Table of Contents
सोचिए, अगर आपके खेत की मिट्टी ही बीमार पड़ जाए तो क्या होगा? आप जितनी मेहनत करें, जितनी खाद-पानी डालें, फसल पहले जैसी नहीं होगी। यही कहानी अब पूरे भारत में एक साथ देखने को मिल रही है। ये जानकारी ‘रीइमैजिनिंग इंडियन एग्रीकल्चर: अनलॉकिंग द रीजेनेरेटिव अपॉर्च्युनिटी’ (A report ‘Reimagining Indian Agriculture: Unlocking the Regenerative Opportunity’) नाम की रिपोर्ट में दी गई है। इस रिपोर्ट की मानें तो 2024 तक भारत की करीब 11.5 से 12 करोड़ हेक्टेयर ज़मीन किसी न किसी रूप में ख़राब हो चुकी है। यानी देश के कुल भू-भाग का लगभग 33 फीसदी। रिपोर्ट में ICAR-Indian Institute of Soil Science के आंकड़ों का हवाला है।
मिट्टी कैसे बीमार पड़ रही है?
मिट्टी का क्षरण यानी soil degradation का मतलब है कि मिट्टी की क्वालिटी और प्रोडक्शन पावर का लगातार गिरना। ये कई तरीकों से हो रहा है। बारिश और हवा के साथ खेत की ऊपरी उपजाऊ मिट्टी बह जाती है। लगातार एक ही फसल उगाने से मिट्टी के पोषक तत्व खत्म हो जाते हैं। ज़्यादा सिंचाई और केमिकल खादों के इस्तेमाल से ज़मीन में नमक जमा होने लगता है, जिसे लवणीयता कहते हैं। आईसीएआर की स्टडी के मुताबिक, भारत में खेती योग्य लगभग 14 करोड़ हेक्टेयर भूमि में से 9 करोड़ हेक्टेयर से ज्यादा ज़मीन में मिट्टी के जैविक पदार्थ और उर्वरता की गंभीर समस्या देखी गई है।
इसका सीधा मतलब यह है कि किसान को उतनी ही फसल के लिए पहले से ज्यादा यूरिया, डीएपी और कीटनाशक डालने पड़ रहे हैं।
समाधान क्या है?
रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि सिर्फ खाद-बीज के सब्सिडी से काम नहीं चलेगा। ‘Regenerative Agriculture’ की तरफ बढ़ना होगा। इसमें कम जुताई, ढंक फसलें, फसल चक्र, कृषि वानिकी और पशुधन को खेती से जोड़ने जैसे तरीके अपनाए जाते हैं। इससे मिट्टी में जैविक कार्बन बढ़ता है, पानी सोखने की ताकत बढ़ती है और रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता घटती है।
लेकिन सच्चाई ये भी है कि इसे बड़े पैमाने पर अपनाना आसान नहीं है। शुरुआती लागत ज्यादा, किसानों को कर्ज या आर्थिक मदद मिलने में दिक्कत, और शुरू में पैदावार घटने का डर ये बड़ी चुनौतियां हैं।
सरकार की कोशिशें, फिर भी कहां है कमी?
भारत में कुछ योजनाएं पहले से चल रही हैं। राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन के लिए 2,481 करोड़ रुपये मंजूर हुए हैं, जिसका टारगेट 1 करोड़ किसानों को ट्रेनिंग देना है। अग्री-श्योर फंड के लिए 750 करोड़ रुपये का प्रावधान है। परंपरागत कृषि विकास योजना के तहत जैविक खेती करने वाले समूहों को तीन साल में 31,500 रुपये प्रति हेक्टेयर मिलते हैं।
रिपोर्ट की सिफारिश है कि सरकार को सिर्फ खाद-बीज की सब्सिडी तक सीमित नहीं रहना चाहिए। किसानों को नतीजों के आधार पर प्रोत्साहन मिलना चाहिए।
मिट्टी को कैसे जिंदा रखा जाए ?
भारत की आधी से ज़्यादा आबादी आज भी खेती पर निर्भर है। अगर मिट्टी ही बीमार होगी तो न खाना बनेगा, न कमाई होगी। ज़रूरत इस बात की है कि किसान को सिर्फ़ ‘ज्यादा उगाओ’ न कहा जाए, बल्कि ये सिखाया जाए कि मिट्टी को कैसे जिंदा रखा जाए। क्योंकि मिट्टी जिंदा रहेगी, तभी किसान जिंदा रहेगा।
ये भी पढ़ें : किसानों के लिए बड़ी ख़बर: केंद्र सरकार का ऐतिहासिक फैसला,अब खेतों में हो सकेगा एनहाइड्रस अमोनिया का इस्तेमाल
सम्पर्क सूत्र: किसान साथी यदि खेती-किसानी से जुड़ी जानकारी या अनुभव हमारे साथ साझा करना चाहें तो हमें फ़ोन नम्बर 9599273766 पर कॉल करके या kisanofindia.mail@gmail.com पर ईमेल लिखकर या फिर अपनी बात को रिकॉर्ड करके हमें भेज सकते हैं। किसान ऑफ़ इंडिया के ज़रिये हम आपकी बात लोगों तक पहुंचाएंगे, क्योंकि हम मानते हैं कि किसान उन्नत तो देश ख़ुशहाल।

