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पोखरी पंचायत के सेरी गांव के युवा किसान शंभू लाल की कहानी आज कई किसानों के लिए प्रेरणा बन चुकी है। उन्होंने प्राइवेट और सरकारी नौकरी छोड़कर खेती को अपना करियर बनाया।
शुरुआत आसान नहीं थी, परिवार का विरोध भी झेलना पड़ा, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। आज वही शंभू लाल प्राकृतिक खेती के जरिए सफल खेती कर रहे हैं और अपने गांव में एक नई सोच को आगे बढ़ा रहे हैं।
बढ़ती लागत ने बदलने को किया मजबूर
शंभू लाल बताते हैं कि पहले वे पारंपरिक तरीके से खेती करते थे, जिसमें रासायनिक खाद और दवाइयों का इस्तेमाल होता था। धीरे-धीरे खेती की लागत बढ़ती गई और उत्पादन उतना नहीं मिल रहा था।
इससे उनका मन खेती से हटने लगा, लेकिन उन्होंने कुछ नया करने का फैसला किया। इसी दौरान उन्हें प्राकृतिक खेती के बारे में जानकारी मिली, जिसने उनकी सोच बदल दी।
प्रशिक्षण से मिली सही दिशा
शंभू लाल ने साल 2018 में कृषि विभाग के माध्यम से 6 दिन का प्रशिक्षण लिया। इस प्रशिक्षण में उन्हें प्राकृतिक खेती के सिद्धांतों और तकनीकों के बारे में विस्तार से समझाया गया।
प्रशिक्षण के बाद वे इस पद्धति से काफ़ी प्रभावित हुए और घर लौटते ही उन्होंने इसे अपनाने का फैसला कर लिया।
परिवार के विरोध के बावजूद शुरू किया सफर
जब शंभू लाल ने प्राकृतिक खेती शुरू की, तो परिवार ने इसका विरोध किया। परिवार को डर था कि इस नए तरीके से खेती करने पर नुकसान हो सकता है।
लेकिन शंभू लाल ने अपने फैसले पर भरोसा रखा और पहाड़ी गाय खरीदकर उसके गोबर और गौमूत्र से प्राकृतिक इनपुट तैयार करने लगे। धीरे-धीरे जब उनके खेत में अच्छे परिणाम दिखने लगे, तो परिवार का नजरिया भी बदल गया और उन्होंने उनका साथ देना शुरू कर दिया।
9 बीघा में प्राकृतिक खेती का विस्तार
आज शंभू लाल 9 बीघा ज़मीन में प्राकृतिक खेती कर रहे हैं। वे अपने खेतों में बबली, लाल पत्थागोभी, आलू, फूलगोभी, राजमाह और मटर जैसी फ़सलें उगा रहे हैं।
इस विविध खेती से उन्हें अलग-अलग फ़सलों से आय मिल रही है और ज़ोखिम भी कम हो गया है।
ख़र्च कम हुआ, बचत बढ़ी
शंभू लाल के अनुसार पहले खेती में खाद और कीटनाशकों पर काफ़ी ख़र्च होता था। लेकिन प्राकृतिक खेती अपनाने के बाद उन्होंने इन ख़र्चों को पूरी तरह बंद कर दिया।
उन्होंने जो पैसा खाद और दवाइयों पर ख़र्च करना था, उसे बचाकर बैंक में जमा किया। ये उनके लिए सबसे बड़ा बदलाव था।
उत्पादन और आय में सुधार
प्राकृतिक तरीके से खेती करने पर उन्हें अच्छे परिणाम मिलने लगे। इस साल उन्होंने 2 क्विंटल राजमाह की पैदावार ली और सब्जियों से करीब 90 हजार रुपये की आय प्राप्त की।
इससे ये साफ़ हो गया कि प्राकृतिक खेती न केवल ख़र्च कम करती है, बल्कि अच्छी आय भी देती है।
बागवानी में भी किया प्रयोग
शंभू लाल ने अपने खेत में हाई डेंसिटी सेब का बागान भी तैयार किया है। वे 600 पौधों पर प्राकृतिक खेती के इनपुट्स का उपयोग कर रहे हैं।
वे बताते हैं कि जो पौधे पहले कमजोर हो रहे थे, वे अब फिर से स्वस्थ होने लगे हैं। इससे उनका भरोसा इस पद्धति पर और मज़बूत हुआ है।
देसी उपायों से रोगों पर नियंत्रण
शंभू लाल ने अपने खेत में खट्टी लस्सी और जीवामृत जैसे देसी उपायों का इस्तेमाल किया। इनसे पौधों में होने वाले फंगल रोगों पर नियंत्रण मिला और पौधों की सेहत बेहतर हुई।
ये अनुभव दिखाता है कि प्राकृतिक खेती में बिना रसायनों के भी फ़सलों को सुरक्षित रखा जा सकता है।
किचन गार्डन से फैला संदेश
शंभू लाल का मानना है कि प्राकृतिक खेती को फैलाने का सबसे अच्छा तरीका किचन गार्डन मॉडल है। वे कहते हैं कि लोग अब अपने परिवार के लिए रसायनमुक्त फल और सब्ज़ियां उगाना चाहते हैं।
खासकर गांवों में महिलाएं इस काम में ज़्यादा जुड़ी होती हैं, इसलिए किचन गार्डन के जरिए इस पद्धति को तेजी से फैलाया जा सकता है।
अब बन चुके हैं प्रेरणा
आज शंभू लाल अपने गांव और आसपास के क्षेत्रों के किसानों के लिए एक उदाहरण बन चुके हैं। जो लोग पहले उनके फैसले पर सवाल उठाते थे, वही अब उनसे सीखने आ रहे हैं।
उनकी कहानी ये बताती है कि अगर किसान सही जानकारी और धैर्य के साथ काम करे, तो प्राकृतिक खेती से खेती को एक नई दिशा दी जा सकती है।
एक नई शुरुआत की मिसाल
शंभू लाल का सफर ये दिखाता है कि खेती में बदलाव केवल तकनीक से नहीं, बल्कि सोच से आता है। उन्होंने ये साबित किया है कि प्राकृतिक खेती अपनाकर कम लागत में बेहतर उत्पादन लिया जा सकता है और एक स्थायी भविष्य बनाया जा सकता है।
आज उनका खेत एक ऐसी जगह बन चुका है, जहां से कई किसान नई प्रेरणा लेकर अपने खेतों में बदलाव करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।
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