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तेलंगाना सरकार ने किसानों के लिए एक बहुत बड़ा और राहत भरा फैसला लिया है। राज्य सरकार ने कृषि यंत्रीकरण योजना (Agricultural Mechanization Scheme) को 2026-27 के लिए फिर से शुरू कर दिया है। इस बार योजना के लिए 147.99 करोड़ रुपये का बजट मंज़ूर किया गया है, जो पिछले साल के मुकाबले लगभग दोगुना है। कृषि मंत्री तुम्मला नागेश्वर राव ने ये जानकारी दी।
पिछले साल का हिसाब
2025-26 में इस योजना के लिए शुरुआत में 71 करोड़ रुपये रखे गए थे। इसमें से करीब 63 करोड़ रुपये यानी लगभग 89 फीसदी राशि खर्च हो गई थी। यानी किसानों ने योजना का पूरा फायदा उठाया। इस बार का आवंटन पिछले साल के कुल खर्च से भी करीब 85 करोड़ रुपये ज्यादा है। ये साफ दिखाता है कि सरकार किसानों को खेती के आधुनिक यंत्रों से जोड़ने को कितनी गंभीरता से ले रही है।
किसे कितनी सब्सिडी?
योजना के तहत अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (Scheduled Castes and Scheduled Tribes) के किसानों को कृषि यंत्र खरीदने पर 60 प्रतिशत तक सब्सिडी मिलेगी। वहीं पिछड़ा वर्ग और दूसरी कैटेगरी के किसानों को 40 फीसदी सब्सिडी दी जाएगी। सबसे बड़ी बात यह है कि सब्सिडी की राशि सीधे किसानों के बैंक खाते में डीबीटी के जरिए भेजी जाएगी। इससे बिचौलियों की भूमिका खत्म होगी और पैसा समय पर किसान तक पहुंचेगा।
ब्रांड की बाध्यता ख़त्म
राज्य सरकार ने इस बार एक अहम बदलाव किया है। अब किसानों को किसी ख़ास कंपनी या अधिकृत डीलर से ही यंत्र खरीदने की बाध्यता नहीं रहेगी। किसान किसी भी सूचीबद्ध (एंपैनल्ड) सप्लायर से अपनी पसंद का उपकरण खरीद सकेंगे।इससे किसानों को बेहतर दाम और गुणवत्ता दोनों मिलने की उम्मीद है।
केंद्र की गाइडलाइन का इंत़जार
राज्य सरकार स्थानीय और केंद्रीय दोनों तरह के फंड जोड़कर योजना के नए चरण को आगे बढ़ा रही है। फिलहाल राज्य केंद्र सरकार की Final Operational Guidelines का इंतजार कर रहा है। अधिकारियों को निर्देश दिए गए हैं कि गाइडलाइन मिलते ही लाभार्थियों का चुनाव तुरंत शुरू कर दिया जाए। रबी सीज़न की बुवाई के समय किसानों को ट्रैक्टर, पावर टिलर और दूसरे यंत्रों की सख़्त ज़रूरत होती है।
किसानों के लिए क्यों ज़रूरी है ये योजना?
तेलंगाना में छोटे और मझोले किसानों के लिए महंगे कृषि यंत्र ख़रीदना मुश्किल होता है। खेती में मजदूरों की कमी और बढ़ती मजदूरी के बीच ट्रैक्टर, पावर टिलर, थ्रेशर और रीपर जैसे यंत्र टाइम और लागत दोनों बचाने का ज़रिया बन रहे हैं। धान और कपास की कटाई के समय इनकी मांग सबसे ज्यादा रहती है। सब्सिडी न मिलने पर कई छोटे किसान इन्हें किराए पर लेने को मजबूर होते हैं।
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