कोरबा जिले में खेती का परंपरागत स्वरूप अब तेजी से बदलता नजर आ रहा है। कभी केवल धान की फसल पर निर्भर रहने वाले किसान अब तिलहन और दलहन फसलों की ओर रुख कर रहे हैं, जिससे उनकी आमदनी में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हो रही है। कृषि विभाग के मार्गदर्शन और सरकारी योजनाओं के सहयोग से किसान नई तकनीकों को अपनाकर आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।
बंजर जमीन बनी उपजाऊ
वनांचल क्षेत्रों में भी खेती की नई तस्वीर उभर रही है। भटगांव गांव के किसान दिलीप कुमार कंवर इसकी मिसाल हैं। उन्होंने बताया कि पहले उनकी तीन एकड़ जमीन बंजर पड़ी रहती थी, जिससे कोई खास आय नहीं होती थी। लेकिन अब उन्होंने जैविक खाद और वैज्ञानिक खेती के तरीकों को अपनाकर उसी जमीन को उपजाऊ बना लिया है।
सूरजमुखी और अंतर फसल से बढ़ी आय
दिलीप कुमार कंवर ने अपनी जमीन पर सूरजमुखी की खेती शुरू की है, जो कम लागत में अच्छी पैदावार देने वाली फसल मानी जाती है। इसके साथ ही उन्होंने अंतर फसल (इंटरक्रॉपिंग) के रूप में मेढ़ों पर मूंगफली की खेती भी शुरू की है। इस दोहरी रणनीति से उन्हें एक ही खेत से दो फसलों का लाभ मिल रहा है, जिससे उनकी आय लगभग दोगुनी हो गई है।
वर्तमान में वे सालाना करीब 2 से ढाई लाख रुपये तक का मुनाफ़ा कमा रहे हैं। उनका कहना है कि सही मार्गदर्शन और मेहनत से बंजर जमीन भी सोना उगल सकती है।
कृषि विभाग का सहयोग
कृषि विभाग किसानों को पारंपरिक धान खेती से आगे बढ़कर तिलहन और दलहन फसलों की खेती अपनाने के लिए लगातार प्रोत्साहित कर रहा है। विभाग द्वारा किसानों को नई तकनीकों की जानकारी, उन्नत बीज, और आर्थिक सहायता उपलब्ध कराई जा रही है।
उप संचालक देवेंद्र पाल सिंह कंवर के अनुसार, राज्य सरकार की विभिन्न योजनाओं के तहत किसानों को प्रशिक्षण और संसाधन दिए जा रहे हैं। इसी का परिणाम है कि जिले में करीब 55 हेक्टेयर क्षेत्र में सूरजमुखी की खेती की जा रही है, जिससे किसानों को बेहतर लाभ मिल रहा है।
फसल विविधीकरण की ओर बढ़ते कदम
कोरबा जिले में फसल विविधीकरण की दिशा में तेजी से काम हो रहा है। किसान अब एक ही फसल पर निर्भर रहने के बजाय बहुफसली खेती अपना रहे हैं। इससे न केवल जोखिम कम हो रहा है, बल्कि मिट्टी की गुणवत्ता भी बेहतर बनी रहती है।
आत्मनिर्भरता की नई मिसाल
कृषि विभाग द्वारा संचालित प्रशिक्षण कार्यक्रमों और योजनाओं का लाभ उठाकर किसान आधुनिक तकनीकों को अपना रहे हैं। इससे उनकी उत्पादकता बढ़ रही है और आय के नए स्रोत भी विकसित हो रहे हैं। कोरबा जिले के किसान अब आत्मनिर्भरता की ओर मजबूती से कदम बढ़ा रहे हैं।
कुल मिलाकर, आकांक्षी जिला कोरबा में खेती का बदलता स्वरूप यह दर्शाता है कि यदि सही दिशा और संसाधन मिलें, तो किसान पारंपरिक सीमाओं से बाहर निकलकर बेहतर भविष्य की राह बना सकते हैं।
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