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Bud chip technology in sugarcane farming: गन्ने की खेती में बडचिप तकनीक से घटेगी लागत, बढ़ेगी उपज और मुनाफ़ा

कृषि वैज्ञानिकों ने बताया कि कैसे बडचिप तकनीक से दूर होगी गन्ने की देरी से बुआई से जुड़ी समस्याएँ?

गन्ना विकास विभाग द्वारा उत्तर प्रदेश के 36 गन्ना बहुल जिलों में स्वयं सहायता समूह बनाए गए हैं। बडचिप तकनीक से ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं के लिए रोज़गार के अवसर बड़े हैं।

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गन्ने की फसल के लिहाज से अगर बात की जाए तो उत्तर प्रदेश देश में गन्ना उत्पादन करने वाला सबसे बड़ा राज्य है और देश के कुल रकबे का 46 फीसदी और कुल उत्पादन के 45 फीसदी के साथ देश में पहला स्थान रखता है। लेकिन गन्ने के प्रति एकड़ उत्पादन के मामले में  त्तर प्रदेश, तमिलनाडु, महाराष्ट्र और कर्नाटक  राज्यों से  काफी पीछे है।  जहां तमिलनाडु और महाराष्ट्र 35 से 40 टन प्रति एकड उत्पादन ले रहे हैं, वहीँ उत्तर प्रदेश सहित बिहार,हरियाणा, उतराखंड और पंजाब राज्य के किसान प्रति एकड़ 25 से 30 टन का उत्पादन ही ले  पा रहे हैं। प्रति एकड उत्पादन के हिसाब से लागत देखें तो ये इन दोनों ही क्षेत्रों में लगभग बराबर है। नतीजतन, उत्तर भारत के किसानों को गन्ने की खेती से कम लाभ मिल पाटा है।

उत्तर भारत के राज्यों में गन्ने की कम उपज के कारण

अब सवाल है कि उत्तर भारत के राज्यों में प्रति एकड़ गन्ना उत्पादन  कम क्यों है और इसे कैसे बढ़ाया जाय? इस पर गौर किया गया तो पाया गया कि उत्तर भारत के राज्यों में गन्ने की सबसे अधिक बुआई बसंतकाल में होती है। यहाँ के किसानों का  मानना है कि फरवरी मार्च का महीना, गन्ने की बुआई के लिए बेहद अनुकूल होता है। इस समय बोई गन्ने  की फसल से अच्छी पैदावार मिलती है,लेकिन अधिकतर किसान गन्ने की बुवाई फरवरी -मार्च की जगह आलू, सरसो और गेहूं की कटाई के बाद अप्रैल-मई के महीने में करते हैं। भारतीय गन्ना अनुसंधान संस्थान लखनऊ (आई आईएसआर) के शस्य  विज्ञान के प्रधान वैज्ञानिक डॉ शिव नरायन सिंह ने बताया कि इस वजह से गन्ने की बढ़वाई और विकास के लिए 7- 8 महीने की जगह 5- 6 महीने का ही समय मिल पाता है। अक्टूबर महीने से तापमान में गिरावट के काऱण गन्ना गुल्लियों का कम निर्माण और विकास  हो पाता है, और इसी वजह से गन्ने के उत्पादन में 30 से 35 फीसदी की गिरावट हो जाती है।

पुरानी तकनीकों को दरकिनार कर किसान अपनाएं गन्ने में बड चिप तकनीक

भारतीय गन्ना अनुसंधान संस्थान (Indian Institute of Sugarcane Research) के वैज्ञानिक डॉ सिंह ने किसानों को सलाह दी है कि गन्ने की खेती से लाभ लेने और इन सब समस्याओं से निजात पाने के लिए पुरानी तकनीकों को दरकिनार कर नई तकनीक सस्टेनेबल शुगरकेन इनोवेटिव (Sustainable Sugarcane Innovative) यानि बडचिप तकनीक (Bud Chip Technology) का इस्तेमाल किया जाता है। इससे गन्ने की देर से बुवाई वाली समस्या दूर हो जाएगी, खर्च बचेगा और ज़्यादा उपज मिलेगी। नतीजतन, किसानों को गन्ने की खेती से ज्यादा फायदा मिलेगा। आई आई एस आर (IISR) वैज्ञानिक ने कहा कि किसानों को मेहनत शुरू से करनी होती है, जिसमें पहली प्रक्रिया होती है खेतों में बीज डालना। इसमें किसान गन्ने की तीन आंख या दो आंख वाली  गुल्लियों के बीज बोते हैं। एक एकड़ खेत के लिए 25 से 30 कुन्तल गन्ना बीज की जरूरत पड़ती है, जबकि बड चिप विधि में एक एकड़ खेत में 80 से 100 किलो गन्ना बीज की ज़रुरत होती है।

इससे जाहिर है कि किसानों को गन्ने  बीज  में रूप में  लगने वाले खर्च में  99 फीसदी  की बचत हो रही है। गन्ने के बीज पर होने वाले खर्च में प्रति एकड़ से 8 से 10 हज़ार रुपये की बचत होगी। दूसरा, अधिकतर किसान गन्ने की बुवाई के लिए रबी फसलों की कटाई की इंतजार करते हैं। नतीजतन, फरवरी -मार्च की जगह अप्रैल-मई में देर से गन्ने की बुवाई करते है। इसकी जगह किसान छोटी सी जगह में जनवरी -फरवरी माह में बडचिप तकनीक से शेड नेट में गन्ने की नर्सरी पौध लगाते है, तो जब तक रबी फसलें कटाई की लिए तैयार होती हैं, नर्सरी में गन्ना पौध  45 से 60 दिन में फूट के तैयार हो जाती है। इस नर्सरी पौध को रबी फसलों की कटाई के बाद मुख्य खेत में रोपाई कर देते हैं। इससे गन्ने की  देरी से बुवाई से होने वाले नुकसान से बच सकते हैं ।

बडचिप तकनीक

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बड चिप तकनीक से गन्ने की पौध तैयार करने की तकनीक

कृषि वैज्ञानिक डॉ सिहं के अनुसार, बडचिप टेक्नीक में सबसे पहले बड चिप मशीन से गन्ने का बड यानी आंख निकालते हैं । इसके बाद बड को उपचारित कर प्लास्टिक ट्रे के बने खानों में रखते हैं। ट्रे के खानों को वर्मी कम्पोस्ट या कोकोपिट से भरते हैं। अगर किसान के पास वर्मी कम्पोस्ट और कोकोपिट उपलब्ध नही है तो सड़ी हुई पत्तियों का इस्तेमाल कर सकते हैं। ट्रे में बड की बुवाई करने के बाद फव्वारे  से समय समय पर हल्की सिंचाई करते हैं।

डॉ शिव नरायन सिंह के अनुसार,जब गन्ना नर्सरी की पौध चार से पांच सप्ताह की हो जाती है, ट्रे से नर्सरी पौध को सावधानी पूर्वक निकाल कर मुख्य खेत में निश्चित दूरी  पर रोपण किया जाता है। इस तकनीक में किसान गन्ने के बीच मे अन्तराशस्य फसलें  जैसे दलहनी, तिलहनी, सब्जी और नगदी फसलें  आसानी से उगाकर अतिरक्त लाभ भी ले सकते हैं ।

गन्ना विभाग किसानों को बड चिप तकनीक के लिए कर रहा है प्रोत्साहित

आशुतोष मधुकर, वरिष्ठ गन्ना विकास अधिकारी (एससीडीआई), उत्तर प्रदेश, गन्ना विकास विभाग, गोला लखीमपुर ने बताया कि गन्ना विकास विभाग द्वारा यूपी के 36 गन्ना बहुल जिलों में स्वयं सहायता समूह बनाए गए हैं। इन समूहों द्वारा बड चिप तकनीक का उपयोग करके गन्ने की नर्सरी पौध तैयार की जाती है। इस क्षेत्र के किसान इन समूहों से गन्ने की नर्सरी पौध खरीदते हैं और उन्हें अपने खेतों में लगाते हैं। इस विधि में गन्ने के पौधे को खेत में पौधे की लाईन से लाईन दूरी को 4 फीट और पौधे से पौधे की दूरी 1.5 फीट राखी जाती है। उन्होंने कहा कि गन्ना विभाग इस तकनीक को बढ़ावा देने के लिए काम कर रहा है क्योंकि इससे गन्ना किसानों को लागत बचाने और गेहूं और धान की कटाई के बाद सीधे खेत में गन्ना बोने से बेहतर उपज प्राप्त करने में मदद मिलती है।

गन्ने की नई बुवाई तकनीक अपनाकर स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं को रोज़गार प्रदान कर रहा है
गन्ने की नई बुवाई ‘बड चिप तकनीक’ स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं को रोज़गार प्रदान कर रहा है

गन्ने की खेती में बड चिप तकनीक अपनाने से खुश हैं किसान

उत्तर प्रदेश के जिला लखीमपुर खीरी के पहाड़पुर गांव के प्रगतिशील किसान किसान खुशदीप ने बताया कि उन्होंने वर्ष 2020 के अक्टूबर माह में जागृति महिला समूह के सदस्यों से 10 हजार बड चिप तकनीक से तैयार गन्ने के पौधे खरीदकर अपने खेतों में शरद कालीन खेती की।  गन्ने के लाइन से लाइन के बीच में सहफसली फसल के रूप में मटर की खेती से उन्हें अतिरिक्त आमदनी हुई। खुशदीप के अनुसार पौधों की संख्या पुरानी गन्ना तकनीक से 25 प्रतिशत अधिक है और पौधे की वृद्धि बहुत अच्छी होती है, इसलिए स्वाभाविक है कि गन्ने की पैदावार अधिक होगी। उन्होंने कहा कि, पुरानी तकनीक की तुलना में बुवाई की लागत में काफी कमी आई है।

गन्ना विकास विभाग की देखरेख में चलने वाले लखीमपुर खीरी ज़िले के पहाड़पुर गांव के जागृति महिला स्वयं सहायता समूह की सदस्य

गन्ना उत्पादकता में वृद्धि करते हुए बड चिप तकनीक से स्वरोजगार

एससीडीआई गोला आशुतोष मधुकर ने कहा कि छोटे किसान बड चिप तकनीक से सिंगल बड चिप से गन्ने की बुवाई के लिए नर्सरी की पौध तैयार कर उसे बेचकर आय अर्जित कर सकते हैं। इस कार्य को महिला उद्यमी भी अपना सकती हैं। गन्ना विकास विभाग महिला रोजगार सृजन कार्यक्रम के तहत गन्ने की नई बुवाई तकनीक अपनाकर स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं को रोज़गार प्रदान कर रहा है। गन्ना उत्पादकता में वृद्धि से महिला रोज़गार का सृजन हो रहा है।

गन्ना विकास विभाग की देखरेख में चलने वाले लखीमपुर खीरी ज़िले के पहाड़पुर गांव के जागृति महिला स्वयं सहायता समूह की सदस्य और कोषाध्यक्ष वरजीत कौर ने कहा कि उनके समूह ने वर्ष 2020-शरदकालीन सीजन में 1 लाख 25 हजार पौध और वर्ष 2021 के  वसंत सीजन  में 60 हजार पौध किसानों को बेचकर 2 लाख 77 हजार रुपये की आय अर्जित की। वरजीत कौर के मुताबिक, इस तकनीक से गन्ने का पौधा तैयार करने में महज एक रुपये का खर्च आता है।इस प्रकार समूह की महिलाओं को 92 हजार 500 रुपये की शुद्ध आय हुई।

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