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गाय-भैंस, बकरी-भेड़ पालने वाले किसानों और पशुपालकों के लिए एक बहुत काम की ख़बर है। केंद्र सरकार ने 13 राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश की 16 देसी नस्लों को आधिकारिक पहचान (Native animal breeds gain new recognition) दे दी है। इससे सीधा फायदा उन लाखों ग्रामीण परिवारों को मिलेगा जो इन पशुओं को पालकर अपनी रोज़ी-रोटी चलाते हैं।
कौन-कौन सी नस्लें शामिल हैं?
इस लिस्ट में चार गाय की नस्लें शामिल हैं। जिसमें कर्नाटक की कोप्पल, मध्य प्रदेश की महाकौशली, केरल की पेरियार और महाराष्ट्र की उमरदा (Koppal in Karnataka, Mahakaushali in Madhya Pradesh, Periyar in Kerala, and Umarda in Maharashtra) हैं। भैंस में गोवा की गोमांचली (Goa’s Gomanchali) को जगह मिली है। बकरी में राजस्थान और उत्तर प्रदेश की बत्तीसी और राजस्थान की तोतापुरी (goats, there are the ‘Battisi’ breed from Rajasthan and Uttar Pradesh, and the ‘Totapuri’ breed from Rajasthan) शामिल हैं। भेड़ की चार नस्लें जिसमें असम की असोमी, उत्तराखंड की कौ डाबर, महाराष्ट्र-कर्नाटक की मडग्याल और बिहार की सीमांचली (Four sheep breeds: the Asomi from Assam, the Kau Dabar from Uttarakhand, the Madgyal from Maharashtra-Karnataka, and the Simanchali from Bihar) को भी मान्यता मिली है।
उत्तर प्रदेश का ब्रज गधा, जम्मू-कश्मीर का कश्मीरी घोड़ा, नागालैंड का नागल सूअर, सिक्किम का याक और तमिलनाडु का कोम्बई कुत्ता (Tamil Nadu’s Kombai dog) भी इस लिस्ट में हैं।
इस पहचान का असली मतलब क्या है?
हर नस्ल को एक Unique Accession Number दिया गया है। जैसे कोप्पल गाय (Koppal cow) का नंबर है- INDIA_CATTLE_0800_KOPPAL_03056। ये नंबर उस नस्ल की पहचान का साइंटिफिक बेस्ड बनेगा। अब तक देश में कुल 262 नस्लें रजिस्टर्ड हो चुकी हैं जिनमें 258 देसी और 4 संकर नस्लें हैं।
लेकिन सवाल ये है कि क्या सिर्फ रजिस्ट्रेशन से किसान की जेब में पैसा आएगा?सच्चाई ये है कि रजिस्ट्रेशन अपने आप में कोई सब्सिडी नहीं देता। ये एक बुनियाद है। जब कोई नस्ल आधिकारिक रूप से मान्यता प्राप्त हो जाती हैतो सरकारी योजनाओं, संरक्षण कार्यक्रमों और नस्ल सुधार परियोजनाओं का रास्ता खुलता है। किसान अब ये दावा कर सकता है कि उसके पास जो पशु हैवो कोई ‘अनजान’ नस्ल नहीं बल्कि एक मान्यता प्राप्त देसी संपदा है।
देसी नस्लों की असली ताकत क्या है?
इनमें ठोस वैज्ञानिक फायदे भी हैं। ये नस्लें सदियों से उस ख़ास इलाके की जलवायु, चारे और बीमारियों के साथ ढल चुकी हैं। गर्मी हो या सूखा, कम चारे की स्थिति हो या कोई स्थानीय रोग, ये पशु उन परिस्थितियों में भी टिके रहते हैं जहां विदेशी नस्लें मुश्किल से टिक पाती हैं। यही वजह है कि जलवायु परिवर्तन के इस दौर में देसी नस्लों का संरक्षण अब भविष्य की ज़रूरत भी बन गई है।
किसानों के लिए प्रैक्टिकल फायदा
जब एक नस्ल को सरकारी पहचान मिलती हैतो उसके प्रजनन और Marketing में मदद मिलती है। जैसे कि अगर किसी किसान के पास कोप्पल गाय हैतो अब वो इसे Registered breed के रूप में बेच सकता है। इससे उसकी कीमत और भरोसा दोनों बढ़ सकते हैं।
सरकार के इस कदम से उन पशुओं की संख्या बढ़ाने में मदद होगी जो विलुप्त हो रहे हैं। कई रिपोर्ट बताती है कि बहुत सारी देसी नस्लों की आबादी कम होती जा रही थी, क्योंकि किसान ज्यादा दूध देने वाली विदेशी नस्लों को पाल रहा था।
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