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देश में खेती को टिकाऊ और लाभकारी बनाने के लिए भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान लगातार प्रयास कर रहा है। इसी दिशा में “मेरा गांव-मेरा गौरव” कार्यक्रम के तहत संतुलित उर्वरक उपयोग को बढ़ावा देने के लिए एक महत्वपूर्ण कृषक संगोष्ठी का आयोजन किया गया।
ये कार्यक्रम उत्तर प्रदेश के हापुड़ जिले के ग्राम जसरोपनगर गोयाना में आयोजित हुआ, जिसमें बड़ी संख्या में किसानों ने भाग लिया। इस पहल का उद्देश्य किसानों को सही तरीके से उर्वरकों के उपयोग के बारे में जागरूक करना और खेती को अधिक टिकाऊ बनाना है।
किसानों की सक्रिय भागीदारी
इस संगोष्ठी में कुल 314 किसानों के साथ-साथ वैज्ञानिकों और कृषि अधिकारियों ने हिस्सा लिया। भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम में किसानों की सक्रिय भागीदारी देखने को मिली, जो इस बात का संकेत है कि किसान नई तकनीकों और जानकारी को अपनाने के लिए तैयार हैं।
संतुलित उर्वरक उपयोग को लेकर किसानों में जागरूकता बढ़ाना इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य रहा।
देशभर में चलेगा जागरूकता अभियान
ये आयोजन एक बड़े राष्ट्रीय अभियान का हिस्सा है। भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान के तहत देशभर में 129 वैज्ञानिक दल लगभग 700 गांवों का दौरा करेंगे। इस अभियान में क़रीब600 वैज्ञानिक शामिल हैं, जो किसानों के साथ सीधे संवाद कर उन्हें संतुलित उर्वरक उपयोग और सतत खेती के बारे में जानकारी देंगे।
इस पहल से उम्मीद है कि देश के अलग-अलग हिस्सों में खेती के तरीके में सकारात्मक बदलाव देखने को मिलेगा।
मृदा परीक्षण और संतुलित पोषक तत्वों पर ज़ोर
कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में बोलते हुए भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान के निदेशक डॉ. सीएच. श्रीनिवास राव ने किसानों को मृदा परीक्षण के महत्व के बारे में बताया। उन्होंने कहा कि बिना मृदा परीक्षण के उर्वरक डालना सही नहीं है। किसानों को केवल यूरिया पर निर्भर नहीं रहना चाहिए, बल्कि नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटाश का संतुलित उपयोग करना चाहिए।
इस तरह का संतुलित उर्वरक उपयोग मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने और बेहतर उत्पादन के लिए ज़रूरी है।
जैविक और आधुनिक तकनीकों की जानकारी
कार्यक्रम में किसानों को हरित खाद, जैव उर्वरक, वर्मी कम्पोस्टिंग, मल्चिंग और संरक्षित खेती जैसी तकनीकों के बारे में भी जानकारी दी गई। भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिकों ने बताया कि इन तकनीकों के जरिए किसान कम लागत में बेहतर उत्पादन हासिल कर सकते हैं।
इसके अलावा किसानों को ये भी बताया गया कि फ़सल अवशेषों को जलाने के बजाय उन्हें जैविक खाद में बदलकर उपयोग किया जा सकता है। ये भी संतुलित उर्वरक उपयोग का एक अहम हिस्सा है।
पूसा तकनीकों का प्रदर्शन
संगोष्ठी में किसानों के लिए पूसा एसटीएफआर मीटर, पूसा जैव उर्वरक और पूसा डीकम्पोजर पर व्याख्यान और लाइव प्रदर्शन भी आयोजित किए गए। इन सत्रों के माध्यम से किसानों को मृदा स्वास्थ्य, एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन और कम्पोस्टिंग तकनीकों की जानकारी दी गई। भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान द्वारा विकसित ये तकनीकें किसानों के लिए काफ़ी उपयोगी साबित हो सकती हैं।
फ़सल विविधीकरण और सतत खेती पर चर्चा
कार्यक्रम में फ़सल विविधीकरण और सतत खेती के महत्व पर भी चर्चा की गई। किसानों को दलहनी फ़सलों की खेती और उनकी उत्पादकता बढ़ाने के तरीके बताए गए। संतुलित उर्वरक उपयोग के साथ-साथ ये भी ज़रूरी है कि किसान अलग-अलग फ़सलों को अपनाएं, जिससे मिट्टी की गुणवत्ता बनी रहे और आय में भी वृद्धि हो सके।
किसानों को दी गई उपयोगी जानकारी
कार्यक्रम के दौरान किसानों को संतुलित उर्वरक उपयोग और मृदा स्वास्थ्य से जुड़ी जानकारी देने के लिए साहित्य भी वितरित किया गया। इससे किसान घर जाकर भी इन जानकारियों का उपयोग कर सकते हैं और अपने खेत में बेहतर तरीके से खेती कर सकते हैं।
विशेषज्ञों की मौजूदगी
इस कार्यक्रम में भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान के कई वरिष्ठ वैज्ञानिक और अधिकारी उपस्थित रहे। इनमें डॉ. आर. एन. पडारिया, डॉ. देबाशीष मंडल, डॉ. लिवलीन शुक्ला, डॉ. बृजेश मिश्रा, डॉ. राजीव कुमार, डॉ. दिनेश कुमार, डॉ. संदीप लाल और डॉ. देबरूप दास जैसे विशेषज्ञ शामिल थे।
इन विशेषज्ञों ने किसानों के सवालों का जवाब दिया और उन्हें व्यावहारिक सुझाव भी दिए।
आगे की दिशा
ये पहल दिखाती है कि भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान खेती को टिकाऊ और पर्यावरण के अनुकूल बनाने के लिए लगातार काम कर रहा है। संतुलित उर्वरक उपयोग को बढ़ावा देकर न केवल मिट्टी की सेहत सुधारी जा सकती है, बल्कि किसानों की लागत भी कम की जा सकती है और उनकी आय बढ़ाई जा सकती है।
आने वाले समय में इस तरह के कार्यक्रम किसानों को नई तकनीक अपनाने के लिए प्रेरित करेंगे और खेती को एक मज़बूत और लाभकारी व्यवसाय बनाने में मदद करेंगे।
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