अमृतसर के खियाला कलां गांव (Khiyala Kalan village of Amritsar) के किसान तारा सिंह पिछले सात सालों से एक सफल फिश फार्म (Fish farm) चला रहे हैं। वो अपने इलाके के पहले मछली पालने वालों में से एक हैं। पारंपरिक खेती (traditional farming) से कम प्रॉफिट होने की वजह से उन्होंने सही वक्त पर अपना रास्ता बदलने का फैसला किया। आज, मछली पालन उनके लिए इनकम का एक अच्छा सोर्स और एक प्रोग्रेसिव किसान (Progressive farmers) होने की पहचान बन गया है।
कैसे शुरू किया फिश फार्म
तारा सिंह बताते हैं कि फिश फार्मिंग (Fish farming)में आने से पहले उन्होंने काफी पढ़ाई की। उन्होंने इलाके की डिमांड और मार्केटिंग फैसिलिटी को समझा। वो कहते हैं, “हमारे इलाके में मछली की डिमांड अच्छी थी, इसलिए मुझे लगा कि ये काम फायदेमंद हो सकता है।”
उन्होंने Fisheries Department से कॉन्टेक्ट किया और वहां से ट्रेनिंग और टेक्निकल जानकारी ली। वो शुरुआत में मिली सभी मदद के लिए डिपार्टमेंट को धन्यवाद देते हैं। डिपार्टमेंट नए किसानों के लिए कम से कम एक एकड़ का तालाब रिकमेंड करता है और सब्सिडी पाने के लिए यह क्राइटेरिया ज़रूरी है।
मेंटेनेंस सबसे ज़रूरी है
उनके मुताबिक, फिश फार्मिंग में सबसे ज़रूरी चीज मेंटेनेंस और पानी की क्वालिटी है। वो कहते हैं, “ज़रा सी लापरवाही से भी मछलियां मर सकती हैं। खेतों के बाहर का पानी तालाब में नहीं जाना चाहिए, ख़ासकर बारिश के मौसम में।”
तारा सिंह कहते हैं कि मछली पालन के लिए एरेटर (पंखा) सबसे ज़रूरी सामान है। “बादल वाले दिनों में, जब हवा में नमी बढ़ जाती है, तो मछलियों को सांस लेने में दिक्कत होती है। एरेटर से ऑक्सीजन की मात्रा बैलेंस रहती है और मछलियां सुरक्षित रहती हैं।”
तालाब की खुदाई और शुरुआती ध्यान
उन्होंने तालाब की खुदाई के लिए नरेगा स्कीम की मदद ली थी, उनके मुताबिक, ये सरकार से मिलने वाली सब्सिडी के लिए ज़रूरी है और इससे लोकल मज़दूरों को भी काम मिला और तालाब बेहतर बना। वो कहते हैं कि सरकारी निर्देशों के मुताबिक, तालाब की गहराई कम से कम छह फीट होनी चाहिए और अगर मेड़ मज़बूत है, तो कई सालों तक कोई दिक्कत नहीं होगी।
तारा सिंह कहते हैं कि पंजाब का ग्राउंडवाटर मछली पालन के लिए सही है। “मिट्टी नरम होनी चाहिए, ताकि मछलियों को तैरने और खाना खाने में दिक्कत न हो। सड़क या सख्त मिट्टी वाली जगहें मछलियों के लिए नुकसानदायक होती हैं।”
फिश फार्मिंग साइकिल
तारा सिंह का तालाब करीब दो एकड़ में फैला है। उनके फार्म में राहुन, कतला, मुरख, सिल्वर और ग्रास वैरायटी की मछलियां पाली जाती हैं।
मछली पालन का सालाना साइकिल अप्रैल में शुरू होता है। सर्दियों में मछलियां खाना नहीं खातीं और सिर्फ गर्मियों के खाने पर ही जिंदा रहती हैं। हालांकि, इस दौरान मार्केटिंग का काम चलता रहता है।
नर्सरी का महत्व
उनका कहना है कि किसी भी मछली पालन फार्म की सफलता के लिए नर्सरी का होना बहुत ज़रूरी है और इसके बिना कोई मछली पालक सफल नहीं हो सकता। वो कहते हैं, “इससे हम नई मछलियां पाल सकते हैं और सर्दियों में स्टॉक रख सकते हैं। तीन-चार महीने बाद, हम इसे एक बड़े तालाब में शिफ्ट कर सकते हैं।”
सपोर्ट और सब्सिडी
नए किसानों के लिए, वो सलाह देते हैं कि उन्हें शुरू करने से पहले फिशरीज डिपार्टमेंट से कॉन्टेक्ट करना चाहिए। डिपार्टमेंट पांच दिन की ट्रेनिंग देता है और सब्सिडी भी देता है।
अभी की स्कीम के मुताबिक, एक हेक्टेयर के लिए 3.5 लाख रुपये तक की सब्सिडी मिल सकती है।
बीमारियों और बारिश का असर
उनका कहना है कि पंजाब के हालात के हिसाब से मछलियों में बीमारी के मामले कम हैं। “अगर फंगस लग जाए तो हम लाल दवाई इस्तेमाल करते हैं, इससे प्रॉब्लम सॉल्व हो जाती है।” बारिश के मौसम में वह ज़्यादा सावधानी बरतते हैं ताकि खेतों का पानी तालाब में न गिरे और पानी ज़्यादा नम न हो जाए।
इनकम और मार्केट
उनके मुताबिक, एक तालाब पर सालाना खर्च करीब 1.5 लाख रुपये आता है। तारा सिंह कहते हैं कि अभी मछली का एवरेज प्राइस 120 रुपये प्रति kg है। मछुआरे खुद आकर मछली खरीदते हैं। वह कहते हैं, “एक किसान एक एकड़ से सालाना करीब 4 लाख रुपये कमा सकता है।” उनके मुताबिक, यह मेहनत वाला काम है लेकिन अगर सही तरीके से देखभाल की जाए तो मछली पालन फायदेमंद साबित होता है। “पानी और साफ-सफाई का ध्यान रखें, मछलियां हेल्दी रहेंगी और इनकम भी बढ़ेगी।”
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