मध्यप्रदेश सरकार ‘कृषक कल्याण वर्ष 2026’ के तहत श्रीअन्न यानी मोटे अनाज को किसानों की आर्थिक मजबूती का आधार बना रही है। इसी दिशा में राज्य की पारंपरिक और खास फसलें—सिताही कुटकी, नागदमन कुटकी और बैंगनी अरहर—को वैश्विक पहचान दिलाने की पहल तेज हो गई है। इन तीनों फसलों के GI टैग के प्रस्ताव चेन्नई स्थित भौगोलिक संकेत रजिस्ट्री को भेज दिए गए हैं। इस कदम से न केवल इन फसलों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिलेगी, बल्कि खासकर जनजातीय किसानों को उनकी उपज का बेहतर मूल्य भी प्राप्त होगा।
सिताही कुटकी: कम समय, ज्यादा भरोसा
सिताही कुटकी ‘लिटिल मिलेट’ की एक देशी किस्म है, जो केवल 60 दिनों में तैयार हो जाती है। यह कम उपजाऊ जमीन और सूखे जैसी परिस्थितियों में भी 10–11 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक स्थिर उत्पादन देती है। डिंडोरी जिले के पहाड़ी इलाकों के 50 से अधिक गांवों में यह फसल किसानों की आजीविका का मुख्य आधार बन चुकी है और कठिन परिस्थितियों में भी भरोसेमंद साबित हो रही है।
नागदमन कुटकी: पोषण और औषधीय गुणों का खजाना
नागदमन कुटकी डिंडोरी क्षेत्र की एक विशिष्ट किस्म है, जो अपने उच्च पोषण मूल्य और औषधीय गुणों के लिए जानी जाती है। स्वास्थ्य के प्रति बढ़ती जागरूकता के बीच इस फसल की मांग तेजी से बढ़ रही है, जिससे किसानों को बेहतर बाजार मिलने की संभावना भी मजबूत हुई है।
बैंगनी अरहर: प्रोटीन से भरपूर फसल
बैंगनी अरहर अपनी खास गुणवत्ता के कारण अलग पहचान रखती है। इसमें प्रोटीन की मात्रा अधिक होती है और यह रोगों के प्रति अधिक प्रतिरोधी मानी जाती है। अच्छी देखभाल के साथ किसान इससे 15 से 20 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उत्पादन हासिल कर रहे हैं, जो उनकी आय बढ़ाने में अहम भूमिका निभा रहा है।
प्रोत्साहन योजनाओं से बढ़ रहा रकबा
राज्य सरकार ने ‘रानी दुर्गावती श्री अन्न प्रोत्साहन योजना’ के तहत 16 जिलों में कोदो-कुटकी की खरीदी पर 1000 रुपये प्रति क्विंटल का प्रोत्साहन देना शुरू किया है। इस पहल से अब तक 22 हज़ार से अधिक किसानों ने पंजीकरण कराया है और करीब 21 हज़ार हेक्टेयर क्षेत्र में इन फसलों की खेती का विस्तार हुआ है।
कुपोषण से लड़ाई में भी कारगर
श्रीअन्न केवल आय बढ़ाने का जरिया नहीं, बल्कि पोषण सुधार का भी मजबूत माध्यम बन रहा है। श्योपुर जिले में सहरिया जनजाति के बच्चों में कुपोषण दूर करने के लिए कोदो-कुटकी आधारित आहार का सफ़ल उपयोग किया गया, जिससे हजारों बच्चों के स्वास्थ्य में सुधार दर्ज हुआ। वहीं डिंडोरी के समनापुर क्षेत्र में बड़ी संख्या में महिला किसान समूह इस खेती से जुड़कर आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ रहे हैं।
GI टैग से मिलेगा ग्लोबल बाज़ार
जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय, जबलपुर द्वारा तैयार दस्तावेजों के आधार पर GI टैग मिलने के बाद इन फसलों की गुणवत्ता और मौलिकता को वैश्विक मान्यता मिलेगी। इससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में मांग बढ़ेगी और मध्यप्रदेश का श्रीअन्न एक मजबूत ब्रांड के रूप में उभरकर किसानों की आय में स्थायी वृद्धि का रास्ता खोलेगा।

