जब हम ‘किसान’ शब्द सुनते हैं, तो हमारी आंखों के सामने अक्सर एक पुरुष का चेहरा उभरता है। लेकिन भारतीय खेतों की सच्चाई इससे बहुत अलग है। आज, जब देश डॉ. B.R. Ambedkar International Centre में राष्ट्रीय महिला किसान दिवस 2026 (Mahila Kisan Diwas 2026) मना रहा है, तो ये उस अनदेखी शक्ति को सम्मानित करने का अवसर है जो भारतीय कृषि की रीढ़ है।
आंकड़ों से परे की वास्तविकता
Periodic Labour Force Survey (PLFS) की लेटेस्ट रिपोर्ट के अनुसार, जनवरी-दिसंबर 2025 के दौरान भारत के कृषि कार्यबल (Agricultural workforce) में महिलाओं की हिस्सेदारी 59.8 फीसदी रही। ये आंकड़ा साफ बताता है कि खेतों में हाथ बटाने वाली ‘महिला‘ अब केवल सहयोगी नहीं, बल्कि मुख्य कृषक हैं। बीज बोने से लेकर फसल कटाई तक, पशुधन प्रबंधन, बीज संरक्षण और प्राकृतिक संसाधनों की देखभाल में उनका (Women Farmers’ Day 2026) योगदान अहम है।
ग्लोबल पहचान और इस साल की थीम
United Nation ने साल 2026 को “International Year of Women Farmers” (IYWF 2026) घोषित किया है। ये ग्लोबल मंच भारत के लिए अपनी नीतियों को और मज़बूत करने का मौका है। इस साल की थीम ‘विकसित कृषि एवं विकसित भारत के निर्माण में महिला किसानों की भूमिका’ (The Role of Women Farmers in Building a Developed Agriculture Sector and a Developed India) है। ये थीम केवल इमोशनल नहीं, बल्कि मॉडर्न टेक्नोलॉजी, फसल विविधीकरण (Crop diversification) और कृषि-आधारित उद्यमों के ज़रिये से महिलाओं को आगे रखने को बढ़ावा देता है।
बता दें कि संयुक्त राष्ट्र महासभा (United Nations General Assembly) ने दिसंबर 2007 में अंतरराष्ट्रीय ग्रामीण महिला दिवस (International Day of Rural Women) की स्थापना की थी। पहली बार ये दिवस 15 अक्टूबर 2008 को सेलिब्रेट किया गया था।
चुनौतियां जो अब भी बाकी हैं
हालांकि, ये उत्सव आत्ममंथन का भी पल है। ग्लोबल लेवल पर, महिला किसान भूमि उत्पादकता में 24 फीसदी के अंतर का सामना करती हैं। अत्यधिक गर्मी या सूखे के दिनों में उनकी फसल का मूल्य पुरुषों की तुलना में 3 फीसदी ज़्यादा गिरता है। भारत में भी, जहां 3.6 करोड़ महिलाएं खुद को किसान बताती हैं, वहीं भूमि स्वामित्व और संसाधनों तक उनकी पहुंच अभी भी सीमित है।
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