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देश में कृषि को मज़बूत और आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। इसी क्रम में डॉ. मांगी लाल जाट ने करनाल स्थित ICAR के प्रमुख संस्थानों का दौरा कर वहां चल रहे शोध और विकास कार्यों की समीक्षा की। यह दौरा भारतीय कृषि को भविष्य की चुनौतियों के लिए तैयार करने के उद्देश्य से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
आत्मनिर्भर कृषि और विकसित भारत की दिशा में पहल
इस दौरान डॉ. मांगी लाल जाट ने बताया कि भारत अब केवल खाद्य सुरक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि वैश्विक स्तर पर भी अपनी भूमिका निभाने के लिए तैयार है। उन्होंने कहा कि इस साल देश में गेहूं उत्पादन बेहतर रहने की उम्मीद है, जिससे घरेलू ज़रूरतों के साथ-साथ अन्य देशों की मदद भी की जा सकेगी।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि ICAR का फ़ोकस अब जलवायु अनुकूल और पोषण से भरपूर फ़सलों के विकास पर है, ताकि किसानों की आय बढ़े और लोगों को बेहतर पोषण मिल सके।
जलवायु अनुकूल खेती पर ज़ोर
करनाल में अपने दौरे के दौरान डॉ. मांगी लाल जाट ने जलवायु परिवर्तन को ध्यान में रखते हुए खेती के नए मॉडल पर विशेष ज़ोर दिया। उन्होंने कहा कि अब खेती को इस तरह विकसित करना ज़रूरी है, जिससे कम संसाधनों में अधिक उत्पादन मिल सके।
ICAR द्वारा किए जा रहे शोध में ऐसे समाधान विकसित किए जा रहे हैं, जो जलवायु के उतार-चढ़ाव के बावजूद फ़सल उत्पादन को स्थिर बनाए रख सकें।
कम लागत और ज़्यादा उत्पादन की दिशा में काम
डॉ. मांगी लाल जाट ने बताया कि नई तकनीकों के जरिए खेती में लागत कम करने पर भी विशेष ध्यान दिया जा रहा है। BNI जैसी तकनीक की मदद से उर्वरकों के उपयोग को 25 प्रतिशत तक कम किया जा सकता है, जिससे किसानों को सीधा लाभ मिलेगा।
इसके साथ ही यह तकनीक पर्यावरण के लिए भी बेहतर है, क्योंकि इससे मिट्टी और पानी पर पड़ने वाला दबाव कम होता है।
कंजरवेशन एग्रीकल्चर से मिल रहे बेहतर परिणाम
ICAR द्वारा करनाल में चल रहे कंजरवेशन एग्रीकल्चर प्रोजेक्ट ने अच्छे परिणाम दिए हैं। इस बारे में डॉ. मांगी लाल जाट ने बताया कि इन तकनीकों से सिंचाई के पानी की खपत में 85 प्रतिशत तक कमी आई है।
इसके अलावा उर्वरक उपयोग में 28 प्रतिशत की कमी, ईंधन की खपत में 51 प्रतिशत की बचत और फ़सल अवशेष जलाने में 95 प्रतिशत तक कमी दर्ज की गई है। यह बदलाव खेती को अधिक टिकाऊ और पर्यावरण के अनुकूल बना रहे हैं।
किसानों की आय में बढ़ोतरी
इस परियोजना का सबसे बड़ा फ़ायदा किसानों को मिला है। डॉ. मांगी लाल जाट के अनुसार, इन तकनीकों के इस्तेमाल से खेती की उत्पादकता में 33 प्रतिशत तक वृद्धि हुई है और किसानों की आय लगभग दोगुनी हो गई है।
यह दिखाता है कि वैज्ञानिक शोध का सही उपयोग खेतों तक पहुंचने पर किसानों की स्थिति में बड़ा सुधार ला सकता है।
मिट्टी की सेहत में सुधार
डॉ. मांगी लाल जाट ने बताया कि पिछले 15 वर्षों में इन तकनीकों के इस्तेमाल से मिट्टी की गुणवत्ता में भी सुधार हुआ है। मिट्टी में जैविक कार्बन और सूक्ष्म जीवों की संख्या में वृद्धि हुई है, जिससे फ़सल उत्पादन बेहतर हुआ है।
यह कदम देश के कार्बन न्यूट्रल लक्ष्य और पर्यावरण संरक्षण के लिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
गेहूं की नई किस्मों पर काम
दौरे के दौरान डॉ. मांगी लाल जाट ने गेहूं से जुड़ी कई महत्वपूर्ण परियोजनाओं की भी समीक्षा की। उन्होंने बताया कि देश में गेहूं की बीमारियों से बचाव के लिए एक मज़बूत निगरानी प्रणाली तैयार की गई है, जिससे समय पर किसानों को जानकारी मिलती है।
इसके साथ ही नई किस्मों के विकास पर भी काम किया जा रहा है, जो सूखा, गर्मी और अन्य बीमारियों को सहन करने में सक्षम हों।
बायोफोर्टिफाइड किस्मों से पोषण सुरक्षा
डॉ. मांगी लाल जाट ने यह भी बताया कि ICAR ने अब तक 55 बायोफोर्टिफाइड गेहूं किस्में विकसित की हैं, जिनमें आयरन, जिंक और प्रोटीन की मात्रा अधिक होती है। आज देश में लगभग 45 प्रतिशत क्षेत्र में इन किस्मों की खेती की जा रही है, जो पोषण सुरक्षा की दिशा में एक बड़ा कदम है।
जौ की खेती को भी मिल रहा बढ़ावा
गेहूं के साथ-साथ जौ की खेती पर भी ध्यान दिया जा रहा है। डॉ. मांगी लाल जाट ने बताया कि जौ एक ऐसी फ़सल है, जो कम पानी और कम उर्वरक में भी अच्छी पैदावार देती है। इसकी मांग खाद्य, पशु चारा और उद्योगों में बढ़ रही है, जिससे यह किसानों के लिए एक अच्छा विकल्प बन रही है।
तकनीक और शोध से बदलेगा खेती का भविष्य
इस दौरे के जरिए डॉ. मांगी लाल जाट ने साफ़ किया कि कृषि का भविष्य विज्ञान और तकनीक से ही तय होगा। उन्होंने कहा कि ICAR का उद्देश्य किसानों को नई तकनीकों से जोड़ना और उनकी आय बढ़ाना है। वैज्ञानिक शोध को खेतों तक पहुंचाने से न केवल उत्पादन बढ़ेगा, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था भी मज़बूत होगी।
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