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भारत की माटी से जुड़े उन महानायकों को सलाम, जिन्होंने अपनी जिंदगी का एक-एक पल खेती-किसानी को समर्पित कर दिया। पद्म पुरस्कार 2026 (Padma Awards 2026) ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि असली क्रांति गांवों में, खेतों में और रीसर्च लैब में दिन-रात जुटे वैज्ञानिकों और किसानों के हाथों में होती है। इस साल कृषि क्षेत्र में अतुलनीय योगदान के लिए आठ हस्तियों को पद्म श्री सम्मान (Padma Shri Award) मिला है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) ने इन्हें ‘भारतीय कृषि का गौरव’ कहा है। आइए, इन क्रांतिकारियों को विस्तार से जानें।
डॉ. ए.के. सिंह : बासमती के जादूगर
अगर आप दुनिया को भारतीय बासमती का स्वाद चटका रहे हैं तो इसके पीछे डॉ. ए.के. सिंह की मेहनत है। IARI के पूर्व निदेशक ने बासमती चावल की 25 उन्नत किस्में विकसित कीं। हैरान करने वाला आंकड़ा ये है कि इन किस्मों से हर साल 50 हज़ार करोड़ रुपये का विदेशी मुद्रा भंडार बनता है। यानी हर मिनट लगभग 1 करोड़ रुपये का एक्सपोर्ट सिर्फ डॉ. सिंह की देन है।
डॉ. गोपाल जी त्रिवेदी : लीची किसानों के भगीरथ
बिहार के इस वैज्ञानिक ने लीची के पुराने बागानों में ऐसी तकनीक अपनाई कि प्रोडक्शन दोगुनी हो गई। वो भी बिना नए पेड़ लगाए। उन्होंने सिखाया कि कैसे पानी भरे इलाकों में मखाना और सिंघाड़ा किसानों की आमदनी का नया जरिया बन सकता है।
डॉ. के.रामासामी : प्रकृति के वैज्ञानिक
तमिलनाडु के वैज्ञानिक डॉ के. रामासामी ने 30 से ज़्यादा शोध परियोजनाएं चलाईं। उनकी ख़ासियत? प्राकृतिक खेती, बायोगैस और फर्टी-इरिगेशन जैसी आधुनिक तकनीकों को किसानों के खेतों की मिट्टी से जोड़ना। उन्होंने साबित किया कि रसायनों के बिना भी भरपूर पैदावार हो सकती है।
डॉ. प्रेम लाल गौतम : बीजों के संरक्षक
हिमाचल के वैज्ञानिक डॉ प्रेम लाल गौतम ने पौधों के आनुवंशिक संसाधनों को बचाने का बीड़ा उठाया। उनके प्रयासों से कई लुप्त होती फसलें वापस ज़मीन पर लौट आईं। कृषि शिक्षा को नई दिशा देने वाले डॉ. गौतम हमारी जैव-विविधता के असली रखवाले हैं।
श्रीरंग देवबा लाड : कपास का चमत्कार
महाराष्ट्र के इस प्रगतिशील किसान ने जो कर दिखाया, उसे देखकर वैज्ञानिक भी हैरान हैं। उनकी ‘Dada Lad Cotton Technique’ ने बीज कपास की पैदावार 300 फीसदी तक बढ़ा दी। किसानों की आमदनी में 40 फीसदी से अधिक का उछाल। यानी जहां पहले 1 क्विंटल पैदा होता था, वहां अब 4 क्विंटल।
जोगेश देउरी : रेशम से बुनी ग्रामीणों की किस्मत
असम के जोगेश देउरी ने विश्व प्रसिद्ध मूगा रेशम को बचाने के साथ उसे वैश्विक पहचान दिलाई। पारंपरिक तरीकों में आधुनिक विज्ञान का तड़का लगाकर उन्होंने हजारों परिवारों के लिए टिकाऊ रोजगार का रास्ता बनाया। आज उनके इलाके की हर महिला रेशम उद्योग से जुड़ी है।
रघुपत सिंह (मरणोपरांत) : विलुप्त सब्जियों को जीवनदान
मुरादाबाद के इस अनोखे किसान ने जो किया, वो किसी बड़ी प्रयोगशाला की चुनौती है। उन्होंने राजमा की 23 उन्नत किस्में विकसित कीं, और लगभग विलुप्त 55 सब्जियों को दोबारा जमीन पर उगाया। सबसे चौंकाने वाली खोज-1.5 मीटर लंबी लौकी! यानी लगभग एक इंसान जितनी। उनके जाने के बाद अब सरकार उनके काम को आगे बढ़ा रही है।
राम रेड्डी मामिडी (मरणोपरांत) : सहकारिता के सूरज
तेलंगाना के इस समाजसेवी ने दूध और पशुपालन को सहकारी समितियों से जोड़कर ग्रामीण अर्थव्यवस्था की नींव रखी। उन्होंने महिला-नेतृत्व वाली संस्थाओं को सशक्त बनाया। आज उनके बनाए मॉडल से हजारों गांवों की महिलाएं आत्मनिर्भर हैं।
ICAR के महानिदेशक ने कहा, ‘ये 8 नाम भारतीय कृषि के उस सुनहरे अध्याय को लिख रहे हैं, जहां विज्ञान, मेहनत और जुनून का अद्भुत संगम है।’ पद्म पुरस्कार सिर्फ एक सम्मान नहीं, बल्कि पूरे देश के किसानों के लिए एक संदेश है -तुम्हारी मेहनत रंग लाती है, तुम्हारे प्रयोग बदलाव लाते हैं, और तुम ही इस देश की असली संपत्ति हो।’

