Kharif Crops MSP 2026-27 | मानसून की दस्तक के साथ ही देश के खेतों में एक नई तैयारी शुरू हो जाती है। कहीं धान की नर्सरी तैयार होती है, कहीं बाजरा और मक्का की बुवाई की चर्चा शुरू हो जाती है। ऐसे समय में MSP यानी न्यूनतम समर्थन मूल्य का ऐलान किसानों के लिए सिर्फ़ एक सरकारी घोषणा नहीं, बल्कि पूरे सीजन की दिशा तय करने वाला फैसला बन जाता है।
इस बार सरकार ने खरीफ़ सीज़न 2026-27 के लिए 14 फसलों के MSP में बढ़ोतरी की है। सूरजमुखी, कपास, तिल और नाइजरसीड जैसी फसलों में अच्छी बढ़ोतरी देखने को मिली है। सरकार का कहना है कि इसका उद्देश्य किसानों को उनकी उपज का बेहतर दाम देना और खेती को ज़्यादा से ज़्यादा लाभकारी बनाना है।
आखिर MSP होता क्या है?
MSP यानी Minimum Support Price वो न्यूनतम कीमत है जिस पर सरकार किसानों से फसल खरीदने की गारंटी देती है। अगर बाजार में दाम गिर जाएं, तब भी किसान को कम से कम MSP मिल सके, यही इसका मकसद है।
हर साल खरीफ़ और रबी सीज़न से पहले सरकार कुछ प्रमुख फसलों का MSP तय करती है। ये फैसला कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (CACP) की सिफ़ारिशों के आधार पर लिया जाता है।
इस बार किन फसलों पर ज़्यादा फ़ोकस दिखा?
इस बार MSP बढ़ोतरी में तिलहन और दलहन फसलों पर ख़ास ध्यान दिखाई देता है:
- सूरजमुखी के बीज पर 622 रुपये प्रति क्विंटल की बढ़ोतरी
- कपास पर 557 रुपये
- नाइजरसीड पर 515 रुपये
- तिल पर 500 रुपये की बढ़ोतरी
इससे साफ़ संकेत मिलता है कि सरकार सिर्फ़ धान और गेहूं तक सीमित नहीं रहना चाहती, बल्कि तिलहन और दलहन की खेती को भी बढ़ावा देना चाहती है।
सरकार तिलहन और दालों पर इतना ज़ोर क्यों दे रही है?
भारत आज भी खाने के तेल और कई दालों के मामले में बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर है। हर साल अरबों डॉलर का खाद्य तेल विदेशों से आता है। ऐसे में सरकार चाहती है कि किसान ज़्यादा से ज़्यादा सोयाबीन, सूरजमुखी, तिल और अरहर जैसी फसलें उगाएं ताकि आयात कम हो सके।
इसके पीछे दूसरा कारण पानी भी है। धान जैसी फसलें बहुत ज़्यादा पानी मांगती हैं। पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में धान की खेती की वजह से भूजल तेजी से नीचे जा रहा है। इसलिए सरकार Crop Diversification यानी फसल विविधीकरण को बढ़ावा देना चाहती है।
मोटे अनाज फिर चर्चा में क्यों हैं?
बाजरा, रागी, अरहर और मूंग जैसी फसलों में भी बढ़ोतरी की गई है। कुछ साल पहले तक बाजरा और रागी को गांवों तक सीमित फसल माना जाता था। लेकिन अब इन्हें “श्री अन्न” के रूप में नई पहचान मिली है।
हेल्थ और न्यूट्रिशन को लेकर बढ़ती जागरूकता के कारण शहरों में भी इनकी मांग बढ़ रही है। इसी वजह से MSP में इन फसलों को महत्व देना खेती और पोषण दोनों नज़रिए से अहम माना जा रहा है।
सरकार के आंकड़े क्या कहते हैं?
सरकार का दावा है कि पिछले एक दशक में MSP खरीद और किसानों को भुगतान दोनों में बड़ा इज़ाफ़ा हुआ है।
2014-15 से 2025-26 के बीच सरकार ने करीब 8418 लाख मीट्रिक टन धान खरीदा, जबकि इससे पहले 2004-05 से 2013-14 के दौरान ये आंकड़ा 4590 लाख मीट्रिक टन था। यानी धान की सरकारी खरीद लगभग दोगुनी हुई है।
इसी तरह 14 खरीफ़ फसलों की कुल खरीद 2014-15 से 2025-26 के दौरान 8746 लाख मीट्रिक टन रही, जबकि इससे पहले के दस सालों में यह 4679 लाख मीट्रिक टन थी।
किसानों को MSP के ज़रिए मिलने वाले भुगतान में भी बड़ा अंतर देखने को मिला है। धान उगाने वाले किसानों को 2014-15 से 2025-26 के बीच करीब 16.08 लाख करोड़ रुपये का भुगतान किया गया, जबकि 2004-05 से 2013-14 के दौरान ये राशि 4.44 लाख करोड़ रुपये थी।
वहीं 14 खरीफ़ फसलों के किसानों को MSP के तहत 2014-15 से 2025-26 के दौरान करीब 18.99 लाख करोड़ रुपये मिले, जबकि इससे पहले के दस सालों में ये राशि 4.75 लाख करोड़ रुपये थी।
लागत और मुनाफ़े का गणित
सरकार का कहना है कि MSP इस तरह तय किया गया है कि किसानों को उत्पादन लागत पर कम से कम 50 प्रतिशत मुनाफ़ा मिले। मूंग में ये लाभ 61 प्रतिशत बताया गया है, जबकि बाजरा और मक्का में 56 प्रतिशत और अरहर में 54 प्रतिशत का अनुमान है।
किसानों के लिए इसका क्या मतलब है?
अगर इस फैसले को ज़मीन पर सही तरीके से लागू किया जाए तो:
- किसानों को बेहतर दाम मिलेंगे
- तिलहन और दालों की खेती बढ़ेगी
- पानी बचाने वाली फसलों को बढ़ावा मिलेगा
- आयात पर निर्भरता घटेगी
MSP की चर्चा क्यों ख़ास होती है?
MSP सिर्फ़ आर्थिक शब्द नहीं है। ये सीधे किसान की मेहनत, फसल और उम्मीद से जुड़ा होता है। जब MSP बढ़ता है, तो गांवों में अगले सीज़न को लेकर नई बातचीत शुरू होती है- कौन-सी फसल बोई जाए, किसमें फ़ायदा बेहतर रहेगा और बाज़ार का रुख कैसा रह सकता है। इस तरह MSP का असर सिर्फ़ मंडियों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि खेतों से लेकर गांव की अर्थव्यवस्था तक महसूस किया जाता है।
तालिका: खरीफ़ फसलों के लिए 2026-27 का न्यूनतम समर्थन मूल्य (रुपये प्रति क्विंटल)
| क्र.सं. | फसल | एमएसपी 2026-27 | लागत* केएमएस 2026-27 | लागत पर मार्जिन (%) | एमएसपी (2025-2026) |
| 1 | धान (सामान्य) | 2441 | 1627 | 50% | 2369 |
| 2 | धान (ग्रेड ए) | 2461 | – | – | 2389 |
| 3 | ज्वार (हाइब्रिड) | 4023 | 2682 | 50% | 3699 |
| 4 | ज्वार (मालदंडी) | 4073 | – | – | 3749 |
| 5 | बाजरा | 2900 | 1858 | 56% | 2775 |
| 6 | रागी | 5205 | 3470 | 50% | 4886 |
| 7 | मक्का | 2410 | 1544 | 56% | 2400 |
| 8 | तुर / अरहर | 8450 | 5496 | 54% | 8000 |
| 9 | मूंग | 8780 | 5438 | 61% | 8768 |
| 10 | उरद | 8200 | 5418 | 51% | 7800 |
| 11 | मूंगफली | 7517 | 5011 | 50% | 7263 |
| 12 | सूरजमुखी के बीज | 8343 | 5562 | 50% | 7721 |
| 13 | पीली सोयाबीन | 5708 | 3805 | 50% | 5328 |
| 14 | तिल | 10346 | 6897 | 50% | 9846 |
| 15 | नाइजरसीड | 10052 | 6701 | 50% | 9537 |
| 16 | कपास (मध्यम रेशा) | 8267 | 5511 | 50% | 7710 |
| 17 | कपास (लंबा रेशा) | 8667 | – | – | 8110 |
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