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भारत ने पेट्रोल में 20 फीसदी एथेनॉल (ethanol) मिलाने का लक्ष्य पहले ही पूरा कर लिया है। अब सरकार और आगे बढ़ने की योजना बना रही है। यानी भविष्य में आपकी गाड़ी में डलने वाले पेट्रोल में गन्ने से बना एथेनॉल 20 प्रतिशत से भी अधिक हो सकता है। ये ख़बर कई मायनों में अच्छी है। प्रदूषण घटेगा, पेट्रोल का आयात कम होगा और गन्ना किसानों को अच्छा दाम मिलेगा।
लेकिन इस फायदे के साथ एक गंभीर उलझन भी जुड़ गई है। अगर एथेनॉल बनाने में ज्यादा गन्ना और चीनी इस्तेमाल होगी, तो क्या भारत को चीनी का निर्यात बंद करना पड़ेगा? क्या घरेलू बाजार में मीठे के दाम बढ़ जाएंगे?
Cane-Sugar-Ethanol: तीनों के बीच खिंचाव
एथेनॉल बनाने के लिए गन्ने के रस और चीनी (sugarcane juice and sugar) का इस्तेमाल होता है। यानी एक ही कच्चे माल पर दो जरूरतें। एक तरफ मीठा (चीनी), दूसरी तरफ ईंधन (एथेनॉल)। जब एथेनॉल की मांग बढ़ती है, तो चीनी मिलें ज्यादा गन्ना एथेनॉल बनाने में लगा देती हैं। इससे घरेलू बाजार में चीनी की कमी हो सकती है, कीमतें बढ़ सकती हैं और सरकार को निर्यात पर रोक लगानी पड़ सकती है।
एक्सपोर्ट के ताजा आंकड़े बता रहे हैं सरकार की सतर्कता
अगर हाल के आंकड़ों पर नजर डालें, तो साफ पता चलता है कि सरकार पहले से ही काफी सतर्क है। बात करें सीजन 2024-25 की, तो सरकार ने 10 लाख टन चीनी निर्यात की अनुमति दी थी, लेकिन वास्तविक रूप से केवल 9 लाख टन ही निर्यात हो पाया। वहीं चालू सीज़न की बात करें तो सरकार ने 15.9 लाख टन निर्यात की मंजूरी तो दे दी है, लेकिन मार्च महीने तक महज 3.6 लाख टन ही निर्यात किया जा सका है। ये आंकड़े साफ तौर पर दिखा रहे हैं कि सरकार घरेलू ज़रूरतों को सबसे पहले रख रही है और विदेश भेजने से पहले दो बार सोच रही है।
पहले भी लग चुकी है रोक, अब फिर वही स्थिति?
यह पहली बार नहीं है जब भारत ऐसे संकट के मोड़ पर खड़ा है। साल 2022-23 में देश में चीनी की भारी कमी हो गई थी, जिसके बाद सरकार ने निर्यात पर पूरी तरह रोक लगा दी थी। इसके बाद 2023-24 में उत्पादन तो अच्छा रहा, लेकिन सरकार ने फिर भी निर्यात की अनुमति नहीं दी — ताकि घरेलू कीमतें काबू में रहें और लोगों को महंगी चीनी न खरीदनी पड़े। अब एक बार फिर ऐसा ही माहौल बन रहा है। अगर एथेनॉल ब्लेंडिंग 20% से ऊपर जाती है, तो चीनी का बड़ा हिस्सा एथेनॉल में चला जाएगा और निर्यात अपने आप सीमित हो जाएगा।
किसानों का 17 हजार करोड़ का बकाया भी एक मुद्दा
इस पूरे समीकरण में गन्ना किसानों का बकाया भी एक बड़ी चिंता है। मौजूदा सीजन में करीब 16,918 करोड़ रुपये किसानों को अभी तक नहीं मिले हैं। हालांकि चीनी मिलों ने कुल बकाया का लगभग 84 प्रतिशत चुका दिया है, लेकिन बची हुई राशि अभी भी बहुत बड़ी है।अच्छी बात यह है कि अगर मिलें ज्यादा एथेनॉल बनाएंगी, तो उनकी कमाई बढ़ेगी और किसानों का भुगतान तेजी से हो सकेगा। यही वजह है कि सरकार एथेनॉल उत्पादन को बढ़ावा दे रही है।
क्षमता तो है, लेकिन उत्पादन कम
सबसे दिलचस्प बात यह है कि देश में एथेनॉल बनाने की क्षमता काफी अधिक है। लगभग 1000 करोड़ लीटर सालाना। लेकिन इसका पूरा इस्तेमाल नहीं हो पा रहा। ऑयल कंपनियों ने करीब 288 करोड़ लीटर एथेनॉल का ऑर्डर दिया है, लेकिन मार्च तक इसका आधे से भी कम यानी सिर्फ 46 प्रतिशत ही सप्लाई हो पाई है। यानी उत्पादन बढ़ाने की बहुत ज़रूरत है।
दुनिया पर असर और मौसम का ख़तरा
अगर भारत चीनी का निर्यात कम करता है, तो इसका असर ग्लोबल मार्केट पर भी पड़ेगा। रिपोर्ट के मुताबिक, 2026 में चीनी की कीमतों में बढ़ोतरी हो सकती है। वहीं एल नीनो जैसे मौसमी हालात अगर बनते हैं, तो बारिश कम होगी और गन्ने की पैदावार गिर सकती है। 2023 में यही हुआ था, जब उत्पादन में गिरावट आई थी।
संतुलन ही सबसे बड़ी चुनौती
भारत आज उस मोड़ पर है जहां उसे तीन चीजों को एक साथ संभालना है। ईंधन की ज़रूरत, किसानों का हित और आम लोगों के लिए कीमतों का संतुलन। एथेनॉल ब्लेंडिंग बढ़ाना देश के लिए फायदेमंद है, लेकिन चीनी के इस्तेमाल और निर्यात के बीच सही संतुलन बनाना भी उतना ही ज़रूरी है। आने वाले महीनों में सरकार का फैसला ही तय करेगा कि हमें चीनी निर्यात पर रोक लगानी पड़ेगी या नहीं।
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