझान इस पारंपरिक फसल की ओर बढ़ा है। लंबे समय से उपेक्षित यह खेती अब एक बार फिर किसानों के लिए आय और रोजगार का मजबूत जरिया बनती दिख रही है।
धनौती नदी क्षेत्र में फिर से शुरू हुई खेती
पूर्वी चंपारण जिले के बंजरिया प्रखंड स्थित धनौती नदी क्षेत्र, जहां कभी सन्नाटा पसरा रहता था, अब मखाने की खेती से गुलजार होने लगा है। यहां करीब 30 से 35 एकड़ में मखाना उत्पादन की शुरुआत की गई है। इस पहल को किसान सह बिहार राज्य मछुआरा आयोग के अध्यक्ष ललन कुमार सहनी ने आगे बढ़ाया है।
कठिन है मखाना उत्पादन की प्रक्रिया
मखाना की खेती आसान नहीं मानी जाती। यह फसल पानी के अंदर उगती है और इसके पौधों में नुकीले कांटे होते हैं। बीज निकालने की प्रक्रिया काफी जोखिम भरी और श्रमसाध्य होती है। इसके साथ ही कुशल मजदूरों की कमी भी एक बड़ी चुनौती है, क्योंकि इस काम में दक्ष श्रमिक अब बहुत कम रह गए हैं।

समय के साथ खत्म हो गई थी परंपरा
कभी चंपारण के तालाबों और नदियों में बड़े पैमाने पर मखाना उत्पादन होता था, लेकिन नदियों में गाद भरने और मजदूरों के पलायन के कारण यह परंपरा लगभग समाप्त हो गई। अब जीआई टैग मिलने के बाद हालात बदलते नजर आ रहे हैं और किसान फिर से इस खेती की ओर लौट रहे हैं।
बेहतर बाज़ार और बढ़ती आय की उम्मीद
जीआई टैग मिलने के बाद मखाने को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली है। किसानों को अब बेहतर बाज़ार और उचित मूल्य मिलने की उम्मीद है, जिससे उनकी आय में बढ़ोतरी संभव है।
रोजगार के अवसर बढ़े, मजदूरों की वापसी
मखाना खेती के पुनर्जीवित होने से स्थानीय स्तर पर रोज़गार के अवसर भी बढ़े हैं। जो मजदूर पहले काम की तलाश में दूसरे राज्यों में जाते थे, वे अब गांव लौटकर इस कार्य से जुड़ रहे हैं। इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिल रही है।

सरकार दे रही है सहयोग
जिला कृषि पदाधिकारी मनीष कुमार सिंह के अनुसार मखाना बोर्ड के गठन के बाद सरकार का लक्ष्य अधिक से अधिक किसानों को इस व्यवसाय से जोड़ना है। सरकार द्वारा अनुदान, प्रशिक्षण, कच्चे माल की सहायता और विपणन सहयोग भी उपलब्ध कराया जा रहा है।
स्थानीय पहल से दिख रहा सकारात्मक असर
ललन कुमार सहनी ने बताया कि जीआई टैग का प्रभाव अब स्पष्ट रूप से दिख रहा है। पहले मखाने का उचित मूल्य नहीं मिल पाता था, लेकिन अब किसानों में उत्साह बढ़ा है। उन्होंने धनौती नदी की सफ़ाई कर इस खेती को दोबारा शुरू करने की पहल की है और स्थानीय युवाओं को भी इससे जोड़ा जा रहा है।
नई पीढ़ी आगे बढ़ा रही परंपरा
स्थानीय मजदूर रामेश्वर चौधरी और मुनी सहनी का कहना है कि अब गांव में ही काम मिल रहा है। वहीं 70 वर्षीय रामबरण महतो बताते हैं कि उनके पूर्वज भी मखाना खेती से जुड़े थे और अब नई पीढ़ी इस परंपरा को आगे बढ़ा रही है।
भविष्य में बन सकता है बड़ा केंद्र
यदि यह पहल सफ़ल रहती है, तो आने वाले समय में पूर्वी चंपारण, मिथिलांचल के बाद मखाना उत्पादन का एक प्रमुख केंद्र बन सकता है। यह न केवल किसानों की आय बढ़ाएगा, बल्कि क्षेत्र की पारंपरिक पहचान को भी नई पहचान देगा।
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