यूपी सरकार का नया ‘आत्मनिर्भरता मॉडल’, ललितपुर बनेगा प्रदेश का पहला प्राकृतिक खेती ज़िला

सरकार की योजना है कि गोशालाओं से निकलने वाले गोबर और अन्य जैविक संसाधनों को प्राकृतिक खेती से जोड़ा जाए।

उत्तर प्रदेश सरकार (Government of Uttar Pradesh) एक ऐसा मॉडल बना रही है जहां गोशाला का गोबर खेतों तक पहुंचेगा, किसान को सस्ती प्राकृतिक खाद मिलेगी और गोशाला की आमदनी भी बढ़ेगी। जानिए कैसे बदलेगी गांवों की अर्थव्यवस्था…

क्या है पूरा मामला?

उत्तर प्रदेश की योगी सरकार (Yogi government of Uttar Pradesh) गोशालाओं को सिर्फ ‘आश्रय स्थल’ नहीं, बल्कि आर्थिक गतिविधियों का केंद्र बनाने की दिशा में बड़ा कदम उठा रही है। सरकार की योजना है कि गोशालाओं से निकलने वाले गोबर और अन्य जैविक संसाधनों को प्राकृतिक खेती से जोड़ा जाए। इसके लिए ललितपुर को प्रदेश के पहले Pilot Natural Farming District के रूप में विकसित करने की संभावनाएं तलाशी जा रही हैं।

तीन बड़ी संस्थाओं की भागीदारी

उत्तर प्रदेश गो सेवा आयोग के अध्यक्ष श्याम बिहारी गुप्ता (Shyam Bihari Gupta, Chairman of the Uttar Pradesh Cow Service Commission (Go Seva Aayog) के अनुसार, गो सेवा आयोग और नाबार्ड (National Bank for Agriculture and Rural Development) के अधिकारियों के बीच अहम बैठक हुई। इसमें उपकार (उत्तर प्रदेश कृषि अनुसंधान परिषद) और कृषि विज्ञान केंद्रों के तकनीकी सहयोग से प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने पर चर्चा हुई।

कैसे काम करेगा यह मॉडल?

इस मॉडल की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें गोशाला और किसान एक-दूसरे की जरूरत बनते हैं:

1.गोशाला से: गोबर, गो-मूत्र और अन्य जैविक संसाधनों से प्राकृतिक खाद, जैविक कीट नियंत्रक, वर्मी कम्पोस्ट और पंचगव्य उत्पाद (Biological pest control agents, vermicompost, and Panchagavya products) तैयार होंगे

2.किसान को: लोकल लेवल पर सस्ते और शुद्ध प्राकृतिक खेती के संसाधन मिलेंगे

3.गोशाला को: नई आमदनी का सोर्स मिलेगा, जिससे वो आत्मनिर्भर बनेगी

बायोगैस और ब्रांडिंग पर भी ज़ोर

गोबर से सिर्फ खाद ही नहीं, बल्कि बायोगैस और कम्प्रेस्ड बायोगैस (Bio-CBG) संयंत्र लगाने की संभावनाएं भी तलाशी जा रही हैं। इससे गोबर का इस्तेमाल ऊर्जा उत्पादन में भी होगा। साथ ही किसानों के उत्पादों के लिए संग्रहण, प्रसंस्करण, गुणवत्ता नियंत्रण, पैकेजिंग, ब्रांडिंग और विपणन (Collection, processing, quality control, packaging, branding, and marketing) की संगठित व्यवस्था बनाई जाएगी।

किसान उत्पादक संगठनों की बड़ी भूमिका

इस पूरी व्यवस्था में FPO (किसान उत्पादक संगठन), स्वयं सहायता समूह (SHG), सहकारी समितियां और ग्रामीण उद्यमी शामिल होंगे। मकसद ये है कि किसान सिर्फ फसल उगाकर न रह जाए, बल्कि अपने उत्पादों का value addition कर बेहतर कीमत पा सके। इससे गांवों में छोटे उद्यम और स्वरोजगार भी बढ़ेंगे।

नाबार्ड देगा पैसा, उपकार देगा तकनीक

  • नाबार्ड: FPO, SHG, संयुक्त देयता समूहों और पात्र किसानों को लोन, वित्तीय सहायता और क्षमता विकास में मदद करेगा
  • उपकार और कृषि विज्ञान केंद्र: किसानों और गोशाला कर्मियों को वैज्ञानिक पद्धति का टेक्निकल ट्रेनिंग देंगे

आगे की  प्लानिंग

ललितपुर में इस प्रयोग के सफल होने पर प्रदेश के प्रत्येक मंडल के एक जनपद में स्टेप बाय स्टेप तरीके से ऐसी व्यवस्था विकसित करने की योजना है। यानी एक जिले से शुरू होकर यह मॉडल पूरे उत्तर प्रदेश में फैल सकता है।

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सम्पर्क सूत्र: किसान साथी यदि खेती-किसानी से जुड़ी जानकारी या अनुभव हमारे साथ साझा करना चाहें तो हमें फ़ोन नम्बर 9599273766 पर कॉल करके या kisanofindia.mail@gmail.com पर ईमेल लिखकर या फिर अपनी बात को रिकॉर्ड करके हमें भेज सकते हैं। किसान ऑफ़ इंडिया के ज़रिये हम आपकी बात लोगों तक पहुँचाएँगे, क्योंकि हम मानते हैं कि किसान उन्नत तो देश ख़ुशहाल।

 

 

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