नारियल उत्पादन से ग्लोबल मार्केट तक बढ़ रही भारत की ताक़त, किसानों की आय और रोज़गार को मिल रहा सहारा

नारियल उत्पादन में भारत दुनिया में नंबर वन है, अब सरकारी योजनाओं और निर्यात बढ़ोतरी से किसानों को नए अवसर मिल रहे हैं।

भारत में नारियल सिर्फ़ एक फल या खेती की फ़सल नहीं है, बल्कि यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था, रोज़गार और कई तरह के छोटे उद्योगों से जुड़ा हुआ क्षेत्र है। क़रीब तीन हजार साल से भारतीय कृषि और संस्कृति का हिस्सा रहा नारियल आज value-added products और exports के जरिए वैश्विक बाज़ार में भी अपनी जगह मज़बूत कर रहा है। क़रीब 3 करोड़ लोग, जिनमें लगभग 1 करोड़ किसान शामिल हैं, इस क्षेत्र पर निर्भर हैं।

वैश्विक स्तर पर भारत की मज़बूत स्थिति

भारत दुनिया में नारियल उत्पादन में पहले स्थान पर है और खेती के क्षेत्रफल के मामले में तीसरे स्थान पर है। वैश्विक नारियल उत्पादन में भारत की हिस्सेदारी 31.24 प्रतिशत और खेती के क्षेत्रफल में 17.90 प्रतिशत है। कृषि एवं किसान कल्याण विभाग के आंकड़ों के अनुसार, 2024-25 में देश में क़रीब 2.19 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्र से 20,301.22 मिलियन नारियल का उत्पादन हुआ। औसत उत्पादकता 9,249 नारियल प्रति हेक्टेयर रही।

देश के अलग-अलग राज्यों की भी इसमें ख़ास भूमिका है। केरल में नारियल का सबसे बड़ा क्षेत्र है, जो क़रीब 7.54 लाख हेक्टेयर है। तमिलनाडु नारियल उत्पादन में आगे है, जबकि आंध्र प्रदेश उत्पादकता के मामले में पहले स्थान पर है।

इस तरह भारत का नारियल क्षेत्र केवल उत्पादन के लिहाज से ही महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि छोटे और सीमांत किसानों की आजीविका से भी सीधे जुड़ा है। इसकी ख़ासियत यह है कि नारियल से खाने-पीने की चीजों के अलावा fibre, timber, fuel और कई दूसरे raw materials भी मिलते हैं। यही बहुउपयोगिता इसे ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण बनाती है।

छत्तीसगढ़ में नारियल के साथ बढ़ी खेती की नई संभावनाएं

नारियल उत्पादन का एक दिलचस्प उदाहरण छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में देखने को मिलता है। यहां किसान पारंपरिक रूप से धान, मोटे अनाज और मक्का जैसी फ़सलों पर निर्भर रहे हैं। Coconut Development Board के DSP Farm, Kondagaon की मदद से किसानों को नारियल की खेती के साथ intercrop लगाने की तकनीक के बारे में प्रशिक्षण दिया गया।

बकावंड ब्लॉक के किसान ईशांश सिंह राठौर इसका उदाहरण हैं। उन्होंने क़रीब 2,500 नारियल के पौधे लगाए, जिनमें लगभग 500 पौधों से उत्पादन शुरू हो चुका था। उन्होंने नारियल के साथ pineapple, dragon fruit, mango, citrus और कई अन्य फ़सलों को शामिल करते हुए multitier cropping system अपनाया। उनके खेत से नारियल से सालाना क़रीब 5 से 6 लाख रुपये और intercrops से क़रीब 10 लाख रुपये की आय हुई। यह मॉडल दिखाता है कि नारियल उत्पादन को दूसरी फ़सलों के साथ जोड़कर ज़मीन और आय दोनों का बेहतर इस्तेमाल किया जा सकता है।

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निर्यात में value-added products का बढ़ता हिस्सा

अब भारत का नारियल क्षेत्र केवल कच्चे नारियल तक सीमित नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में coconut products के exports में तेजी आई है। 2025-26 में नारियल उत्पादों का export ₹7,038.35 करोड़ यानी क़रीब 794.70 मिलियन डॉलर तक पहुंच गया, जो पिछले साल के ₹4,349.03 करोड़ से 62 प्रतिशत अधिक है। 2001-02 में यही export केवल ₹25.3 करोड़ था।

नारियल उत्पादन से जुड़े कारोबार में अब virgin coconut oil, coconut milk, coconut water, activated carbon, copra और fresh, frozen या grated coconut जैसे products शामिल हैं। भारतीय उत्पादों की पहुंच Middle East से आगे बढ़कर Europe, America और Australia तक पहुंच चुकी है। पिछले पांच वर्षों में USA, UAE, Sri Lanka, Germany, Russia, Turkey, Belgium, UK और Netherlands प्रमुख trading partners रहे हैं।

किसानों के लिए MSP और सरकारी योजनाओं का सहारा

नारियल उत्पादन को बढ़ावा देने में Coconut Development Board की बड़ी भूमिका है। 1981 में स्थापित यह बोर्ड देश के 22 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में नारियल क्षेत्र के विकास से जुड़े काम करता है। इसके तहत quality planting material, क्षेत्र विस्तार, productivity बढ़ाने, pest और disease management तथा product diversification पर काम किया जाता है। 2025-26 में बोर्ड की गतिविधियों के लिए ₹147.21 करोड़ जारी किए गए।

किसानों को बेहतर क़ीमत दिलाने के लिए copra पर MSP भी तय किया जाता है। 2026 season के लिए milling copra का MSP ₹12,027 प्रति क्विंटल और ball copra का MSP ₹12,500 प्रति क्विंटल तय किया गया है। यह 2025 की तुलना में क्रमशः ₹445 और ₹400 प्रति क्विंटल की बढ़ोतरी है।

वहीं, quality seedlings की उपलब्धता और नए क्षेत्रों में खेती बढ़ाने पर भी ज़ोर दिया जा रहा है। 2025-26 में 11 DSP Farms के जरिए 2.41 लाख quality coconut seedlings तैयार किए गए। इसी अवधि में क़रीब 2,175 हेक्टेयर नए क्षेत्र को नारियल की खेती के तहत लाया गया।

पुराने बागों के rejuvenation से बढ़ेगा उत्पादन

भारत का नारियल क्षेत्र बढ़ाने के साथ पुराने और बीमार पेड़ों को बदलना भी ज़रूरी है। Replanting और rejuvenation scheme के तहत खराब, पुराने और कम उत्पादन देने वाले पेड़ों को quality seedlings से बदलने और मौजूदा पेड़ों की देखभाल पर सहायता दी जाती है। पिछले पांच वर्षों में इस योजना के तहत 25,517 हेक्टेयर क्षेत्र कवर किया गया। 2025-26 में 1,672 हेक्टेयर क्षेत्र में rejuvenation का काम हुआ।

इसके अलावा coconut-based cropping system के जरिए productivity बढ़ाने पर भी काम हो रहा है। 2025-26 में इस programme के तहत 18,800 हेक्टेयर क्षेत्र कवर किया गया और 48,696 किसानों को फ़ायदा मिला।

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Coconut Promotion Scheme से नई दिशा

Union Budget 2026-27 में Coconut Promotion Scheme की घोषणा की गई है। इसका उद्देश्य coconut production और productivity को बढ़ाना है। इसके तहत quality seedlings का बड़े स्तर पर उत्पादन, नए क्षेत्रों में खेती का विस्तार, पुराने बागों का phased replanting और rejuvenation, crop health management तथा integrated processing units स्थापित करने जैसे कदम शामिल हैं।

भारत का नारियल क्षेत्र अब खेती से आगे बढ़कर processing, entrepreneurship और employment का भी आधार बन रहा है। Friends of Coconut Tree programme के तहत युवाओं को tree climbing और plant protection की training दी जाती है। 2024-25 में 378 palm climbers को training मिली। Cocomitra के जरिए trained climbers को 6 से 10 सदस्यों वाली registered units में संगठित किया जा रहा है।

इसी तरह Kera Kaushal Kendra के जरिए coconut shell, wood और fibre से handicraft products बनाने वाले groups को बढ़ावा दिया जा रहा है। Neera tapping और processing के लिए भी 7 दिन की field-based training दी जाती है। 2025-26 में Coconut Development Board ने 414 awareness training programmes आयोजित किए।

खेती से वैश्विक बाज़ार तक बढ़ता दायरा

भारत का नारियल क्षेत्र परंपरागत खेती से आगे बढ़कर production, processing, exports, skill development और rural entrepreneurship से जुड़ रहा है। नारियल उत्पादन बढ़ाने के लिए नई planting, पुराने बागों के rejuvenation, quality seedlings और scientific farming पर काम हो रहा है, जबकि value addition से किसानों और उद्यमियों के लिए बाज़ार का दायरा बढ़ रहा है।

आने वाले समय में नारियल उत्पादन की मज़बूती केवल ज़्यादा पेड़ लगाने से नहीं, बल्कि बेहतर productivity, processing, quality और market access से तय होगी। सरकारी योजनाओं, किसान समूहों, skill development और export support के साथ भारत का नारियल क्षेत्र एक ऐसे कृषि क्षेत्र के रूप में आगे बढ़ रहा है, जिसमें खेती के साथ ग्रामीण रोज़गार और value-added business की भी बड़ी संभावनाएं हैं।

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