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देश की सीमाओं पर पहरा देना आसान नहीं होता। पूर्वोत्तर भारत (Northeast India) की घनी पहाड़ियों, घने जंगलों और दुर्गम रास्तों के बीच तैनात असम राइफल्स ( Assam Rifles) के जवान दिन-रात मुस्तैद रहते हैं। लेकिन इन दूरदराज़ चौकियों तक ताज़ा, शुद्ध दूध पहुंचाना एक बड़ी चुनौती रही है। यहां के ज़्यादातर इलाकों में लोग सालों से UHT दूध और दूध पाउडर पर निर्भर थे क्योंकि ताज़े दूध की सप्लाई चेन कभी मज़बूत नहीं बन पाई। अब इसी चुनौती का हल निकाला है एनसीडीएफआई और असम राइफल्स (NCDFI and Assam Rifles) की एक ऐतिहासिक साझेदारी ने। जहां देशभर के सहकारी किसानों का दूध सीधे सीमा पर तैनात जवानों तक पहुंच रहा है।
क्या है ये समझौता?
नई दिल्ली में नेशनल कोऑपरेटिव डेयरी फेडरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (एनसीडीएफआई) और असम राइफल्स (NCDFI and Assam Rifles) ने एक महत्वपूर्ण समझौता ज्ञापन (MoA) पर हस्ताक्षर किए। इस समझौते के तहत देश की डेयरी सहकारी समितियां (Dairy Cooperative Societies) असम राइफल्स की इकाइयों को दूध और मिल्क प्रोडक्ट्स (Milk and Milk Products) की रोज़ाना आपूर्ति करेंगी।
ये समझौता लेफ्टिनेंट जनरल विकास लखेड़ा (महानिदेशक, असम राइफल्स) और डॉ. मीनेश शाह (अध्यक्ष, एनसीडीएफआई एवं एनडीडीबी) की मौजूदगी में हुआ। ये महज़ एक सरकारी कागज़ नहीं, बल्कि किसान और सैनिक के बीच एक इमोशनल पुल है।
किसान से जवान तक -सफ़र कैसा है?
इस व्यवस्था में पूरे देश की डेयरी सहकारी समितियां शामिल हैं। गुजरात की अमूल UHT दूध, चीज़ और माल्ट आधारित खाद्य पदार्थ दे रही है। कर्नाटक की नंदिनी UHT दूध की आपूर्ति कर रही है। महाराष्ट्र की वारणा मिल्क यूनियन दूध पाउडर भेज रही है। वहीं असम, नागालैंड, पश्चिम बंगाल, मणिपुर, मिजोरम, त्रिपुरा और राजस्थान की डेयरियां ताज़ा दूध और मक्खन की आपूर्ति कर रही हैं।
इस व्यवस्था से पूर्वोत्तर के सात राज्यों असम, मणिपुर, मिजोरम, नागालैंड, त्रिपुरा, मेघालय और अरुणाचल प्रदेश में मौजूद असम राइफल्स की 72 इकाइयों को फायदा मिलेगा। इसके अलावा, दिल्ली और कोलकाता स्थित कार्यालयों में भी इसकी सप्लाई की जा रही है।
आंकड़े जो बोलते हैं
ये पार्टनरशिप सिर्फ इमोशनल नहीं, इकोनॉमिकली भी बेहद अहम है। इस व्यवस्था से सहभागी डेयरी सहकारी समितियों को हर साल लगभग 44 करोड़ रुपये का बिज़नेस मिलने का अनुमान है। ये राशि सीधे किसानों की जेब तक पहुंचेगी।
एनसीडीएफआई का ये नेटवर्क देशभर की लाखों डेयरी सहकारी समितियों और करोड़ों दुग्ध उत्पादक सदस्यों को जोड़ता है। सन् 1970 में स्थापित ये संगठन चार दशकों से अधिक समय से भारतीय सेना और ITBP को दूध आपूर्ति में मदद कर रहा है।
पूर्वोत्तर के किसानों के लिए वरदान
पूर्वोत्तर भारत के अनेक हिस्सों में ऐतिहासिक रूप से ताज़े दूध की उपलब्धता सीमित रही है। यहां के लोग मुख्यतौर पर UHT दूध और दूध पाउडर पर निर्भर थे। इस साझेदारी से लोकल डेयरी सहकारी समितियों को एक परमानेंट और बेहतर बाज़ार मिलेगा।
जब समितियों के पास खरीदार निश्चित हो, तो वे स्थानीय किसानों से अधिक दूध खरीद सकती हैं, बेहतर मूल्य दे सकती हैं और चिलिंग प्लांट, ट्रांसपोर्ट और स्टोरेज जैसी सुविधाओं में इनवेस्ट कर सकती हैं। इससे किसानों की आमदनी बढ़ेगी, ग्रामीण रोज़गार बनेंगे और पूरे क्षेत्र में डेयरी विकास की नई लहर आएगी।
सैनिक भी खुश, किसान भी
लेफ्टिनेंट जनरल विकास लखेड़ा ने इस मौके पर कहा कि असम राइफल्स को व्यापक रूप से ‘पूर्वोत्तर के लोगों का मित्र’ कहा जाता है। ये पहल केवल जवानों के लिए अच्छा खाना सुनिश्चित करने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका मकसद क्षेत्र के डेयरी किसानों को सशक्त बनाना भी है।
डॉ. मीनेश शाह ने गर्व के साथ कहा कि ये साझेदारी साबित करती है कि डेयरी सहकारी समितियां रक्षा और अर्धसैनिक बलों की कॉम्प्लेक्स सप्लाई ज़रूरतों को भी बेहतर तरीके से पूरा करने में सक्षम हैं।
एक दूध की बूंद में समाई पूरी कहानी
सोचिए-मणिपुर के किसी गांव में एक किसान सुबह अपनी गाय का दूध निकालता है। वो दूध सहकारी समिति के रास्ते होते हुए, एनसीडीएफआई की सप्लाई चेन के ज़रिए, सीमा पर तैनात उसी देश के एक जवान की थाली में पहुंचता है। ये सिर्फ दूध का सफर नहीं, ये किसान और सैनिक के बीच भरोसे और देशभक्ति का सफर है।

