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भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) ने एक ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की है। वैज्ञानिकों ने अफ्रीकी स्वाइन फीवर (African Swine Fever) जैसी भयानक बीमारी से निपटने के लिए भारत का अपना टीका तैयार हो गया है।
क्या है यह बीमारी जिसने किसानों का खून चूसा?
अफ्रीकी स्वाइन फीवर (African Swine Fever) कोई सामान्य बीमारी नहीं है। यह वायरस सूअरों के लिए वैसा ही है जैसा कोरोना इंसानों के लिए था, बल्कि इससे भी ज्यादा खतरनाक है। इस बीमारी में सूअरों को तेज़ बुखार आता है, शरीर के अंदर खून बहने लगता है और मौत की दर लगभग 100 फीसदी होती है। यानी अगर एक सूअर को ये बीमारी हो जाए तो उसके बचने की उम्मीद लगभग नामुमकिन है। सबसे बड़ी बात – इसका कोई इलाज नहीं है। अब तक संक्रमित सूअरों को मारना ही एकमात्र रास्ता था।
कब आई यह बीमारी भारत में?
साल 2020 में पहली बार भारत में इस बीमारी ने दस्तक दी। और फिर क्या था? ये आग की तरह फैल गई। पूर्वोत्तर राज्यों में तो किसानों की कमर टूट गई। असम में 2020-21 में 276 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ। मिजोरम में 2025 तक 11,382 परिवार प्रभावित हुए और करीब 982 करोड़ रुपये बर्बाद हो गए।
कैसे काम करेगा यह टीका?
ICAR-National Institute of High Security Animal Diseases (भोपाल) के वैज्ञानिकों ने एमए-104 सेल लाइन का इस्तेमाल कर ये टीका विकसित किया है। यानी वैज्ञानिकों ने वायरस को इतना कमजोर कर दिया है कि वो सूअर को बीमार नहीं कर सकता, लेकिन उसके शरीर में एंटीबॉडीज बना देता है ताकि असली वायरस आने पर सूअर का शरीर उससे लड़ सके।
8 सप्ताह से बड़े स्वस्थ सूअरों को यह टीका 1 मिलीलीटर इंट्रामस्क्युलर (मांसपेशियों में) इंजेक्शन के रूप में दिया जाएगा। पहली डोज के 14 दिन बाद बूस्टर डोज भी देनी होगी।
वैज्ञानिकों ने क्या-क्या जांचा?
ये टीका महज कुछ दिनों में नहीं बन गया। वैज्ञानिकों ने इसकी कई जांच कीं – स्टेरिलिटी (बिना किसी दूषित पदार्थ के), शुद्धता, सुरक्षा, आनुवंशिक स्थिरता (कहीं वायरस म्यूटेट तो नहीं कर रहा), इम्युनिटी पावर, बीमारी से बचाव की क्षमता और सबसे खतरनाक बात, कहीं कमजोर किया गया वायरस फिर से ख़तरनाक तो नहीं बन रहा? सभी परीक्षणों में ये खरा उतरा है। फील्ड ट्रायल (खेतों में वास्तविक परीक्षण) भी किए गए, जिनमें इसकी सुरक्षा और प्रभावशीलता साबित हुई।
क्यों ख़ास है यह टीका?
दुनिया में अभी बहुत कम देशों के पास ASF का टीका है। वियतनाम कुछ देशों में से एक है जहां इसका व्यावसायिक उपयोग हो रहा है। लेकिन भारत का यह टीका एमए-104 सेल लाइन पर आधारित है, जो आसानी से उपलब्ध है। अभ भारत को किसी दूसरे देश की महंगी तकनीक पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा। बड़े पैमाने पर उत्पादन संभव होगा और लागत भी कम आएगी।
किसानों पर क्या असर पड़ेगा?
अब तक जब ASF फैलता था तो सरकार को पूरे झुंड को मारने का आदेश देना पड़ता था। किसान की सारी मेहनत पर पानी फिर जाता था। लेकिन अब अगर ये टीका लग जाएगा तो सूअर बचेंगे, किसान बचेंगे, और उनकी आजीविका बचेगी। यह टीका न सिर्फ मौत दर कम करेगा बल्कि किसानों के आर्थिक नुकसान को भी रोकेगा। पूर्वोत्तर भारत जहां सूअर पालन लाखों परिवारों का मुख्य व्यवसाय है, वहां यह क्रांति ला सकता है। भारत की पशुपालन जैव-सुरक्षा को भी मजबूती मिलेगी।
टीका व्यावसायिक स्तर पर कब आएगा ?
हालांकि अभी यह टीका व्यावसायिक स्तर पर कब आएगा, ये साफ नहीं है, लेकिन इस दिशा में यह पहला और सबसे बड़ा कदम है। वैज्ञानिकों का कहना है कि जल्द ही इसके बड़े पैमाने पर उत्पादन का प्रोसेस शुरू होगा। तब तक किसानों को जैव-सुरक्षा उपायों पर ध्यान देना चाहिए।
ये सिर्फ एक टीका नहीं है, यह लाखों किसानों की आशा है। यह उन सपनों की रक्षा है जो एक छोटे से सूअर के बच्चे के साथ जुड़े होते हैं। भारतीय विज्ञान ने एक बार फिर साबित किया है कि वह दुनिया की किसी भी चुनौती का सामना कर सकता है।
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