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उत्तर भारत के छह राज्यों और केंद्र शासित प्रदेश दिल्ली के बीच एक ऐतिहासिक समझौता हुआ। जिसने 32 साल से अटकी किशाऊ बहुउद्देशीय परियोजना (Kishau Multipurpose Project) का रास्ता साफ कर दिया। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और जल शक्ति मंत्री सी.आर. पाटिल की मौजूदगी में उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान और दिल्ली के मुख्यमंत्रियों ने समझौते पर सिग्नेचर किए।
ये परियोजना टोंस नदी पर बनेगी, जो यमुना की प्रमुख सहायक नदी है और उत्तराखंड-हिमाचल प्रदेश की सीमा पर बहती है। इसके तहत 232.6 मीटर ऊंचा कंक्रीट ग्रेविटी बांध बनाया जाएगा, जिसकी जल भंडारण क्षमता लगभग 1,562 मिलियन क्यूबिक मीटर होगी।
क्यों अटकी रही परियोजना?
किशाऊ परियोजना की नींव 1994 के ऊपरी यमुना जल समझौते में रखी गई थी, लेकिन आर्थिक बोझ और राज्यों के हितों के टकराव ने इसे आठ साल तक ठप कर दिया। हिमाचल प्रदेश ने लगातार ये तर्क दिया कि परियोजना से उसकी भूमि जलमग्न होगी और विस्थापन होगा, जबकि पानी का फायदा दिल्ली, हरियाणा और राजस्थान जैसे राज्यों को मिलेगा। पिछली सरकार की ओर से तय किया गया 800 करोड़ रुपये का राज्य का हिस्सा वर्तमान सरकार ने अस्वीकार कर दिया था।
केंद्र उठाएगा 90 फीसदी खर्च
नए समझौते के तहत केंद्र सरकार परियोजना की लागत का 90 फीसदी वहन करेगी, जबकि बाकी 10 फीसदी छह राज्य मिलकर उठाएंगे । सबसे बड़ी जीत हिमाचल प्रदेश के लिए है। उसके पावर कंपोनेंट का खर्च दिल्ली और राजस्थान मिलकर उठाएंगे। बदले में हिमाचल अपना पानी इन राज्यों को देगा। हिमाचल को बिजली बेचने से हर साल 1,000 करोड़ रुपये से ज़्यादा की आमदनी होने की उम्मीद है।
दिल्ली को सबसे बड़ा फायदा क्यों?
गृह मंत्री अमित शाह ने साफ कहा कि इस परियोजना का सबसे बड़ा फायदा दिल्ली को मिलेगा। दिल्ली को एक्स्ट्रा 109.9 मिलियन क्यूबिक मीटर पानी मिलेगा, जो राजधानी की पेयजल सुरक्षा को मजबूत करेगा । इससे भी बड़ी बात यह है कि परियोजना से यमुना नदी का पर्यावरणीय फ्लो बनाए रखने में मदद मिलेगी। अब तक यमुना में नदी को जिंदा रखने के लिए पर्याप्त पानी नहीं छोड़ा जाता था, जिससे दिल्ली में नदी की हालत खराब हुई। किशाऊ के पानी का 25 फीसदी हिस्सा यमुना के पर्यावरणीय प्रवाह के लिए इस्तेमाल होगा।
छह राज्यों को अलग-अलग फायदा
परियोजना से 97,000 हेक्टेयर भूमि की सिंचाई होगी और हर साल लगभग 1,476 मिलियन यूनिट स्वच्छ बिजली पैदा होगी। उत्तराखंड और हिमाचल परियोजना के मुख्य भौगोलिक क्षेत्र हैं। उत्तर प्रदेश, हरियाणा और राजस्थान को सिंचाई और पेयजल का लाभ मिलेगा, जबकि दिल्ली के लिए यह परियोजना रणनीतिक महत्व की है।
अमित शाह ने इसे मोदी सरकार के तहत सुलझाया गया दसवां बड़ा अंतरराज्यीय जल विवाद बताया। उन्होंने कहा कि लखवार और रेणुकाजी जैसे विवादों के समाधान के बाद किशाऊ पर सहमति बनना संभव हुआ।
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