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गर्मियों का मौसम आते ही जिस फल की हर किसी को बेसब्री से इंतज़ार होता है वो है आम (Mango)। लेकिन इस साल आम प्रेमियों (Mango Lovers) और किसानों दोनों के लिए ये सीज़न किसी झटके से कम नहीं है। ईरान और इज़राइल-अमेरिका (Iran and Israel–America War) के बीच चल रहे वॉर ने भारत के आम निर्यात (Mango Export) को बुरी तरह प्रभावित किया है। एक तरफ जहां विदेशों में माल भेजना बंद हो गया है, वहीं दूसरी तरफ घरेलू बाजारों में आम की कीमतों में भारी गिरावट दर्ज की जा रही है।
ये स्थिति इतनी गंभीर है कि महाराष्ट्र के फेमस हापुस (Alphonso Mango) आम और आंध्र प्रदेश के तोतापुरी आम का फ्यूचर अधर में लटक गया है। आइए, इस लड़ाई से आम पर पड़ने वाले गहरे असर को विस्तार से समझते हैं।
युद्ध ने कैसे रोका आम का रास्ता?
भारत दुनिया का सबसे बड़ा आम उत्पादक देश है (India is the world’s largest producer of mangoes)। हर साल हम यहां से 35,000 मीट्रिक टन से अधिक आम एक्सपोर्ट किए जाते हैं, जिससे करीब 600 करोड़ रुपये की कमाई होती है। खाड़ी देश (Gulf Countries) जैसे UAE, सऊदी अरब, कुवैत और कतर, भारत के 40-45 फीसदी आम के सबसे बड़े खरीदार हैं।
ये लड़ाई सिर्फ ज़मीन पर ही नहीं, बल्कि समुद्र और हवाई रास्तों पर भी लड़ा जा रहा है। ईरान ने प्रमुख व्यापारिक जलडमरूमध्य होर्मुज (Strait of Hormuz) को बंद कर दिया है। इस वजह से भारत के सबसे बड़े बंदरगाह जवाहरलाल नेहरू पोर्ट (JNPA) मुंबई में अकेले 1,200 से अधिक कंटेनर फंसे हुए हैं, जिनमें से अधिकतर में फल और सब्जियां हैं। ये कंटेनर जो कि रमजान के पीक सीजन में भेजे गए थे, अब सड़ रहे हैं।
माल ढुलाई के दाम आसमान पर, किसान डूबे
एक्सपोर्ट बंद होने का सीधा असर लॉजिस्टिक्स पर पड़ा। निर्यातक बता रहे हैं कि पहले जहां एक कंटेनर भाड़ा 600 डॉलर से 1,800 डॉसर तक होता था, वो युद्ध के बाद बढ़कर 4,000 से 6,000 डॉलर (करीब 5 लाख रुपये तक) पहुंच गया है। रेफ्रिजेरेटेड कंटेनर (Reefer) की किल्लत भी हो गई है, जो आम को ताजा रखने के लिए सबसे ज़रूरी होते हैं।
जब समुद्र का रास्ता बंद हुआ तो निर्यातकों ने हवाई मार्ग का रुख किया, लेकिन वहां भी हालात खराब हैं। खाड़ी की एयरलाइंस ने उड़ानें रोक दीं, और जो कुछ उड़ानें चल भी रही हैं, उन्होंने किराए को 4 से 5 गुना बढ़ा दिया है, जो लगभग 1,000 रूपये प्रति किलो तक पहुंच गया है। इतने महंगे भाड़े पर आम भेजना व्यापारियों के लिए नुकसान का सौदा बन गया है।
घरेलू बाज़ार में कीमतों का कोहराम
जब निर्यात नहीं हो पाता तो पूरा माल भारत के अंदर ही आ जाता है। इस अचानक आपूर्ति (Oversupply) ने घरेलू बाजारों में कीमतों को धराशायी कर दिया है। ये स्थिति किसानों के लिए दोहरी मार से कम नहीं है।
महाराष्ट्र के कोकण क्षेत्र में इस बार उत्पादन पहले से ही 80 फीसदी तक कम होने का अनुमान था। ऊपर से युद्ध ने आम के निर्यात को पूरी तरह बंद कर दिया है, जिससे किसान मायूस हैं। आंध्र प्रदेश के रायलसीमा क्षेत्र में तोतापुरी आम से बनने वाला पल्प (गूदा) ज्यादातर खाड़ी देशों में जाता है, वो भी ठप है।
क्या है आगे का रास्ता?
वॉर का ये संकट आम के बागानों से लेकर निर्यात कंपनियों तक सबको तबाह कर रहा है। एक्सपर्ट्स का कहना है कि अगर ये स्थिति जून-जुलाई तक जारी रही, तो ये सुनहरे फल का सीजन पूरी तरह बर्बाद हो जाएगा। केंद्र सरकार ने 497 करोड़ रूपये के राहत पैकेज की घोषणा तो की है, लेकिन किसानों को असली राहत तभी मिलेगी जब ये युद्ध थमेगा या व्यापार के नए रास्ते खोजे जाएंगे।
फिलहाल, आम प्रेमियों के लिए ये सीजन महंगा हो सकता है, लेकिन जो किसान अपनी मेहनत की उपज सड़कों पर फेंकने को मजबूर हैं, उनके लिए ये सबसे बुरा समय है।

