पंजाब के आढ़तियों ने क्यों किया 10 मार्च से बेमियादी हड़ताल का एलान?

आदेश में पंजाब सरकार से कहा है कि वो किसानों को उनकी फ़सल की ख़रीद का भुगतान सीधा उनके बैंक खातों में ही करने का इन्तज़ाम करे। इसके अलावा अनाज ख़रीद पोर्टल पर फ़सल बेचने वाले किसानों की ज़मीन के मालिकाना हक़ यानी ज़माबन्दी का भी ब्यौरा दे। ताकि आढ़तियों से ख़रीदारी करने वाला भारतीय खाद्य निगम (FCI) ज़मीन के ब्यौरे का सत्यापन कर सके।

farmer protest MSP

गेहूँ की कटाई सीज़न के मौसम से ऐन पहले पंजाब में एशिया की सबसे बड़ी खन्ना अनाज मंडी के आढ़तियों ने केन्द्र सरकार के एक आदेश के विरोध में 10 मार्च से अनिश्चितकालीन हड़ताल पर जाने का फ़ैसला किया है। केन्द्रीय खाद्य एवं आपूर्ति मंत्रालय की ओर से जारी ताज़ा आदेश में पंजाब सरकार से कहा है कि वो किसानों को उनकी फ़सल की ख़रीद का भुगतान सीधा उनके बैंक खातों में ही करने का इन्तज़ाम करे।

इसके अलावा अनाज ख़रीद पोर्टल पर फ़सल बेचने वाले किसानों की ज़मीन के मालिकाना हक़ यानी ज़माबन्दी का भी ब्यौरा दे। ताकि आढ़तियों से ख़रीदारी करने वाला भारतीय खाद्य निगम (FCI) ज़मीन के ब्यौरे का सत्यापन कर सके। केन्द्र सरकार ने कहा कि ऐसी व्यवस्था को क़ानूनी जामा पहनाने के लिए पंजाब सरकार अपने Agricultural Produce Market Committee Act, 1961 (APMC Act) में भी आगामी ख़रीदारी को शुरू करने से पहले बदलाव करे।

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अभी क्या है व्यवस्था?

पंजाब में मौजूदा व्यवस्था के तहत अभी आढ़तियों के माध्यम से किसानों को उनकी बेची गयी उपज का भुगतान किया जाता है। आढ़तियों के पास ऑनलाइन या चैक के ज़रिये भुगतान का विकल्प रहता था। दरअसल, किसान अपनी उपज को आढ़तियों के बेचते हैं और आढ़तियों से ही राज्य या केन्द्र सरकार अपने-अपने कोटे की ख़रीदारी करके भारतीय खाद्य निगम (FCI) को बेचते हैं। बदले में राज्य या केन्द्र की ओर से न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) आढ़तियों को भुगतान किया जाता है। फिर आढ़तिये किसानों को बिक्री का मूल्य देते हैं।

अब क्या बदलाव होगा?

अब केन्द्र सरकार चाहती है कि पंजाब सरकार सीधे किसानों के खाते में उनकी रकम डाले। यानी, आढ़तिया को भुगतान की चेन से बाहर निकलना होगा। दूसरी ओर, औरों की ज़मीन पर खेती करके मंडी में उपज बेचने वाले किसान अपनी ज़मीन का रिकार्ड नहीं दे सकते, क्योंकि सरकारी दस्तावेज़ों में वो ज़मीन के मालिक तो होते ही नहीं हैं। अलबत्ता, खेती-किसानी का अहम दारोमदार इसी तबके पर होता है। इस तबके को आढ़तियों से काफ़ी सहारा था, क्योंकि इनकी ज़मीन के मालिकाना हक़ से आढ़तियों का कोई वास्ता नहीं होता है।

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क्यों मचा आढ़तियों में कोहराम?

जब आढ़तियों को केन्द्र सरकार के नये फ़रमान का पता चला तो उनमें कोहराम मच गया। इसके बाद आढ़तियों के अलग-अलग एसोसिएशन्स ने बैठकें की और बेमियादी हड़ताल पर जाने की घोषणा कर दी। आढ़तिये इस बात से भी ख़फ़ा हैं कि पंजाब सरकार ने कथित रूप से भरोसा दिलाया है कि गेहूँ के आगामी ख़रीद सीज़न से ही केन्द्र सरकार का आदेश लागू कर दिया जाएगा। माना जा रहा है कि किसानों को सीधे भुगतान का मुद्दा पंजाब सरकार के परेशानी का सबब बन सकता है।

अभी फसल की कटाई के बाद किसान उपज को अपने आढ़ती के पास लाते हैं। आढ़ती के यहाँ उपज की सफ़ाई वग़ैरह करने के बाद अनाज को FCI के हवाले किया जाता है, जो आढ़तियों के बिल का भुगतान करता है। पमेंट पाने के बाद आढ़तियों की ओर से किसानों के खातों में ऑनलाइन अदायगी की जाती है। तीन साल पहले APMC में संशोधन करके अमरिन्दर सिंह सरकार ने ऐसी ही व्यवस्था बनायी थी।

अकाली-भाजपा गठबन्धन सरकार के वक़्त भी चंडीगढ़ हाई कोर्ट ने किसानों को चेक से भुगतान करने का आदेश दिया था। तब भी आढ़तियों ने इसका पुरज़ोर विरोध किया था तो तत्कालीन मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल ने बीच का रास्ता निकाला कि यह फैसला किसानों पर छोड़ना चाहिए कि वो सरकारी एजेंसी से भुगतान लेना चाहते हैं या आढ़ती से।

आढ़तियों का केन्द्र पर आरोप

अब पंजाब आढ़ती एसोसिएशन्स के नेताओं रविन्दर सिंह चीमा और विजय कालरा का आरोप है कि केन्द्र सरकार का ताज़ा फ़रमान, किसानों और आढ़तियों की एकता को तोड़ने के मकसद के लाया गया है क्योंकि कृषि क़ानूनों के विरोध में चल रहे आन्दोलन को आढ़तियों का पूरा समर्थन हासिल है।

इससे पहले 5 मार्च को विधानसभा में गरमाये इसी मुद्दे पर आम आदमी पार्टी के विधायक अमन अरोड़ा ने कहा कि इस साल पंजाब में 24 हज़ार करोड़ रुपये की गेहूँ की ख़रीदारी होनी है। ऐसे में जो लोग ठेके पर ज़मीन लेकर खेती करते हैं, उन्हें पेमेंट कैसे होगी? वो ज़माबन्दी का ब्यौरा कैसे देंगे? इससे तो असली किसान और मंडियों का सिस्टम दोनों तबाह होंगे। उन्होंने समस्या का समाधान निकालने के लिए सदन की एक ख़ास समिति बनाने की भी माँग की। हालाँकि, पंजाब सरकार ख़ामोश रही।

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