“पराली से समृद्धि की अर्थव्यवस्था”- मिट्टी की सेहत, स्वच्छ ऊर्जा और किसान की अतिरिक्त आय का संसाधन है

जरूरत पराली को देखने का नजरिया बदलने की है—कचरे से संसाधन की ओर, समस्या से अवसर की ओर और अवशेष से समृद्ध अर्थव्यवस्था की ओर।

“पराली से समृद्धि की अर्थव्यवस्था”- मिट्टी की सेहत, स्वच्छ ऊर्जा और किसान की अतिरिक्त आय का संसाधन है

लेखक:
डॉ. राजबीर सिंह
उप महानिदेशक, विस्तार एवं कृषि अभियांत्रिकी, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद

 

हर फसल अपने पीछे कुछ छोड़ जाती है। खेत में बचा यह अवशेष लंबे समय से हमारी भाषा और नीति, दोनों में ‘पराली’ या ‘कचरे’ के रूप में दर्ज होता रहा है। लेकिन सवाल यह है कि क्या जिसे हम कचरा कह रहे हैं, वह वास्तव में कचरा है? शायद नहीं।

यही फसल अवशेष मिट्टी में जैविक पदार्थ लौटा सकता है, नमी बचा सकता है, पोषक तत्वों का चक्र बनाए रख सकता है, ऊर्जा का स्रोत बन सकता है और ग्रामीण अर्थव्यवस्था में किसान के लिए अतिरिक्त आय का आधार तैयार कर सकता है। इसलिए पराली की चुनौती को केवल ‘जलाने’ की समस्या के रूप में देखना उसके वास्तविक आर्थिक और पर्यावरणीय महत्व को सीमित कर देना है।

जरूरत पराली को देखने का नजरिया बदलने की है—कचरे से संसाधन की ओर, समस्या से अवसर की ओर और अवशेष से समृद्ध अर्थव्यवस्था की ओर।

भारत में हर वर्ष लगभग 68.3 करोड़ टन फसल अवशेष पैदा होता है, जिसमें करीब 17.8 करोड़ टन अतिरिक्त बायोमास है। धान और गेहूं इसका बड़ा हिस्सा हैं। विशेषकर पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के धान-गेहूं क्षेत्र में धान की कटाई और गेहूं की बुवाई के बीच समय का अंतर बहुत कम होता है। कई बार किसान के सामने महज दो-तीन सप्ताह में अगली फसल की तैयारी करने की चुनौती होती है। ऐसे में पराली जलाना उसे खेत साफ करने का सबसे तेज और आसान विकल्प दिखाई देता है।

लेकिन खेत की आग केवल सूखी पराली नहीं जलाती। उसके साथ मिट्टी का जैविक पदार्थ, पोषक तत्व और पर्यावरणीय संतुलन भी प्रभावित होता है। वायु प्रदूषण और ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन की समस्या अलग है।

इसलिए वास्तविक सवाल यह नहीं होना चाहिए कि ‘पराली क्यों जलाई जा रही है?’
बड़ा सवाल यह होना चाहिए कि ‘किसान को पराली जलाने से बेहतर विकल्प कितनी आसानी, कम लागत और आर्थिक लाभ के साथ उपलब्ध है?’

विकल्प मिलें तो बदलाव संभव है

पिछले कुछ वर्षों में भारत ने फसल अवशेष प्रबंधन की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। वर्ष 2018-19 से 2025-26 तक इसके लिए 3,926 करोड़ रुपये से अधिक की सहायता जारी की गई। इस दौरान 42 हजार से अधिक कस्टम हायरिंग सेंटर स्थापित हुए और 3.24 लाख से अधिक कृषि मशीनें किसानों तथा इन केंद्रों तक पहुंचाई गईं।

इस व्यवस्था का महत्व केवल मशीन उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं है। महंगी कृषि मशीनरी छोटे और सीमांत किसानों की पहुंच से बाहर हो सकती है। कस्टम हायरिंग सेंटर उस बाधा को कम करते हैं—किसान मशीन खरीदने के बजाय जरूरत के समय उसे किराये पर ले सकता है।

पंजाब और हरियाणा में सामने आए आंकड़े बताते हैं कि निरंतर प्रयासों से बदलाव संभव है। वर्ष 2025 के धान कटाई मौसम में पंजाब में खेतों में आग की 5,114 घटनाएं दर्ज हुईं, जबकि हरियाणा में यह संख्या 662 रही। वर्ष 2021 की तुलना में पंजाब में लगभग 93 प्रतिशत और हरियाणा में 91 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई।

इस अनुभव से एक महत्वपूर्ण नीति-संदेश निकलता है-

किसान समस्या का हिस्सा नहीं, समाधान का सबसे महत्वपूर्ण भागीदार है।

जब तकनीक उपलब्ध हो, आर्थिक सहायता मिले, समय पर मशीन मिले, स्थानीय स्तर पर मार्गदर्शन हो और विकल्प व्यवहार्य हो, तो किसान बदलाव को अपनाता है।

खेत का अवशेष खेत की ताकत बने

फसल अवशेष प्रबंधन का पहला विकल्प होना चाहिए—जहां संभव हो, अवशेष को खेत में ही वापस लौटाना।

हैप्पी सीडर, स्मार्ट सीडर और सुपर सीडर जैसी तकनीकें धान के अवशेष के बीच गेहूं की बुवाई को संभव बनाती हैं। इससे खेत तैयार करने में लगने वाला समय, ईंधन और श्रम कम हो सकता है तथा मिट्टी में नमी का संरक्षण बेहतर हो सकता है।

नवोन्मेषी सीडर जैसी मशीनें अवशेषों को मिट्टी में मिलाते हुए बीज और उर्वरक की बुवाई कर सकती हैं। इसके लिए कंबाइन हार्वेस्टर में सुपर स्ट्रॉ मैनेजमेंट सिस्टम (SMS) का उपयोग भी महत्वपूर्ण है, ताकि कटाई के बाद पुआल खेत में समान रूप से फैल सके।

यह केवल मशीनों की कहानी नहीं है। इसके पीछे मिट्टी का एक बड़ा विज्ञान है।

फसल अवशेष खेत में रहने से जैविक कार्बन, सूक्ष्मजीवी गतिविधि, नमी संरक्षण और पोषक तत्वों के चक्रण को बढ़ावा मिल सकता है। पंजाब में इन-सिटू अवशेष प्रबंधन से खेती की लागत में लगभग 538 करोड़ रुपये की बचत, अवशेषों में मौजूद पोषक तत्वों के संरक्षण से लगभग 495 करोड़ रुपये के मूल्य का लाभ और कम-से-कम एक सिंचाई चक्र बचाकर लगभग 571 मिलियन घन मीटर भूजल बचाने का अनुमान सामने आया है।

अर्थात, खेत में पराली रखना केवल धुआं रोकना नहीं है।

यह मिट्टी और पानी में निवेश करना है।

यहीं से अब फसल अवशेष प्रबंधन का दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष सामने आता है।

जहां वास्तविक अतिरिक्त बायोमास उपलब्ध है, वहां उसे खेत से बाहर निकालकर आर्थिक उपयोग में लाया जा सकता है। यही एक्स-सिटू प्रबंधन है।

बेलिंग और संग्रहण के बाद फसल अवशेष से बायोमास पेलेट, जैव ईंधन, दूसरी पीढ़ी का एथेनॉल, संपीड़ित जैव गैस (सीबीजी), बायोचार, कम्पोस्ट, मशरूम, कागज और पैकेजिंग जैसी अनेक चीजें बनाई जा सकती हैं।

कृषि अवशेषों से प्रतिवर्ष 18,000 मेगावाट से अधिक बिजली उत्पादन की संभावित क्षमता भी आंकी गई है।

यहां से पराली एक पर्यावरणीय समस्या से निकलकर ग्रामीण औद्योगिक कच्चे माल में बदल सकती है।

कल्पना कीजिए—एक गांव में किसान अवशेष पैदा करता है, स्थानीय कस्टम हायरिंग सेंटर उसका संग्रह करता है, किसान उत्पादक संगठन उसे संगठित करता है, स्थानीय उद्यमी उसका प्राथमिक प्रसंस्करण करता है और उद्योग उसे ऊर्जा या जैव-आधारित उत्पाद में बदलता है। वह गांव से उद्योग और उद्योग से बाजार तक एक नई मूल्य शृंखला बनाता है। यही समृद्ध अर्थव्यवस्था का मूल विचार है—एक क्षेत्र का अवशेष दूसरे क्षेत्र का संसाधन बने।

मिट्टी और बाज़ार के बीच संतुलन

लेकिन इस परिवर्तन में एक सावधानी भी उतनी ही जरूरी है। यदि खेत से आवश्यकता से अधिक जैविक पदार्थ बाहर निकाल लिया गया, तो लंबे समय में मिट्टी की सेहत प्रभावित हो सकती है। इसलिए फसल अवशेष का औद्योगिक उपयोग बढ़ाते समय यह मूल सिद्धांत नहीं भूलना चाहिए कि खेत की अपनी जैविक जरूरत पहले है।

जितना वास्तविक अतिरिक्त अवशेष हो, उतना ही बाहर जाए; खेत की जरूरत का जैविक पदार्थ खेत में ही रहे।

इसलिए फसल अवशेष प्रबंधन को केवल ऊर्जा नीति या प्रदूषण नियंत्रण की नीति के रूप में नहीं देखा जा सकता। इसे मृदा स्वास्थ्य, जल संरक्षण, कृषि आय और ग्रामीण उद्योग—इन सभी से जोड़कर देखना होगा।

कार्बन बाजार : अवसर, लेकिन विज्ञान के साथ

फसल अवशेष को खेत में बनाए रखना, बायोचार का उपयोग और पुनर्योजी कृषि जैसी पद्धतियां मिट्टी में कार्बन बढ़ाने तथा उत्सर्जन कम करने में योगदान दे सकती हैं। ऐसे में कार्बन बाजार किसानों के लिए अतिरिक्त आय का संभावित माध्यम बन सकते हैं।

लेकिन कार्बन क्रेडिट कोई आसान या स्वतः मिलने वाली आय नहीं है।

इसके लिए विश्वसनीय मापन, रिपोर्टिंग और सत्यापन (MRV) व्यवस्था आवश्यक होगी। आधाररेखा, आंकड़ों की गुणवत्ता, निगरानी की लागत, क्रेडिट जारी होने में लगने वाला समय और किसानों को वास्तविक लाभ का हस्तांतरण—इन सभी प्रश्नों का समाधान जरूरी है।

विशेषकर छोटे और सीमांत किसान तब ही इस व्यवस्था का हिस्सा बन पाएंगे, जब प्रक्रिया सरल, पारदर्शी और कम लागत वाली हो तथा लाभ-वितरण न्यायपूर्ण हो।
कार्बन बाजार का भविष्य केवल कार्बन में नहीं, किसान के भरोसे में है।

भारत में फसल अवशेष प्रबंधन का कोई एक सार्वभौमिक मॉडल नहीं हो सकता। पंजाब का समाधान राजस्थान में उसी रूप में लागू नहीं किया जा सकता। मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, बिहार या दक्षिण भारत के कृषि-जलवायु क्षेत्र अपनी अलग परिस्थितियां रखते हैं। फसल, मिट्टी, पानी, जोत का आकार, मशीनरी, श्रम और स्थानीय बाजार—हर क्षेत्र की अपनी वास्तविकता है।

इसलिए आवश्यकता एक राष्ट्रीय दृष्टि और स्थानीय समाधान की है।

कृषि विज्ञान केंद्रों, कृषि विश्वविद्यालयों और ICAR संस्थानों को गांव-स्तर पर प्रदर्शन, प्रशिक्षण और तकनीकी सलाह के केंद्र के रूप में और मजबूत किया जाना चाहिए। किसान को केवल मशीन दिखाना पर्याप्त नहीं है। उसे यह भी दिखाना होगा कि तकनीक अपनाने से उसकी लागत कितनी घटेगी, पानी कितना बचेगा, मिट्टी को क्या लाभ होगा और आय पर क्या प्रभाव पड़ेगा।

कस्टम हायरिंग सेंटरों को भी केवल मशीन किराये पर देने वाली इकाई न मानकर स्थानीय फसल-अवशेष सेवा केंद्र बनाया जा सकता है—जहां मशीन, प्रशिक्षित ऑपरेटर, संग्रहण, बेलिंग, परिवहन और स्थानीय बाजार की जानकारी एक ही व्यवस्था में उपलब्ध हो।

भविष्य की प्रोत्साहन व्यवस्था को भी धीरे-धीरे केवल मशीन खरीद से आगे बढ़ाकर परिणाम आधारित किया जा सकता है—जैसे पराली जलाने में कमी, मिट्टी के स्वास्थ्य में सुधार, पानी की बचत और अतिरिक्त बायोमास का प्रमाणित उपयोग।

धुएं से संसाधन तक

पराली की समस्या का समाधान केवल यह कह देना नहीं है कि ‘पराली मत जलाइए।’

समाधान यह सुनिश्चित करना है कि किसान के पास पराली जलाने से बेहतर, आसान और आर्थिक रूप से व्यवहार्य विकल्प मौजूद हो।

जहां अवशेष मिट्टी के लिए उपयोगी है, उसे खेत में लौटाएं।
जहां वास्तविक अतिरिक्त बायोमास है, उसे ऊर्जा और उद्योग से जोड़ें।
जहां बाजार की संभावना है, वहां किसान को मूल्य शृंखला का भागीदार बनाएं।
और हर स्थिति में किसान को इस पूरी व्यवस्था के केंद्र में रखें।

पंजाब और हरियाणा का अनुभव बताता है कि तकनीक, वित्तीय सहायता, जागरूकता और प्रशासनिक समन्वय साथ आएं तो दशकों पुरानी समस्या में भी बड़ा परिवर्तन संभव है। अब इस अनुभव को देश के अलग-अलग कृषि-जलवायु क्षेत्रों की जरूरतों के अनुरूप विस्तार देने का समय है।

वह मिट्टी की ताकत है।
वह पानी बचाने का माध्यम है।
वह स्वच्छ ऊर्जा का स्रोत है।
वह ग्रामीण उद्योग का कच्चा माल है।
और सही व्यवस्था मिले तो वह किसान की अतिरिक्त आय का आधार भी बन सकता है।

भारत की अगली कृषि क्रांति केवल अधिक उत्पादन की नहीं, बल्कि कम अपशिष्ट, संसाधनों के बेहतर उपयोग, स्वस्थ मिट्टी, सुरक्षित पर्यावरण और किसानों के लिए अधिक मूल्य सृजन की क्रांति होगी।

पराली से समृद्ध अर्थव्यवस्था तक की यात्रा इसी नए कृषि-दृष्टिकोण की एक महत्वपूर्ण कड़ी है। क्योंकि भविष्य की कृषि में खेत से निकलने वाली कोई चीज ‘बेकार’ नहीं होगी—सवाल सिर्फ इतना होगा कि उसे सही जगह, सही समय और सही मूल्य में कैसे वापस जोड़ा जाए।

 

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