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सिट्रोनेला की खेती: सस्ती लागत में महँगा सुगन्धित तेल पाने के लिए उगाएं Citronella, पाएँ ज़ोरदार कमाई

एक बार बोएँ और 5 साल तक 15 से 20 बार काटें सुगन्धित हरी घास सिट्रोनेला

सिट्रोनेला ऑयल की माँग बहुत तेज़ी से बढ़ रही है। भारत समेत कई देशों में सिट्रोनेला की व्यावसायिक खेती में तेज़ी से इज़ाफ़ा हो रहा है। इसीलिए परपरागत खेती से हटकर व्यावसायिक फसलों का रुख़ करने के इच्छुक किसानों के लिए सिट्रोनेला की खेती एक शानदार विकल्प बनकर फैल रहा है। ज़ाहिर है, किसानों की आमदनी बढ़ाने में सिट्रोनेला का तेल बेहद उपयोगी है।

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सिट्रोनेला एक बहुवर्षीय ‘एरोमेटिक’ यानी सुगन्धित घास है। इसकी पत्तियों से सुगन्धित तेल निकाला जाता है। ये कम लागत में ज़्यादा मुनाफ़ा देने वाली एक ऐसी व्यावसायिक फसल है जो भूमि सुधारक की भूमिका भी निभाती है। इस फसल में कीट और बीमारियों का प्रकोप बहुत कम होता है। सिट्रोनेला की घास से औसतन 1.2 प्रतिशत सुगन्धित तेल प्राप्त होता है। सिट्रोनेला की फसल एक बार लगाने के बाद पाँच साल तक इसके घास की अच्छी पैदावार और उससे पर्याप्त तेल मिलता रहता है। इसके बाद तेल की मात्रा घटने लगती है।

औद्योगिक और घरेलू इस्तेमाल के कारण सिट्रोनेला ऑयल की माँग बहुत तेज़ी से बढ़ रही है। भारत समेत कई देशों में सिट्रोनेला की व्यावसायिक खेती में तेज़ी से इज़ाफ़ा हो रहा है। इसीलिए परपरागत खेती से हटकर व्यावसायिक फसलों का रुख़ करने के इच्छुक किसानों के लिए सिट्रोनेला की खेती एक शानदार विकल्प बनकर फैल रहा है। ज़ाहिर है, किसानों की आमदनी बढ़ाने में सिट्रोनेला का तेल बेहद उपयोगी है।

सिट्रोनेला की खेती citronella oil citron grass farming
तस्वीर साभार: shopify

सिट्रोनेला ऑयल का इस्तेमाल

सिट्रोनेला की पत्तियाँ लेमनग्रास (नीम्बू घास) तथा जामारोजा जैसी होती हैं। हालाँकि, इनका आकार अपेक्षाकृत ज़्यादा चौड़ा और मोटा होता है। इसके जुट्ठे (clumps) अपेक्षाकृत ज़्यादा भरे, मोटे तथा फैले हुए होते हैं। सिट्रोनेला का सुगन्धित तेल इसकी पत्तियों से आसवन विधि से निकाला जाता है। इसका उपयोग साबुन, ऑडोमास, एंटीसेप्टीक क्रीम, ऑडोमास और सौन्दर्य प्रसाधनों के उत्पादन में किया जाता है। सिट्रोनेला के तेल में 32 से 45 प्रतिशत सिट्रोनिलेल, 12 से 18 प्रतिशत जिरेनियाल, 11 से 15 प्रतिशत सिट्रोनिलोल, 3.8 प्रतिशत जिरेनियल एसीटेट, 2 से 4 प्रतिशत सिट्रोनेलाइल एसिटेट, 2 से 5 प्रतिशत लाइमोसीन और 2 से 5 प्रतिशत एलमिसीन पाया जाता है।

सिट्रोनेला की खेती citronella oil citron grass farming
तस्वीर साभार: ICAR

भूमि सुधारक फसल भी है सिट्रोनेला

सिट्रोनेला को जावा सिट्रोनेला भी कहते हैं। इसका वानस्पतिक नाम सिम्बोपोगॉन विंटेरियनस (Cymbopogon winterianus Jowitt) है। यह सुगन्धित घासों वाले ‘पोएसी’ कुल की बहुवर्षीय घास है। व्यावसायिक के अलावा सिट्रोनेला एक भूमि सुधारक फसल भी है। इसीलिए उत्तर-पूर्वी राज्यों, पश्चिम बंगाल तथा देश के ऐसे इलाके जहाँ की ज़मीन का उपजाऊपन कम है, वहाँ के लिए भी सिट्रोनेला की खेती बेजोड़ साबित होती है। ख़ासकर, चाय बागानों को पुनर्जीवित करने के लिए भूमि सुधारक के रूप में सिट्रोनेला की खेती की जाती है।

सिट्रोनेला की व्यावसायिक खेती

भारत के अलावा चीन, श्रीलंका, ताईवान, ग्वाटेमाला, इंडोनेशिया जैसे देशों में सिट्रोनेला की खेती व्यावसायिक तौर पर होती है। देश में मुख्यतः असम, पश्चिम बंगाल, जम्मू-कश्मीर, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु, गोवा, केरल तथा मध्य प्रदेश में व्यापक स्तर पर सिट्रोनेला की व्यावसायिक खेती की जा रही है। भारत में सिट्रोनेला की खेती का रक़बा 8500 हेक्टेयर से ज़्यादा का है। देश में इसकी कुल पैदावार का 80 प्रतिशत उत्तर-पूर्वी राज्यों में होता है। फ़िलहाल, सिट्रोनेला के तेल का दाम 1200-1500 रुपये प्रति किलोग्राम है।

सिट्रोनेला की खेती citronella oil citron grass farming
तस्वीर साभार: ICAR

सिट्रोनेला के लिए भूमि और जलवायु

सिट्रोनेला की खेती के लिए 6 से 7.5 pH मान वाली दोमट तथा बलुई दोमट मिट्टी को उपयुक्त माना गया है। लेकिन इसे 5.8 तक pH मान वाली अम्लीय मिट्टी और 8.5 तक pH मान वाली क्षारीय मिट्टी वाले खेतों में इसे सफलतापूर्वक उगाया जा सकता है। सिट्रोनेला की खेती के लिए समशीतोष्ण और उष्ण जलवायु अच्छी मानी जाती है। यानी, ऐसे इलाके जहाँ तापमान 9 से 35 डिग्री सेल्सियस के बीच रहे, 200 से 250 सेंटीमीटर तक सालाना बारिश हो और हवा की नमी या आर्द्रता का स्तर 70 से 80 प्रतिशत तक रहता हो, वहाँ सेट्रोनेला की सफल खेती हो सकती है।

सिट्रोनेला के लिए खेत की तैयारी

सिट्रोनेला की फसल कम से कम 5 साल के लिए लगायी जाती है, इसीलिए इसकी उन्नत खेती के लिए खेत की तैयारी बहुत अच्छी होनी चाहिए। बुआई के लिए खेत को तैयार करते वक़्त दो-तीन बार आड़ी-तिरछी (क्रॉस) तथा गहरी जुताई करनी चाहिए। इसमें जुताई के समय ही प्रति हेक्टेयर 20 से 25 टन अच्छी तरह सड़ी हुई गोबर की खाद अथवा कम्पोस्ट डालनी चाहिए। फसल को दीमक से बचाने के लिए अन्तिम जुताई के समय खेत में प्रति हेक्टेयर 2 प्रतिशत मिथाइल पेराथियान पाउडर की क़रीब 20 किलोग्राम मात्रा भी बिखेरनी चाहिए। इसके अलावा नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटाश (NPK) की क्रमश: 160, 50, 50 किलोग्राम मात्रा भी प्रति हेक्टेयर देनी चाहिए।

सिट्रोनेला की प्रमुख प्रजातियाँ

जोर लेब सी-5: यह जावा सिट्रोनेला की सबसे नवीनतम किस्म है। इसे उत्तर-पूर्व विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी संस्थान, जोरहाट, असम ने सन् 2016 में विकसित किया गया। इससे सिट्रोनेला तेल की मात्रा क़रीब 1.2 प्रतिशत प्राप्त होती है।  तेल में सिट्रोनीलेल के स्तर क़रीब 35 प्रतिशत है। जबकि इसका BSI मानक 30 प्रतिशत से ज़्यादा का है।

जोर लैब सी-2: यह भी एक पुरानी विकसित किस्म है। इसमें तेल की मात्रा लगभग 0.9 प्रतिशत है। इसे भी उत्तर-पूर्व विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी संस्थान, जोरहाट ने ही विकसित किया था।

BIO-13: यह सबसे पुरानी किस्म है। इसमें तेल की मात्रा लगभग 0.9 से 1.8 प्रतिशत तक मिलती है और इसमें सिट्रोनीलेल रसासन की मात्रा क़रीब 35 से 38 प्रतिशत तक होती है।

सिट्रोनेला की खेती citronella oil citron grass farming
तस्वीर साभार: shivarnews24

सिट्रोनेला की बुआई के लिए बीज

सिट्रोनेला की बुआई रूट स्लिप्स से की जाती है। एक रूट स्लिप का मूल्य 25 से 50 पैसे बैठता है। एक साल या ज़्यादा पुरानी फसल से जुट्ठों को निकालकर हरेक स्लिप्स को अलग करते हैं और फिर इसके पत्तों को काटकर बुआई वाली स्लिप्स तैयार करते हैं। सभी स्लिप्स की बुआई सफल नहीं होती। आमतौर पर 80 प्रतिशत स्लिप्स का ही जमाव हो पाता है। क़रीब 20 प्रतिशत स्लिप्स मर जाती हैं। इसीलिए खाली बची जगह पर फिर से नयी स्लिप्स की बुआई करनी चाहिए।

सिट्रोनेला की बुआई और सिंचाई

सिट्रोनेला की बुआई के लिए जुलाई-अगस्त अथवा फरवरी-मार्च का समय बेहतरीन होता है। स्लिप्स को खेत में 5 से 8 इंच गहराई पर लगाते हैं। इनके बीच की दूरी 60X45 सेंटीमीटर रखनी चाहिए। बुआई के बाद पहली सिंचाई करनी चाहिए। बुआई के 2 सप्ताह के भीतर स्लिप्स से पत्तियाँ निकलनी शुरू हो जाती हैं। सिट्रोनेला की प्रकृति शाकीय है। इसकी जड़ें ज़्यादा गहरी नहीं होतीं। इसीलिए इसे सालाना 10-12 सिंचाई की ज़रूरत होती है। गर्मी में 10 से 15 दिनों पर तथा सर्दियों में 20-30 दिनों बाद सिंचाई लाभप्रद है। वैसे सिंचाई का नाता मिट्टी की प्रकृति से भी होता है इसीलिए बारिश के दिनों में सिंचाई नहीं करें और खेत को जल भराव से बचाते रहें।

सिट्रोनेला की फसल की निराई-गुड़ाई

सिट्रोनेला के खेत में फसल रोपाई के पहले 30 से 45 दिनों तक खतपतवार नहीं पनपने देना चाहिए। इससे बचने के लिए निराई-गुड़ाई ज़रूरी है। निराई-गुड़ाई का काम हरेक कटाई के बाद भी करना चाहिए। खरपतवार की रासायनिक रोकथाम के लिए 200 लीटर पानी के साथ 250 ग्राम ओक्सोफ्लुरोलीन का घोल बनाकर छिड़काव करना चाहिए। इस छिड़काव को सिट्रोनेला के पौधों की बुआई से पहले भी करना चाहिए।

सिट्रोनेला की इंटरक्रॉपिंग, रोग और कीट

सिट्रोनेला की फसल में कीट और बीमारियों का प्रकोप बहुत कम नज़र आता है। फिर भी इसके प्रमुख रोग और हानिकारक कीट-पतंगे का पहचनना और सही वक़्त पर उनका उपचार करना ज़रूरी है। सिट्रोनेला की गन्ध से माहू समेत अन्य कीट-पतंगे बोई गयी दूसरी फसलों को नुकसान नहीं पहुँचाते हैं और किसान को पूरी पैदावार प्राप्त होती है। सिट्रोनेला को मक्का, सरसों और मसूर के साथ इंटरक्रॉपिंग करके लगाया जा सकता है। इससे किसानों को चार फसलों का लाभ मिल सकता है।

तना छेदक कीड़ा: सिट्रोनेला की फसल पर तना छेदक कीट का प्रकोप अप्रैल से जून में होता है। ये कीट सिट्रोनेला के तने से लगी पत्तियों पर अंडा देते हैं। वहाँ से इनकी सूंडियाँ तने के मुलायम भाग में दाख़िल हो जाती हैं। इससे पौधों की पत्तियाँ सूखने लगती हैं और उनकी वृद्धि रुक जाती है। सूखे पौधों को उखाड़ने पर उनके निचले भाग में सड़न तथा छोटे-छोटे कीट भी दिखते हैं। इसे ‘डेड हर्ट’ कहते हैं। इससे छुटकारा पाने के लिए निराई-गुड़ाई के बाद 10 से 15 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से कार्बोफ्यूरॉन 3-G का छिड़काव करना चाहिए।

पत्तों का पीला पड़ना (लीथल येलोइंग): पत्तियों का पीला पड़ना अथवा लीथल येलोइंग, इस फसल में एक प्रमुख समस्या है। इसके समाधान के लिए फेरस सल्फेट तथा अन्त:प्रवाही कीटनाशकों का छिड़काव करना आवश्यक है।

लीफ़ ब्लास्ट अथवा झुलसा रोग: बरसात के मौसम में सिट्रोनेला के पौधों पर कुरखुलेरिया एंडोपोगनिस नाम फफूँदी का प्रकोप भी प्रायः दिखायी देता है। इससे पौधे के पत्ते सूखने के साथ-साथ काले पड़ जाते हैं। इससे बचाव के लिए फफूँदीनाशक डायथेन M-45 का छिड़काव 20 से 25 दिन के अन्तराल पर करना चाहिए।

सिट्रोनेला की खेती citronella oil citron grass farming
तस्वीर साभार: eol

सिट्रोनेला घास की कटाई और पैदावार

सिट्रोनेला की फसल बुआई के क़रीब 120 दिनों बाद कटाई के लिए तैयार हो जाती है। फसल की कटाई भूमि से क़रीब 15 से 20 सेंटीमीटर ऊपर से करनी चाहिए। पहली कटाई के बाद 90 से 120 दिनों में आगामी कटाईयाँ भी की जा सकती हैं। इस तरह 5 साल तक सालाना 3 से 4 फसलें ली जा सकती हैं। फसल में सिट्रोनेला के तेल की मात्रा पहले साल के मुक़ाबले आगामी वर्षों में काफ़ी बढ़ जाती है। ये तीसरे, चौथे तथा पाँचवें साल में तकक़रीब एक जैसी रहती है। लेकिन पाँचवें साल के तेल की मात्रा घटने लगती है।

सिट्रोनेला की खेती में पहले साल प्रति हेक्टेयर 150-200 किलोग्राम तथा दूसरे से पाँचवें साल तक 200-300 किलोग्राम हरी पत्तियाँ प्राप्त होती हैं। प्रति सौ किलोग्राम पत्तियों के आसवन से 800 मिलीलीटर सिट्रोनेला का तेल निकलता है। अन्य एरोमेटिक पौधों की तरह सिट्रोनेला की पत्तियों से भी वाष्प आसवन विधि से ही सुगन्धित तेल निकाला जाता है। आसवन संयंत्र की प्रक्रिया 3 से 4 घंटे में पूरी होती है। यदि तेल की गुणवत्ता केन्द्रीय औषधीय और सुगन्ध पौधा संस्थान, लखनऊ (CSIR-CIMAP) तथा सुगन्ध और सुरस विकास केन्द्र, कन्नौज जैसी प्रयोगशालाओं से प्रमाणित हो तो दाम सबसे ज़्यादा मिलता है। तेल निकालने के बाद सिट्रोनेला की पत्तियों का इस्तेमाल खेतों में मल्चिंग के रूप में भी किया जाता है। इससे कीड़े-मकोड़ों, खरपतवार और नमी संचय में मदद मिलती है।

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