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कोरोना की मौजूदा लहर का किसान आन्दोलन पर क्या असर पड़ेगा?

तमाम कोशिशों के बाद भी सीमित बनकर ही रह गया किसान आन्दोलन

आन्दोलन में शामिल किसानों को मंज़िल की कोई झलक नहीं मिल रही। करीब तीन महीने से बातचीत के मोर्चे पर भी कोई प्रगति नहीं हुई। सरकार ने कृषि क़ानूनों से पीछे हटने का कोई संकेत नहीं दिया। इसीलिए किसानों में अब आन्दोलन को जारी रखने को लेकर नाउम्मीदी भी बढ़ रही है। आन्दोलनकारियों को विरोध प्रदर्शन जारी रखने के लिए फंड की भी दिक्कत हो रही है। शुरुआत में किसान संगठनों के चन्दे के अलावा कुछ एनजीओ और प्रवासी भारतीयों की ओर से आयी मदद भी अब ख़त्म होने को है। इस तरह सारा किसान आन्दोलन प्रतीकात्मक बनता जा रहा है।

क्या कोरोना की मौजूदा लहर को देखते हुए बीते पाँच महीने से दिल्ली के गाज़ीपुर बॉर्डर, टिकरी बॉर्डर, सिंघु बॉर्डर और कुंडली बॉर्डर पर जारी किसान आन्दोलन को सरकार ज़बरन ख़त्म करवा देगी? तीन-चार दिनों से सत्ता के गलियारों में ऐसी सुगबुगाहट थी कि दिल्ली की सीमाओं पर डटे थोड़े से किसानों को उनके घरों को भेज प्रदर्शन स्थलों को खाली करवा दिया जाएगा। इसके लिए केन्द्रीय गृह मंत्रालय और हरियाणा सरकार के बीच सहमति बनने की बातें भी सरगर्मी में रहीं।

संयुक्त किसान मोर्चा का क्या है रुख?

सरकार की मंशा की भनक संयुक्त किसान मोर्चा के नेता राकेश टिकैत के उस ताज़ा बयान से भी मिली जिसमें उन्होंने गाज़ीपुर बॉर्डर स्थित किसान धरना स्थल पर कहा था कि ‘बॉर्डर अब किसानों का गाँव जैसा बन गया है। यहाँ से किसानों को हटाने की हर कोशिश नाकाम होगी। चाहे लॉकडाउन हो या कर्फ़्यू लगाया जाए, आन्दोलनकारी किसान दिल्ली की सीमाओं से वापस नहीं लौटेंगे। जब तक तीनों कृषि क़ानूनों को वापस नहीं लिया जाता और MSP क़ानून नहीं बना दिया जाता तब तक किसान आन्दोलन जारी रहेगा।’

टिकैत पहले भी कहते रहे हैं कि आन्दोलन अगर पूरे साल चलाना पड़े तो भी किसान वापस नहीं लौटेंगे। उधर, संयुक्त किसान मोर्चा ने अपने आन्दोलन को लेकर एक बार फिर अपना रुख़ साफ़ किया है। मोर्चा की ओर से कहा गया है कि आन्दोलनकारी किसान सरकार की ओर से जारी कोविड 19 गाइडलाइंस का पूरी तरह से पालन कर रहे हैं।

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आन्दोलन ख़त्म करने के लिए मानवता की दुहाई

राकेश टिकैत के तेवरों से पहले हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने आन्दोलनकारी किसानों से कहा था कि कोरोना की भयावहता को देखते हुए किसानों को अपना आन्दोलन खत्म कर देना चाहिए। जब स्थिति सुधर जाएगी तो वो अपना आन्दोलन फिर से कर सकते हैं क्योंकि लोकतंत्र में शान्तिपूर्वक प्रदर्शन करने का सभी को अधिकार है। उन्होंने मानवता के आधार पर आन्दोलन खत्म करने की अपील की। इसके बाद उपायुक्तों को किसानों से बात करके उन्हें समझाने-मनाने को भी कहा गया। कयास लगा कि अब शायद हरियाणा सरकार की ओर से किसानों से सीधी बात की जाएगी और यदि फिर भी किसानों ने धरनास्थल खाली नहीं किया तो फिर न्यूनतम बल प्रयोग के ज़रिये उन्हें हटा दिया जाएगा।

दिल्ली बॉर्डर पर कम होते जा रहे हैं किसान

17 अप्रैल तक दिल्ली बॉर्डर पर आन्दोलनकारी किसानों ने सद्भावना मिशन का आयोजन किया। उन्होंने 18 अप्रैल को सद्भावना दिवस के रूप में मनाने की घोषणा कर रखी है। ये सद्भावना बॉर्डर पर महीनों से जुटे आन्दोलनकारी किसानों की स्थानीय लोगों के प्रति है।

आन्दोलनकारी किसानों की ओर से ये महसूस किया जा रहा है कि स्थानीय लोगों को अपने रोज़मर्रा के काम, आवाजाही और व्यापार-कारोबार में प्रदर्शन के कारण परेशानियाँ हो रही हैं, जिससे किसान आन्दोलन को उनका समर्थन घटता जा रहा है। दूसरी ओर, इसे सरकार की ओर से धरनास्थल खाली कराने की सम्भावित कार्रवाई को देखते हुए स्थानीय समर्थन जुटाने के कदम के रूप में भी देखा जा रहा है।

दिल्ली बॉर्डर पर जुटे किसानों की संख्या नवम्बर से फरवरी की तुलना में मार्च-अप्रैल में न सिर्फ़ काफ़ी कम रही बल्कि एक चौथाई रह गयी है। मार्च-अप्रैल की गतिविधियों में संयुक्त किसान मोर्चा की अपेक्षा के मुताबिक किसान नहीं जुटे। किसान नेताओं ने घोषणा की थी कि जिन किसान परिवारों के सदस्य दिल्ली बॉर्डर पर हैं, उनके खेतों की गेहूँ कटाई किसानों की ग्राम कमेटियाँ करेंगी, लेकिन इस घोषणा को ज़मीन पर नहीं उतारा जा सका।

किसानों को चिन्ता थी कि यदि वक़्त पर गेहूँ की कटाई नहीं हुई तो फिर उन्हें ख़ासा नुकसान होगा। कटाई के अलावा उपज को मंडी में बेचने का भी यही सीज़न है। इसलिए आन्दोलन में किसानों की संख्या कम होती गयी।

दूसरी ओर, आन्दोलन में शामिल किसानों को मंज़िल की कोई झलक नहीं मिल रही। करीब तीन महीने से बातचीत के मोर्चे पर भी कोई प्रगति नहीं हुई। सरकार ने कृषि क़ानूनों से पीछे हटने का कोई संकेत नहीं दिया। इसीलिए किसानों में अब आन्दोलन को जारी रखने को लेकर नाउम्मीदी भी बढ़ रही है। आन्दोलनकारियों को विरोध प्रदर्शन जारी रखने के लिए फंड की भी दिक्कत हो रही है। शुरुआत में किसान संगठनों के चन्दे के अलावा कुछ एनजीओ और प्रवासी भारतीयों की ओर से आयी मदद भी अब ख़त्म होने को है। इस तरह सारा किसान आन्दोलन प्रतीकात्मक बनता जा रहा है।

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राष्ट्रीय विरोध में नहीं बदल पाया आन्दोलन

छह सौ से ज़्यादा किसान संगठनों में बँटे देश भर के किसानों को मौजूदा आन्दोलन एकजुट नहीं कर सका और सिर्फ़ पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों की आवाज़ बनकर ही सीमित रह गया। हालाँकि किसान नेताओं ने पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल क्षेत्र, मध्य प्रदेश, उत्तराखंड, राजस्थान आदि का दौरा करके इसे व्यापक बनाने की कोशिश की लेकिन आन्दोलन के विस्तार की रणनीति को ख़ास सफलता नहीं मिली।

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