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हाल ही में भारत-अमेरिका व्यापार वार्ता (India-US trade talks) के तहत DDGS (Distillers Dried Grains and Soluble) आयात को लेकर कुछ वर्गों में चिंता देखी गई। लेकिन क्या ये चिंता वाकई जायज़ है? आंकड़े और आर्थिक समझ कुछ और ही कहानी बयां करती है। आइए, डर की बजाय फैक्ट को समझते हैं।
डीडीजीएस है क्या?
सबसे पहले, ये समझना ज़रूरी है कि डीडीजीएस (DDGS) कोई गेहूं या चावल नहीं है, जो सीधे हमारी रसोई या खाद्य सुरक्षा से जुड़ा हो। ये Ethanol production (मुख्यतः मक्का से) का एक उप-उत्पाद (By-products) है, जिसका इस्तेमाल दुनियाभर में पशु आहार के रूप में होता है। ये प्रोटीन से भरपूर होता है और पोल्ट्री व पशुपालन को सस्ता और पौष्टिक चारा उपलब्ध कराता है।
सीमित मात्रा का कोई बड़ा खतरा नहीं
चिंता का सबसे बड़ी वजह बाजार पर इसके प्रभाव को लेकर है। भारत में हर साल पशु आहार की कुल मांग लगभग 600 लाख टन है। प्रस्तावित आयात (Proposed import) की सीमा महज 5 लाख टन प्रति वर्ष है। ये कुल मांग का 1 फीसदी से भी कम है।
सोचिए, क्या 1 फीसदी की हिस्सेदारी 600 लाख टन के विशाल घरेलू बाजार को अस्थिर कर सकती है? बिल्कुल नहीं। हमारा पशु आहार उद्योग (animal feed industry) आज भी पूरी तरह देशी मक्का, सोयाबीन खली और दूसरे लोकल प्रोडक्ट पर निर्भर है। इतनी कम मात्रा से न तो मक्का के दाम गिरेंगे और न ही किसानों की आमदनी प्रभावित होगी। डीडीजीएस मक्का या सोयाबीन (DDGS Maize or Soybean) का ऑप्शन नहीं, बल्कि एक पूरक है।
एमएसपी और सरकारी संरक्षण
चिंता ये भी है कि कहीं यह आयात न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) व्यवस्था पर हमला तो नहीं है? जवाब है- नहीं। एमएसपी का दायरा गेहूं, धान जैसी main food crops पर बेस्ड है, जिन्हें सरकार ने Highly sensitive category में रखा है। डीडीजीएस आयात से एमएसपी पर कोई असर नहीं पड़ता।
जीएम (GM) का डर: वैज्ञानिक नज़रिया
कई लोग आशंका जताते हैं कि अमेरिकी डीडीजीएस जीएम (DDGS GM) मक्का से बनता है। वैज्ञानिक दृष्टि से समझिए- DDGS बनाने के लिए मक्का को अत्यधिक किण्वन (fermentation) और high temperature से गुजारा जाता है। इस प्रोसेस में कोई भी Living transgenic DNA पूरी तरह नष्ट हो जाता है। साथ ही, भारत का FSSAI सख्त है। उसने 1 फीसदी की Casual GM उपस्थिति की सीमा तय कर रखी है और Certification Mandatory किया है। कोई भी संदिग्ध खेप भारत में दाखिल नहीं हो सकती।
डीडीजीएस आयात भारतीय किसानों के लिए कोई संकट नहीं है। यह महज 1 फीसदी हिस्सेदारी वाला, कड़े नियमों में बंधा एक Trade Agreement है। ये कदम न तो कृषि संरक्षण को कमजोर करता है और न ही घरेलू बाजार को, बल्कि यह हमारे तेजी से बढ़ते पशुपालन क्षेत्र को सस्ता और गुणवत्तापूर्ण आहार देने का एक संतुलित प्रयास है।

