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Safflower cultivation: सवाई माधोपुर जिले में किसानों की आय बढ़ाने और फसल विविधीकरण को प्रोत्साहन देने के उद्देश्य से एक नई और अभिनव पहल की शुरुआत हुई है। कृषि विज्ञान केंद्र के प्रयासों से यहां पहली बार कुसुम (सैफ्लावर) की खेती शुरू की गई है, जो कम पानी में तैयार होने वाली फसल मानी जाती है।सवाई माधोपुर में करीबन 1 हेक्टेयर में कुसुम की फसल लगाई गई ।
Safflower cultivation मे कम पानी में ज्यादा फ़ायदा
कृषि वैज्ञानिक डॉ भरतलाल मीना ने बताया कि कुसुम की फसल खासतौर पर शुष्क और कम वर्षा वाले क्षेत्रों के लिए उपयुक्त मानी जाती है। सवाई माधोपुर जैसे इलाकों में, जहां जल संसाधन सीमित हैं, यह फसल किसानों के लिए एक बेहतर विकल्प बनकर उभर रही है।
जलवायु के प्रति सहनशील फसल
कृषि वैज्ञानिक डॉ भरतलाल मीना ने कहा कि कुसुम एक ऐसी फसल है जो सूखा और ठंड दोनों परिस्थितियों को सहन कर सकती है। यह गुण इसे जलवायु परिवर्तन के दौर में और भी महत्वपूर्ण बना देता है। बदलते मौसम के बीच किसानों को स्थिर उत्पादन देने में यह फसल मददगार साबित हो सकती है।
पोषण और औषधीय गुणों से भरपूर
कुसुम के बीजों में 25 से 45 प्रतिशत तक तेल पाया जाता है, जो स्वास्थ्य के लिए फ़ायदेमंद होता है। इसका तेल ओमेगा-6 फैटी एसिड, ओलिक अम्ल और विटामिन-ई से भरपूर होता है। डॉ. भरतलाल मीना ने आग कहा कि कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित करने, वजन संतुलन बनाए रखने और त्वचा व बालों की सेहत के लिए फ़ायदेमंद है।
इसके अलावा, कुसुम के फूलों की पंखुड़ियां भी औषधीय गुणों से भरपूर होती हैं। इनमें कैल्शियम, आयरन, मैग्नीशियम और फाइबर अधिक मात्रा में पाए जाते हैं, जो इसे आयुर्वेदिक और घरेलू उपचारों में उपयोगी बनाते हैं।
किसानों के लिए आर्थिक अवसर
भरतलाल मीना आगे बताते हैं कि कुसुम की खेती केवल स्वास्थ्य ही नहीं बल्कि आर्थिक दृष्टि से भी फ़ायदेमंद साबित हो रही है। एक हेक्टेयर क्षेत्र से लगभग 80 से 100 किलो तक सूखी पंखुड़ियां प्राप्त होती हैं, ये बाज़ार में 1000- 1500 रुपए किलो बिक जाती हैं। इसके अलावा, बीजों से निकलने वाला तेल भी किसानों की आय बढ़ाने में मदद करता है।
फसल विविधीकरण की दिशा में बड़ा कदम
कृषि विज्ञान केंद्र द्वारा शुरू की गई यह पहल फसल विविधीकरण को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। इससे न केवल किसानों की आय के नए स्रोत विकसित होंगे, बल्कि पारंपरिक खेती पर निर्भरता भी कम होगी।
भविष्य की संभावनाएं
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि कुसुम की खेती को सही तकनीक और बाज़ार से जोड़ा जाए, तो यह सवाई माधोपुर के किसानों के लिए गेम चेंजर साबित हो सकती है। आने वाले समय में यह फसल जिले की पहचान बन सकती है और अन्य क्षेत्रों के लिए भी प्रेरणा का स्रोत बन सकती है। कुल मिलाकर, कुसुम की खेती की यह शुरुआत न केवल कृषि क्षेत्र में नवाचार का उदाहरण है, बल्कि किसानों के उज्जवल भविष्य की दिशा में एक मज़बूत कदम भी है।
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