लेखक:
डॉ. एम. एल. जाट
महानिदेशक, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) एवं सचिव, कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग
2 अक्टूबर केवल महात्मा गांधी जी की जयंती मनाने का ही दिन नहीं, बल्कि उनके विचारों को वर्तमान की चुनौतियों के संदर्भ में पुनः समझने और उन्हें जीवन में उतारने का अवसर है। गांधीजी जिस भारत का स्वप्न देखते थे, वह आत्मनिर्भर, स्वावलंबी, श्रम-सम्मानित और गांवों की शक्ति पर आधारित भारत था। उनकी दृष्टि में शिक्षा इस परिवर्तन का सबसे प्रभावी माध्यम थी। वे ऐसी शिक्षा चाहते थे जो केवल मस्तिष्क को ज्ञान न दे, बल्कि हाथ को हुनर और हृदय को संवेदना भी दे। और इसी सोच के साथ आज का भारत एक विकसित राष्ट्र की ओर बढ़ रहा है ।
गांधीजी की ‘नई तालीम’ या बुनियादी शिक्षा का मूल विचार था कि शिक्षा को जीवन और उत्पादक कार्य से जोड़ा जाए। खेती-किसानी, बागवानी, हस्तकला और स्थानीय जीवन की गतिविधियां उनके लिए केवल रोजगार के साधन नहीं थीं, बल्कि सीखने की स्वाभाविक प्रयोगशालाएं थीं। बच्चे अपने परिवेश और श्रम से जुड़कर भाषा, गणित, विज्ञान, सामाजिक विज्ञान और जीवन-मूल्यों को सीख सकते हैं। इस अर्थ में गांधीजी के लिए खेत स्वयं एक कक्षा और किसान एक शिक्षक की भूमिका निभा सकता था।
गांधीजी विद्यालयी शिक्षा में कृषि और प्रकृति से जुड़ाव को इसलिए महत्व देते थे क्योंकि वे बच्चे को जीवन की वास्तविकताओं से परिचित कराना चाहते थे। बीज से पौधे और पौधे से फसल बनने की प्रक्रिया बच्चे को विज्ञान का पाठ पढ़ाती है; खेत की माप और उत्पादन की गणना गणित सिखाती है; फसल और गांव की अर्थव्यवस्था समाजशास्त्र एवं अर्थशास्त्र की समझ विकसित करती है। सबसे महत्वपूर्ण, अपने हाथों से मिट्टी के साथ काम करना बच्चे में श्रम की गरिमा, स्वावलंबन और अन्न के प्रति सम्मान पैदा करता है।
आज भारत की कृषि जिस परिवर्तन के दौर से गुजर रही है, उसमें गांधीजी की यह सोच और भी प्रासंगिक हो उठती है। जलवायु परिवर्तन, मृदा स्वास्थ्य, जल-संकट, जैव विविधता, कृषि लागत, पोषण सुरक्षा और ग्रामीण युवाओं के रोजगार जैसी चुनौतियां केवल प्रयोगशालाओं में हल नहीं हो सकतीं। इनके समाधान के लिए ऐसी शिक्षा चाहिए जो कक्षा को खेत से, विज्ञान को किसान से और ज्ञान को समाज की वास्तविक जरूरतों से जोड़े।
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद की कृषि शिक्षा व्यवस्था इसी दिशा में निरंतर विकसित हो रही है। कृषि विद्यार्थियों को केवल पाठ्यपुस्तक और प्रयोगशाला तक सीमित रखने के बजाय उन्हें वास्तविक कृषि परिस्थितियों का अनुभव कराने पर जोर दिया जा रहा है। विद्यार्थी ग्रामीण उद्यमिता जागरूकता एवं विकास योजना (Student READY), ग्रामीण कृषि कार्य अनुभव (RAWE), अनुभवात्मक अधिगम, इंटर्नशिप, औद्योगिक प्रशिक्षण एवं विद्यार्थियों की परियोजनाओं जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से विद्यार्थियों को खेत, गांव, उद्योग और उद्यमिता से जोड़ा जा रहा है। इसका उद्देश्य कृषि स्नातक को केवल नौकरी तलाशने वाला युवा बनाना नहीं, बल्कि कौशल विकास के द्वारा समस्याओं का समाधान करने, नवाचार करने और रोजगार के अवसर सृजित करने में सक्षम युवा के रूप में तैयार करना है।
यहां गांधीजी के ‘करके सीखने’ के सिद्धांत की आधुनिक वैज्ञानिक अभिव्यक्ति दिखाई देती है। विद्यार्थी जब किसान के खेत में जाता है, उसकी समस्या सुनता है, स्थानीय परिस्थितियों को समझता है, वैज्ञानिक समाधान खोजता है और फिर उस समाधान को व्यवहार में परखता है, तब शिक्षा किताब से निकलकर जीवन का हिस्सा बन जाती है। यही वह शिक्षा है जो ज्ञान के साथ संवेदना और कौशल दोनों विकसित करती है।
इस यात्रा को विद्यालय स्तर से ही आरंभ करना आवश्यक है। स्कूलों में पोषण वाटिका, स्थानीय फसलों का अध्ययन, मृदा और जल संरक्षण के छोटे प्रयोग, कम्पोस्ट निर्माण, प्राकृतिक खेती, पौधारोपण तथा किसानों और कृषि वैज्ञानिकों से संवाद जैसी गतिविधियां बच्चों को कृषि की वास्तविक दुनिया से जोड़ सकती हैं। भा.कृ.अनु.प. के कृषि विज्ञान केंद्रों और विभिन्न कृषि अनुसंधान संस्थानों द्वारा विद्यार्थियों के क्षेत्रीय अनुभव कार्यक्रमों और जागरूकता गतिविधियों को इस दिशा में और व्यापक बनाया जा सकता है। स्कूल से खेत, खेत से कृषि विश्वविद्यालय और विश्वविद्यालय से किसान तक ज्ञान की निरंतर श्रृंखला गांधीजी की बुनियादी शिक्षा को आज के संदर्भ में जीवंत करने का प्रभावी माध्यम बन सकती है।
गांधीजी की शिक्षा-दृष्टि का दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष था—स्थानीयता और आत्मनिर्भरता। उनका ग्राम स्वराज स्थानीय संसाधनों, स्थानीय ज्ञान और स्थानीय उत्पादन की शक्ति पर आधारित था। आज कृषि शिक्षा में प्राकृतिक संसाधन संरक्षण, प्राकृतिक एवं टिकाऊ कृषि, समेकित कृषि प्रणाली, जैव विविधता, जल प्रबंधन और मृदा स्वास्थ्य जैसे विषयों पर बढ़ता जोर इसी भावना को आगे बढ़ाता है। परंपरागत भारतीय कृषि ज्ञान को आधुनिक वैज्ञानिक अनुसंधान के साथ जोड़ना हमारी कृषि को अधिक टिकाऊ और लचीला बना सकता है।
नई शिक्षा नीति 2020 के अनुरूप कृषि शिक्षा में हो रहे पाठ्यक्रम सुधार भी इसी परिवर्तन का हिस्सा हैं। कृषि विद्यार्थियों में आलोचनात्मक चिंतन, रचनात्मकता, प्रभावी संप्रेषण, सहयोग की भावना, नेतृत्व क्षमता, उद्यमशीलता और समस्या-समाधान कौशल के विकास पर बल दिया जा रहा है। यह बदलाव इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि 21वीं सदी का किसान केवल उत्पादन करने वाला नहीं, बल्कि बाजार, तकनीक, जलवायु और मूल्य-श्रृंखला को समझने वाला उद्यमी भी है। उसे सहयोग देने वाला कृषि स्नातक भी उसी बहुआयामी दृष्टि से तैयार होना चाहिए।
आज कृत्रिम बुद्धिमत्ता, ड्रोन, सेंसर, रोबोटिक्स, जैव-प्रौद्योगिकी और सटीक कृषि संरचना जैसी प्रौद्योगिकियाँ कृषि का स्वरूप बदल रही हैं। गांधीजी के समय इन तकनीकों की कल्पना भी संभव नहीं थी, लेकिन उनकी मूल शिक्षा आज भी हमारा मार्गदर्शन कर सकती है—तकनीक का उद्देश्य मनुष्य और समाज को सशक्त बनाना होना चाहिए। इसलिए आधुनिक कृषि शिक्षा में मानवीय संवेदनशीलता के साथ प्रौद्योगिकी (technology with empathy) का दृष्टिकोण आवश्यक है। तकनीक तभी सार्थक है जब वह किसान की लागत घटाए, संसाधनों का संरक्षण करे, जोखिम कम करे और उसकी आय एवं जीवन-गुणवत्ता में सुधार लाए।
कृषि शिक्षा का अंतिम लक्ष्य केवल अधिक उत्पादन नहीं हो सकता। उसका लक्ष्य ऐसा कृषि तंत्र विकसित करना होना चाहिए जो किसान को आर्थिक रूप से सशक्त, प्रकृति को सुरक्षित और ग्रामीण युवाओं को रोजगार एवं उद्यम के अवसर प्रदान करे। इसके लिए शिक्षा, अनुसंधान, विस्तार और उद्योग के बीच मजबूत संबंध आवश्यक हैं। भा.कृ.अनु.प. की भूमिका इसी ज्ञान-परिस्थितिकी तंत्र को मजबूत करने की है—जहां अनुसंधान प्रयोगशाला से खेत तक पहुंचे और खेत की समस्या फिर अनुसंधान का विषय बने।
इस गांधी जयंती पर हमें गांधीजी को केवल स्मरण करने के बजाय उनकी शिक्षा-दृष्टि को कृषि के भविष्य से जोड़ने का संकल्प लेना चाहिए। यदि विद्यालय बच्चे को मिट्टी से जोड़ता है, कृषि विश्वविद्यालय उसे विज्ञान और कौशल देता है, अनुसंधान संस्थान नए समाधान विकसित करते हैं और किसान उन समाधानों को अपने खेत में अपनाकर आगे बढ़ता है, तो शिक्षा की पूरी यात्रा समाज के लिए सार्थक बनती है।
गांधीजी का भारत ऐसा भारत था जिसमें श्रम सम्मान था, गांव शक्ति का केंद्र था, प्रकृति जीवन का आधार थी और शिक्षा आत्मनिर्भरता का माध्यम थी। आज आधुनिक विज्ञान, डिजिटल तकनीक और नवाचार के साथ इन मूल्यों को आगे बढ़ाना हमारी जिम्मेदारी है।
खेत केवल अन्न पैदा करने की जगह नहीं है; वह भारत की सभ्यता, अर्थव्यवस्था और जीवन का आधार है। यदि खेत को कक्षा, किसान को ज्ञान-साझेदार और कृषि को विज्ञान एवं उद्यमिता से जोड़ दिया जाए, तो गांधीजी की ‘नई तालीम’ केवल इतिहास का अध्याय नहीं रहेगी—वह विकसित, आत्मनिर्भर, सुदृढ़, शक्तिशाली और गौरवशाली भारत की शिक्षा-दृष्टि बन जाएगी। यही गांधी को सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
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