“कमला” जीन क्रांति: Genome Editing धान और भारतीय खेती का भविष्य

धान की किस्म DRR Dhan 100 को हैदराबाद स्थित ICAR-इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ़ राइस रिसर्च (IIRR) के वैज्ञानिकों ने विकसित किया है। इसका मुख्य उद्देश्य था धान की पैदावार बढ़ाने वाले जीन को बेहतर बनाना।

भारत अब फसल विज्ञान के एक नए दौर में प्रवेश कर रहा है। कई दशकों तक पारंपरिक प्रजनन (ब्रीडिंग) और लगभग दो दशकों तक जेनेटिकली मॉडिफाइड फसलों पर बहस के बाद अब कृषि शोध में एक नई तकनीक सामने आ रही है, जिसे जीन संपादन (Genome Editing) कहा जाता है।

इस क्षेत्र की सबसे चर्चित उपलब्धियों में से एक है भारत की पहली जीन-संपादित धान किस्म DRR Dhan 100, जिसे CRISPR-Cas9 तकनीक से विकसित किया गया है। शोध जगत में इसे कभी-कभी उभरते हुए “कमला जीन एडिटिंग कार्यक्रम” से भी जोड़ा जाता है। यह किस्म अब प्रयोगशाला शोध से निकलकर भारत में बड़े पैमाने के खेत परीक्षणों की ओर बढ़ रही है।

किसानों के लिए सबसे बड़ा सवाल सीधा है

क्या यह केवल एक वैज्ञानिक प्रयोग है,  धान की पैदावार बढ़ाने की दिशा में अगला बड़ा कदम बन सकता है? इस सवाल का जवाब समझने के लिए यह जानना जरूरी है कि जीन संपादन क्या होता है, यह पारंपरिक GM फसलों से कैसे अलग है, और वैज्ञानिक क्यों मानते हैं कि इससे फसल सुधार का भविष्य बदल सकता है।

भारत में धान की चुनौती: कम संसाधनों में अधिक उत्पादन 

धान भारतीय कृषि और खाद्य सुरक्षा की रीढ़ है। भारत की लगभग आधी आबादी मुख्य भोजन के रूप में चावल पर निर्भर करती है और देशभर में करोड़ों किसान इसकी खेती करते हैं।

भारत दुनिया के सबसे बड़े धान उत्पादक देशों में से एक है, फिर भी कई चुनौतियां सामने आ रही हैं:

• बढ़ती जनसंख्या और खाद्य मांग।

• खेती योग्य जमीन का कम होना।

• जलवायु परिवर्तन और अनिश्चित बारिश।

• कीट और रोग का बढ़ता दबाव।

• कई क्षेत्रों में मिट्टी की उर्वरता कम होना।

पिछले वर्षों में पारंपरिक ब्रीडिंग से धान की पैदावार बढ़ाने में मदद मिली है। लेकिन इस प्रक्रिया में समय लगता है। कई बार नई किस्म तैयार होने में 10 से 15 साल तक लग जाते हैं। इसी कारण वैज्ञानिक अब CRISPR जैसी जीन संपादन तकनीक का उपयोग करके तेजी से नई किस्में विकसित करने की कोशिश कर रहे हैं, और इसमें किसी बाहरी जीन को जोड़ने की जरूरत भी नहीं पड़ती। 

जीन संपादन क्या है?

जीन संपादन एक वैज्ञानिक तकनीक है जिससे पौधे के डीएनए में बहुत सटीक बदलाव किए जा सकते हैं। हर पौधे में हजारों जीन होते हैं, जो कई महत्वपूर्ण गुणों को नियंत्रित करते हैं, जैसे:

• पैदावार।

• पौधे की ऊंचाई।

• दाने का आकार।

• रोग प्रतिरोध।

• सूखा सहन करने की क्षमता।

कई बार कोई खास जीन उत्पादन को सीमित करता है। जीन संपादन से वैज्ञानिक उस जीन को बदल सकते हैं या बंद कर सकते हैं, जिससे पौधे का प्रदर्शन बेहतर हो सकता है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इसमें पौधे के अपने डीएनए में ही बदलाव किया जाता है। इसमें बाहरी जीन जोड़ना जरूरी नहीं होता। यही कारण है कि जीन संपादन पारंपरिक जेनेटिक मॉडिफिकेशन से अलग माना जाता है। 

CRISPR-Cas9 क्या है? 

आज जीन संपादन के लिए सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाला औजार CRISPR-Cas9 है। CRISPR का पूरा नाम है Clustered Regularly Interspaced Short Palindromic Repeats। यह प्रणाली पहले बैक्टीरिया में पाई गई थी।वैज्ञानिकों ने इस प्राकृतिक प्रणाली को एक सटीक जीन संपादन उपकरण के रूप में विकसित किया।

इसकी प्रक्रिया लगभग इस तरह काम करती है:

1. वैज्ञानिक उस जीन की पहचान करते हैं जो किसी खास गुण को नियंत्रित करता है।

2. एक गाइड RNA CRISPR प्रणाली को डीएनए के उसी स्थान तक ले जाता है।

3. Cas9 एंजाइम एक छोटी कैंची की तरह डीएनए को काटता है।

4. पौधा उस कटे हुए डीएनए को ठीक करता है, और इसी प्रक्रिया में जीन में बदलाव हो जाता है।

इस तरह वैज्ञानिक:

• किसी जीन को बंद कर सकते हैं।

• जीन की गतिविधि बदल सकते हैं।

• पौधे के गुण सुधार सकते हैं।

महत्वपूर्ण बात यह है कि इस प्रक्रिया में पौधे में बाहरी डीएनए जरूरी नहीं रहता। 

CRISPR और GM फसलों में अंतर 

जेनेटिकली मॉडिफाइड (GM) फसलों में आमतौर पर किसी दूसरे जीव का जीन पौधे में डाला जाता है। उदाहरण के लिए, बीटी कपास में मिट्टी में पाए जाने वाले एक जीवाणु का जीन डाला गया था, जिससे पौधा कुछ कीटों से बचाव कर सकता है।जीन संपादन इससे अलग है। इसमें आमतौर पर पौधे के मौजूदा जीन में ही बदलाव किया जाता है। इस फ़र्क के कई प्रभाव हैं। क्योंकि जीन संपादन में विदेशी डीएनए जरूरी नहीं होता, इसलिए कई देशों में इसे उन्नत ब्रीडिंग तकनीक के करीब माना जाता है, न कि पारंपरिक GM तकनीक की तरह।

DRR Dhan 100: भारत की पहली जीनसंपादित धान किस्म 

धान की किस्म DRR Dhan 100 को हैदराबाद स्थित ICAR-इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ़ राइस रिसर्च (IIRR) के वैज्ञानिकों ने विकसित किया है। इसका मुख्य उद्देश्य था धान की पैदावार बढ़ाने वाले जीन को बेहतर बनाना। वैज्ञानिकों ने CRISPR-Cas9 का उपयोग करके उन जीनों को संपादित किया जो दाने बनने की क्षमता को प्रभावित करते हैं।

संशोधित पौधों में यह देखा गया:

• एक बाल में दानों की संख्या बढ़ी।

• पैदावार क्षमता में सुधार हुआ।

• पौधे की बनावट बेहतर हुई।

प्रारंभिक परीक्षणों में वैज्ञानिकों ने लगभग 10 से 20 प्रतिशत तक पैदावार बढ़ने की संभावना देखी। इन्हीं परिणामों के आधार पर अब इसे बड़े खेत परीक्षणों की ओर ले जाया जा रहा है।

प्रयोगशाला से खेत तक 

प्रयोगशाला में सफ़लता का मतलब यह नहीं कि वह तकनीक खेत में भी सफ़ल होगी। किसी भी नई फसल किस्म को किसानों तक पहुंचने से पहले कई चरणों से गुजरना पड़ता है:

1. प्रयोगशाला शोध।

2. ग्रीनहाउस परीक्षण।

3. सीमित खेत परीक्षण।

4. अलग-अलग क्षेत्रों में परीक्षण।

5. सरकारी मंज़ूरी।

DRR Dhan 100 इन शुरुआती चरणों को पार कर चुका है और अब 2026 के आसपास बड़े खेत परीक्षणों में प्रवेश कर सकता है।

इन परीक्षणों में देखा जाएगा:

• पैदावार स्थिरता।

• रोग प्रतिरोध।

• पर्यावरण सुरक्षा।

• अलग-अलग क्षेत्रों में प्रदर्शन।

इन्हीं परीक्षणों के बाद तय होगा कि यह किस्म बड़े स्तर पर खेती के लिए उपयुक्त है या नहीं। 

किसानों के लिए संभावित फ़ायदे

  • अगर जीन-संपादित धान किस्में सफ़ल होती हैं तो किसानों को कई फ़ायदे मिल सकते हैं।
  • अधिक पैदावार।
  • अगर दानों की संख्या बढ़ती है तो कुल उत्पादन बढ़ सकता है।
  • नई किस्म जल्दी विकसित।
  • पारंपरिक ब्रीडिंग में 10–15 साल लग सकते हैं। जीन संपादन इससे तेज हो सकता है।
  • जलवायु सहनशीलता।
  • वैज्ञानिक सूखा, लवणीयता और रोग सहनशील किस्मों पर भी काम कर रहे हैं।
  • कम इनपुट की जरूरत।
  • कुछ जीन बदलाव से पौधे पोषक तत्व बेहतर तरीके से उपयोग कर सकते हैं।
  • हालांकि इन फ़ायदों को खेत स्तर पर साबित करना जरूरी है। 

किसानों के लिए असली सवाल 

आखिर में किसान के लिए सवाल वही रहता है:

“नई किस्म सच में बेहतर है या जोखिम?” इसका जवाब इन बातों पर निर्भर करेगा:

• खेत में असली प्रदर्शन।

• बीज की कीमत।

• लंबे समय तक स्थिरता।

• बीज पर किसान का नियंत्रण

आगे का रास्ता 

जीन संपादन आधुनिक कृषि विज्ञान के सबसे शक्तिशाली औजारों में से एक बन सकता है। लेकिन यह कोई जादुई समाधान नहीं है। अच्छी खेती के लिए अभी भी जरूरी हैं:

• अच्छे बीज।

• स्वस्थ मिट्टी।

• संतुलित खाद।

• सही सिंचाई।

• कीट निगरानी।

जीन संपादन फसल की क्षमता बढ़ा सकता है, लेकिन खेती की सफ़लता अभी भी किसान की समझ और खेती के तरीके पर निर्भर करेगी।

भारतीय फसल विज्ञान का नया अध्याय 

  • CRISPR से विकसित धान किस्म DRR Dhan 100 भारतीय कृषि अनुसंधान में एक महत्वपूर्ण कदम है।
  • वैज्ञानिकों के लिए यह सटीक ब्रीडिंग की नई तकनीक है।
  • नीति बनाने वालों के लिए यह नियमन और सुरक्षा का सवाल है।
  • और किसानों के लिए यह अवसर भी है और अनिश्चितता भी।
  • आने वाले वर्षों में खेत परीक्षण बताएंगे कि क्या जीन-संपादित फसलें सच में पैदावार की अगली बड़ी छलांग बन सकती हैं।
  • CRISPR धान की कहानी अभी शुरू ही हुई है।
  • इसकी असली सफ़लता प्रयोगशाला में नहीं, बल्कि किसानों के खेतों में तय होगी। 

सम्पर्क सूत्र: किसान साथी यदि खेती-किसानी से जुड़ी जानकारी या अनुभव हमारे साथ साझा करना चाहें तो हमें फ़ोन नम्बर 9599273766 पर कॉल करके या [email protected] पर ईमेल लिखकर या फिर अपनी बात को रिकॉर्ड करके हमें भेज सकते हैं। किसान ऑफ़ इंडिया के ज़रिये हम आपकी बात लोगों तक पहुँचाएँगे, क्योंकि हम मानते हैं कि किसान उन्नत तो देश ख़ुशहाल।

इसे भी पढ़िए: Cow Protection In Uttar Pradesh: अब महिलाएं और एफपीओ संभालेंगे गोशालाओं की कमान, मिलेगा रोज़गार

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Scroll to Top