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अमूमन बेहतर ज़िंदगी की तलाश में गांव और छोटे शहरों के युवा सात समंदर पार जाकर अपना आशियाना बसाते हैं, उनमें से कुछ तो वहीं रच बस जाते हैं, लेकिन कुछ ऐसे भी होते हैं जिनका मन बार-बार देश लौटने को करता है और वो फिर अपनी मिट्टी में लौट आते हैं, मगर दोबारा देश लौटकर नए सिरे काम शुरू करना क्या हर किसी के लिए मुमकिन होता है? यतेंदर ने तो इसे मुमकिन कर दिखाया है और हैरानी की बात तो ये है कि एक दशक तक ऑस्ट्रेलिया में रहने के बाद जब वो लौटे तो उन्होंने कोई हाई-प्रोफाइल नौकरी की बजाय खेती को पेशा बनाया। ऑटोमोबाइल इंजीनियर यतेंदर भाटिया उत्तराखंड के नैनीताल जिले के रामनगर के रहने वाले हैं और वो पारंपरिक खेती के साथ ही मशरूम उत्पादन भी कर रहे हैं। खेती के साथ मशरूम उत्पादन से कैसे कर रहे हैं वो अतिरिक्त कमाई और कैसे युवा खेती को मुनाफे़ का बिज़नेस बना सकते हैं, इन तमाम मुद्दों पर उन्होंने बात की किसान ऑफ़ इंडिया के संवाददाता सर्वेश बुंदेली से।
क्यों की ऑस्ट्रेलिया से घर वापसी?
यतेंदर ने मेरठ से स्कूल की पढ़ाई पूरी की और फिर 2007 में ऑस्ट्रेलिया चले गए और वहां से ऑटोमोबाइल इंजीनियरिंग में डिग्री हासिल की। इसके बाद वो मेलबर्न में ही एक कंपनी में नौकरी करने लगे। करीब 6 साल नौकरी करने के बाद उनका मन बदलने लगा और उन्होंने धीरे-धीरे देश लौटने का मन बना लिया। यतेंदर बताते हैं कि वो मूल रूप से पंजाब के हैं, मगर उनका परिवार 50 के दशक में ही नैनीताल आ गया था और यहां खेती करने लगे थे। ऑस्ट्रेलिया से आने के बाद शुरुआत में उन्हें समझ नहीं आया कि करना क्या है, फिर खेती शुरू की। यूट्यूब पर कई वीडियो देखें जिसमें मशरूम की खेती का आइडिया उन्हें अच्छा लगा, तो दो साल उन्होंने हट बनाकर मशरूम का उत्पादन शुरू कर दिया और जब नतीजे अच्छे आए, तो धीरे-धीरे 2 एसी चेंबर बनाकर मशरूम की खेती करने लगे।
पूरे साल होती है फसल
यतेंदर बताते हैं कि एसी चेंबर में पूरे साल मशरूम का उत्पादन किया जाता है, क्योंकि यहां के तापमान को वो अपने हिसाब से नियंत्रित कर सकते हैं। यानी आप पूरे 12 महीने फसल ले सकते हैं। आमतौर पर मशरूम उत्पादन के लिए अक्टूबर से मार्च तक का मौसम उपयुक्त होता है, मगर एसी चेंबर में क्योंकि कृत्रिम रूप से तापमान को नियंत्रित किया जाता है, इसलिए पूरे साल मशरूम का उत्पादन होता है। मशरूम उत्पादन में मुनाफ़ा अच्छा होता है, इसलिए यतेंदर धान, मक्का जैसी पारंपरिक फसलों की खेती के साथ ही मशरूम की खेती भी कर रहे हैं। वो बताते हैं कि शुरुआत में मुश्किलें आईं, मगर धीरे-धीरे अनुभव आता गया तो चीज़ें आसान हो गई।
कितने दिनों में होता है उत्पादन?
मशरूम का उत्पादन आमतौर पर 40 दिनों में होने लगता है। एसी चेंबर के बारे में विस्तार से बताते हुए यतेंदर कहते हैं कि उनके एक चेंबर का आकार 60X40 का है। जिसमें करीब 1500 बैग आते हैं। इन बैग में वो कंपोस्ट लाकर डालते हैं और फिर इन बैग को चेंबर में बने रैक्स में रख दिया जाता है, उसके बाद कमरे का तापमान सेट कर देते हैं। प्रकिया पूरी होने के बाद करीब 40 दिन बाद फसल का उत्पादन होने लगता है। वो कहते हैं कि एसी का फ़ायदा ये है कि सीजन का इंतज़ार नहीं करना पड़ता है।
मशरूम उत्पादन की प्रक्रिया
मशरूम उत्पादन की प्रक्रिया पारंपरिक फसलों खेती से अलग है। इस बारे में यतेंदर बताते हैं कि सबसे पहले तो वो जो कंपोस्ट लाते है उसमें मशरूम के बीज पहले से ही डाले होते हैं, तो इस मिश्रण को बैग में डालकर चेंबर का तापमान 22 से 27 डिग्री सेल्सियस पर रखा जाता है। फिर 10-12 दिन बाद बीज से जाले जैसे बन जाते हैं जिसे माइसिलियम कहते हैं, इसे कोकोपीट से ढंकना होता है। इसके लिए कोकोपीट को रातभर पानी में भिगाया जाता है फिर निकालकर उसमें कोई फंगीसाइड मिलाने के बाद मशरूम बैग के ऊपर 1 से 1.5 इंच की केसिंग की जाती है यानी ढंका जाता है। उसके 10-12 दिन के बाद माइसिलियम केसिंग को जकड़ लेता है और केसिंग के ऊपर माइसेलियम आ जाता है, फिर धीरे-धीरे हाथ से इसकी रफलिंग की जाती है ताकि माइसिलियम कोने-कोने में फैल जाए। उसके बाद न्यूजपेपर से ढंक देते हैं। 5-7 दिन के बाद फिर से कोकोपीट से माइसीलियम को ढंकना होता है, उसके बाद इसमें पानी देना होता है और खुली हवा लगानी होती है। इस पक्रिया के 10-12 दिन बाद मशरूम का उत्पादन होने लगता है।
कितना होता है उत्पादन?
यतेंदर बताते हैं कि 10 किलो के बैग से करीब 2 से 3 किलो मशरूम का उत्पादन होता है। साथ उनका कहना है कि इसकी खेती करते समय साफ़-सफ़ाई का विशेष ध्यान रखने की ज़रूरत होती है, वरना फसल खराब हो सकती है। वो कहते हैं कि एसी चेंबर में जाने से पहले खुद को साफ़ रखें। हाथ-पैर को सैनिटाइज़ करके ही जाएं, क्योंकि मशरूम एक प्रकार का फंगस ही तो है जिसमें बीमारी बहुत जल्दी पकड़ती है। इसमें आमतौर पर ग्रीन मोल्ड, व्हाइड मोल्ड जैसी बीमारियां लग जाती हैं। साफ़-सफ़ाई का ध्यान रख बीमारी के खतरे को कम किया जा सकता है।
युवाओं को खेती करने की सलाह
यतेंदर ने जिस तरह विदेश की नौकरी छोड़कर अपने देश में लौटकर अपनी जड़ों से जुड़कर खेती को न सिर्फ़ व्यवसाय के रूप में स्थापित किया, बल्कि इससे अच्छा मुनाफ़ा कमाकर ये साबित कर दिया है कि थोड़ी तकनीक की मदद ली जाए तो खेती भी मुनाफे़ का सौदा बन सकती है। यतेंदर आज के युवाओं को भी खेती से जुड़ने की सलाह देते हैं। उनका कहना है कि युवाओं को जितना हो सके खेती से जुड़ना चाहिए, क्योंकि खेती ऐसी चीज़ है जो आपको कभी भूखा नहीं मरने देगी। खेती से जुड़ने पर भले ही शुरू में मेहनत अधिक और मुनाफ़ा कम होता है, मगर -धीरे-धीरे लाभ होने लगता है। साथ ही इससे आपकी सेहत भी अच्छी रहती है, जो व्यक्ति खेती करता है उसे स्वस्थ रहने के लिए किसी एक्सरसाइज़ और डायट की ज़रूरत नहीं पड़ती है। वो युवाओं को सलाह देते हैं कि खेती के साथ ही कोई छोटा-मोटा कृषि से जुड़ा बिज़नेस भी करें, जैसे उन्होंने मशरूम का किया। वो बताते हैं कि यूट्यूब से कई छोटे-मोटे बिज़नेस का आइडिया मिल जाता है और इसमें नई-नई तकनीक का इस्तेमाल करने पर परिणाम अच्छे मिलते हैं।
यानी अगर किसान पारंपरिक खेती में भी नई तकनीक का इस्तेमाल करता है या कृषि से जुड़े दूसरे काम को व्यवसाय की तरह करता है तो यकीनन उनकी आमदनी में इज़ाफा होगा।
सम्पर्क सूत्र: किसान साथी यदि खेती-किसानी से जुड़ी जानकारी या अनुभव हमारे साथ साझा करना चाहें तो हमें फ़ोन नम्बर 9599273766 पर कॉल करके या [email protected] पर ईमेल लिखकर या फिर अपनी बात को रिकॉर्ड करके हमें भेज सकते हैं। किसान ऑफ़ इंडिया के ज़रिये हम आपकी बात लोगों तक पहुँचाएँगे, क्योंकि हम मानते हैं कि किसान उन्नत तो देश ख़ुशहाल।
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