लद्दाख में पहली बार बड़े पैमाने पर केसर की खेती शुरू,लेह में 90 हजार ईरानी कॉर्म्स लगाए गए

इस प्रयोग के लिए ईरान से प्रीमियम क्वालिटी वाले कॉर्म्स मंगाए गए हैं। इन कॉर्म्स का घेरा 8 से 10 सेंटीमीटर, व्यास 2.5 से 3 सेंटीमीटर और वजन कम से कम 10 ग्राम है।

लद्दाख की ज़मीन पर अब सेब और जौ के साथ-साथ केसर की खुशबू भी महकेगी। केंद्र शासित प्रदेश में पहली बार बड़े पैमाने पर केसर की खेती (Saffron cultivation) का प्रयोग शुरू किया गया है। लेह के स्पितुक फड़का (Spituk Phadka, Leh) में करीब 4,000 वर्ग मीटर बंजर ज़मीन पर 90 हजार प्रीमियम ईरानी केसर के कॉर्म्स (Iranian saffron corms) लगाए गए हैं, जिनका वजन लगभग 800 किलोग्राम है ।

बंजर ज़मीन का कायाकल्प

इस पहल की सबसे बड़ी ख़ासियत ये है कि जिस ज़मीन पर केसर उगाया जा रहा है, वो पहले पूरी तरह बंजर थी। ‘Project Him Sarovar’ के तहत इस ज़मीन को दोबारा उपजाऊ बनाया गया। Igu-Pei Irrigation Canal को बहाल करके एक्स्ट्रा पानी बंजर भूमि तक पहुंचाया गया, जिससे मिट्टी में नमी बढ़ी और खेती की संभावना बनी। इस क्षेत्र में चार जलाशय भी बनाए गए हैं, जिनकी कुल भंडारण क्षमता करीब 2.4 करोड़ लीटर है।

क्यों ईरानी कॉर्म्स?

इस प्रयोग के लिए ईरान से प्रीमियम क्वालिटी वाले कॉर्म्स मंगाए गए हैं। इन कॉर्म्स का घेरा 8 से 10 सेंटीमीटर, व्यास 2.5 से 3 सेंटीमीटर और वजन कम से कम 10 ग्राम है। कृषि एक्सपर्ट के मुताबिक, ये ख़ासियतें हाई क्वालिटी वाले केसर के उत्पादन के लिए सबसे उपयुक्त मानी जाती हैं। लद्दाख की ऊंचाई और ठंडी जलवायु को ध्यान में रखते हुए इन कॉर्म्स का चयन किया गया है।

किसानों की आमदनी बढ़ाने की कोशिश

उपराज्यपाल विनय कुमार सक्सेना ने इस पहल को Agricultural Diversification से जोड़ा है। उनका कहना है कि लद्दाख की विशिष्ट कृषि-जलवायु परिस्थितियों में केसर जैसी उच्च मूल्य वाली फसल स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूत करने की व्यापक संभावनाएं रखती है । अगर यह प्रयोग सफल होता है, तो किसानों को अतिरिक्त आय का जरिया मिल सकता है। इससे यह गलत धारणा भी दूर होगी कि लद्दाख में केसर नहीं उगाया जा सकता ।

युवाओं और स्वयं सहायता समूहों के लिए अवसर

इस परियोजना का फायदा केवल किसानों तक सीमित नहीं है। केसर की देखभाल, फूलों की तुड़ाई, रेशों को अलग करना, सुखाना, पैकेजिंग और बाजार तक पहुंचाने जैसे कामों में स्थानीय युवाओं और स्वयं सहायता समूहों को रोजगार मिल सकता है । लद्दाख प्रशासन इससे पहले लिलियम और ग्लैडियोलस की खेती का सफल प्रयोग कर चुका है, जिससे किसानों और स्थानीय उद्यमियों के लिए नए अवसर बने हैं ।

पहली फसल पर टिकी नज़र

फिलहाल यह एक प्रयोगात्मक परियोजना है। अब यह देखना होगा कि लद्दाख की ऊंचाई, ठंडे मौसम, मिट्टी और पानी की परिस्थितियों में केसर की फसल कैसी रहती है। पहली कटाई के परिणाम और केसर की सुगंध-रंग तय करेंगे कि इस मॉडल को पूरे लद्दाख में कैसे विस्तार दिया जाएगा । अगर पैदावार और गुणवत्ता अच्छी रही, तो यह छोटी-सी क्यारी आगे चलकर बड़े खेतों का रास्ता खोल सकती है।

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