‘7th Agrivoltaics World Conference’ का आगाज़: शिवराज सिंह चौहान बोले-किसान अब ऊर्जादाता भी बनेगा

भारत मंडपम में तीन दिवसीय '77th Agrivoltaics World Conference' का उद्घाटन हुआ। मंच पर जर्मनी के राजदूत डॉ. जैस्पर विक, ISA के महानिदेशक आशीष खन्ना, सचिव संतोष कुमार सारंगी, अतीश चंद्रा और डॉ. मांगी लाल जाट सहित कई गणमान्य उपस्थित रहे।

इमेजिन करें एक ऐसे खेत की जहां ऊपर आसमान की ओर ताकते सौर पैनल बिजली बनाते हैं, और नीचे उसी ज़मीन पर लहलहाती फसलें अन्न देती हैं। ये कोई सपना नहीं, बल्कि एग्रीवोल्टाइक तकनीक की ज़मीनी हकीकत है, जिसे अब भारत एक राष्ट्रीय आंदोलन बनाने की तैयारी में है। 21 अक्टूबर 2026 को नई दिल्ली के भारत मंडपम में तीन दिवसीय ‘7th Agrivoltaics World Conference’ का उद्घाटन इसी दिशा में एक बड़ा कदम साबित हो रहा है।

अन्नदाता भी और ऊर्जादाता भी

केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने अपने संबोधन में कहा कि देश का किसान अब केवल ‘अन्नदाता’ नहीं, बल्कि सौर ऊर्जा अपनाकर वास्तविक अर्थों में ‘अन्नदाता भी और ऊर्जादाता भी’ बनने जा रहा है। उन्होंने इसे सरल देसी अंदाज में समझाते हुए कहा कि ये “आम के आम और गुठलियों के दाम” जैसा सशक्त मॉडल है। पुरानी कहावत ‘रहिमन पानी राखिये’ को नया रूप देते हुए उन्होंने कहा कि आज के युग में ‘रहिमन बिजली राखिये’  क्योंकि आधुनिक खेती बिना बिजली के अधूरी है।

छोटे किसान ही असली केंद्र बिंदु

सबसे अहम बात ये रही कि कृषि मंत्री ने नीति-निर्माताओं और वैज्ञानिकों के सामने जमीनी सच्चाई रखी। भारत में औसत भूमि जोत मात्र 0.96 हेक्टेयर है और 85 फीसदी से ज़्यादा किसान छोटे व सीमांत हैं। ऐसे में ऐसा मॉडल चाहिए जो छोटे किसान के खेत पर व्यावहारिक रूप से सफल हो।  

ऊर्जा क्रांति के आंकड़े

केंद्रीय नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्री प्रह्लाद जोशी (Union Minister for New and Renewable Energy Pralhad Joshi) ने बताया कि ये 7वां संस्करण अब तक का सबसे बड़ा और ऐतिहासिक सम्मेलन है। उन्होंने गर्व से कहा कि भारत आज 7.8 फीसदी जीडीपी बढ़ोतरी के साथ दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था है। देश की बिजली क्षमता 2014 से पहले लगभग 249 गीगावाट थी, जो आज 560 गीगावाट से ज़्यादा हो चुकी है। इसमें गैर-जीवाश्म क्षमता 308 गीगावाट पार कर गई है। सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि सौर बिजली की लागत 11 रुपये प्रति यूनिट से घटकर मात्र 2.60 रुपये प्रति यूनिट रह गई है।

टेरी स्टडी का बड़ा खुलासा

केंद्रीय मंत्री जोशी ने ‘टेरी’ (TERI) की स्टडी का हवाला देते हुए बताया कि देश की 11.6 करोड़ हेक्टेयर कृषि भूमि में से 4.75 करोड़ हेक्टेयर (लगभग 30 फीसदी ) एग्रीवोल्टाइक के लिए तकनीकी रूप से पूरी तरह उपयुक्त है। इसमें महाराष्ट्र, राजस्थान, आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश, कर्नाटक और उत्तर प्रदेश की 50 प्रतिशत हिस्सेदारी है। हैरान करने वाला फैक्ट ये है कि अगर इस उपयुक्त भूमि के मात्र 10 फीसदी हिस्से पर भी एग्रीवोल्टाइक लगा दिया जाए, तो भारत वर्ष 2050 तक की अपनी पूरी अनुमानित बिजली मांग अकेले इसी से पूरी कर सकता है। 

पीएम कुसुम और रोज़गार

पीएम कुसुम योजना के तहत अब तक 30 लाख कृषि पंप सौर ऊर्जा से जोड़े जा चुके हैं, जिससे किसानों को रात की जोखिम भरी सिंचाई से मुक्ति मिली है। सरकार जल्द ही पीएम कुसुम के अगले चरण में दुनिया का सबसे महत्वाकांक्षी एग्रीवोल्टाइक कार्यक्रम शुरू करने जा रही है, जिससे लगभग 3.32 लाख पूर्णकालिक स्थानीय रोजगार पैदा होंगे — यानी गाँव के युवाओं को शहरों की ओर पलायन नहीं करना पड़ेगा।

 उद्घाटन सत्र में एग्रीवोल्टाइक से जुड़े Technical tools and communication materials का विमोचन भी किया गया, जिससे किसान खेत स्तर पर सही फैसले ले सकेंगे। मंच पर जर्मनी के राजदूत डॉ. जैस्पर विक, ISA के महानिदेशक आशीष खन्ना, सचिव संतोष कुमार सारंगी, अतीश चंद्रा और डॉ. मांगी लाल जाट सहित कई गणमान्य उपस्थित रहे।

 

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सम्पर्क सूत्र: किसान साथी यदि खेती-किसानी से जुड़ी जानकारी या अनुभव हमारे साथ साझा करना चाहें तो हमें फ़ोन नम्बर 9599273766 पर कॉल करके या kisanofindia.mail@gmail.com पर ईमेल लिखकर या फिर अपनी बात को रिकॉर्ड करके हमें भेज सकते हैं। किसान ऑफ़ इंडिया के ज़रिये हम आपकी बात लोगों तक पहुँचाएँगे, क्योंकि हम मानते हैं कि किसान उन्नत तो देश ख़ुशहाल।

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