तरबूज से त्रासदी: हमारी खाद्य व्यवस्था पर सवाल

गर्मी का मौसम कभी आम और तरबूज की मिठास का पर्याय हुआ करता था। बाज़ारों में रंग और रस का उत्सव दिखाई देता था। लेकिन अब वही फल संदेह के घेरे में हैं।

मुंबई से आई एक ख़बर ने इस गर्मी के मौसम को असहज बना दिया है-तरबूज खाने के बाद एक ही परिवार के चार लोगों की मौत। प्रथम दृष्टया यह खाद्य विषाक्तता का मामला माना जा रहा है, पर इसका असर किसी एक घर की त्रासदी तक सीमित नहीं है। यह घटना हमारे समय के उस बड़े संकट को उजागर करती है, जहां भोजन, जो जीवन का आधार है अब आशंका का कारण बनता जा रहा है।

उपभोक्ताओं के मन में उठता सवाल

गर्मी का मौसम कभी आम और तरबूज की मिठास का पर्याय हुआ करता था। बाज़ारों में रंग और रस का उत्सव दिखाई देता था। लेकिन अब वही फल संदेह के घेरे में हैं। उपभोक्ता के मन में सवाल उठता है-क्या यह फल प्राकृतिक है या रसायनों से “तैयार” किया गया है? क्या यह ताजगी का प्रतीक है या स्वास्थ्य के लिए जोखिम? भरोसे का यह क्षरण अचानक नहीं हुआ। यह धीरे-धीरे पनपा है-मिलावट, लापरवाही और कमजोर निगरानी के कारण। आज स्थिति यह है कि आम आदमी अपने ही भोजन के प्रति आश्वस्त नहीं है। फल खरीदते समय स्वाद से पहले सुरक्षा की चिंता करनी पड़ती है। कई लोग अब खुलकर कहते हैं कि जब तक फल किसी परिचित के यहां से न आए, तब तक मन नहीं मानता। यह एक खतरनाक संकेत है-समाज में खाद्य व्यवस्था के प्रति भरोसा टूट रहा है।

सिर्फ तरबूज ही नहीं खाद्य सामान में भी त्रासदी

यह संकट अब केवल फलों तक सीमित नहीं रहा। मसालों से लेकर आटा और बड़े-बड़े ब्रांड की पैक्ड खाद्य सामग्री तक, मिलावट की आशंका ने हर रसोई में जगह बना ली है। उपभोक्ता यह मानकर चलने लगा है कि “शुद्ध” अब अपवाद है, सामान्य नहीं। ऐसे में सबसे बड़ा प्रश्न यही है आखिर जाएं तो जाएं कहां? बाज़ार पर भरोसा टूटे तो विकल्प क्या बचता है? ऐसे समय में इतिहास की ओर देखना स्वाभाविक है। अलाऊद्दीन खिलजी के शासनकाल का उदाहरण अक्सर दिया जाता है, जब बाज़ार नियंत्रण कड़े थे और मिलावट पर सख्त सजा मिलती थी। व्यापारियों के बीच नियम तोड़ने का भय था, जिससे उपभोक्ता का भरोसा बना रहता था। यह तुलना आज के लोकतांत्रिक ढांचे पर सवाल नहीं उठाती, बल्कि यह पूछती है कि क्या हमारी वर्तमान व्यवस्था में जवाबदेही और प्रभावशीलता का अभाव है?

खाद्य सुरक्षा के कानून और संस्थाओं पर उठता सवाल!

आज भारत में खाद्य सुरक्षा के लिए कानून और संस्थाएं मौजूद हैं, परंतु उनकी कार्यप्रणाली अक्सर घटना के बाद सक्रिय होती है। निरीक्षण सीमित हैं, दंड प्रक्रिया लंबी है और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई में देरी आम बात है। इस बीच, उपभोक्ता जोखिम उठाता रहता है। यह स्थिति केवल प्रशासनिक कमी नहीं, बल्कि नीति और क्रियान्वयन के बीच की दूरी को भी दर्शाती है। इस संकट का समाधान किसी एक पक्ष के पास नहीं है। सरकार को निगरानी तंत्र को मजबूत करना होगा, त्वरित जांच और दंड सुनिश्चित करना होगा, तथा खाद्य सुरक्षा को प्राथमिकता देनी होगी। व्यापारियों को अल्पकालिक लाभ के बजाय दीर्घकालिक विश्वास को महत्व देना होगा। और उपभोक्ताओं को भी जागरूक रहना होगा-सवाल पूछना, स्रोत पर ध्यान देना और संदिग्ध उत्पादों से बचना अब आवश्यक हो गया है।

पारदर्शिता और जवाबदेही को लागू करना

दरअसल, जरूरत किसी पुराने कठोर शासन मॉडल को अपनाने की नहीं, बल्कि उसके मूल सिद्धांतों -कड़ाई, पारदर्शिता और जवाबदेही को आधुनिक व्यवस्था में प्रभावी ढंग से लागू करने की है। यदि कानून का डर समाप्त हो जाता है, तो अनियमितता सामान्य हो जाती है। अंततः यह मुद्दा केवल तरबूज या आम का नहीं है। यह उस भरोसे का प्रश्न है जो हमारी थाली में होना चाहिए। जब भोजन के साथ भय जुड़ जाए, तो समझना चाहिए कि समस्या गहरी है। गर्मी हर वर्ष आएगी, फल भी आएंगे। पर एक स्वस्थ समाज के लिए यह जरूरी है कि वे भय नहीं, भरोसा लेकर आएं।

ये लेख डॉ. मीना कुमारी (जांगिड) द्वारा लिखा गया है। लेखिका स्कॉलर, पत्रकार और स्वतंत्र लेखिका हैं।

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