आज के समय में, जब खेती को घाटे का सौदा माना जाने लगा है, ऐसे में श्री मुक्तसर साहिब ज़िले के गांव कट्ट्यांवाली के प्रगतिशील किसान गुरमीत सिंह ने अपनी मेहनत और वैज्ञानिक सोच से “सफ़लता” और “प्रेरणा” की एक नई मिसाल कायम की है। गुरमीत सिंह ने न सिर्फ अपनी बंजर हो चुकी जमीन को फिर से उपजाऊ बनाया, बल्कि आज वे बीज उत्पादन के जरिए पारंपरिक खेती की तुलना में कई गुना अधिक मुनाफ़ा कमा रहे हैं।
बंजर भूमि और चुनौती
गुरमीत सिंह बताते हैं कि उनके इलाके में जलभराव और खारेपन की गंभीर समस्या थी, जिसके कारण उनकी चार एकड़ ज़मीन पूरी तरह बंजर हो गई थी। इस समस्या के समाधान के लिए उन्होंने पंजाब कृषि विश्वविद्यालय (पीएयू) और दिल्ली स्थित ‘पूसा संस्थान’ (आईएआरआई) के विशेषज्ञों से संपर्क किया। मिट्टी की जांच के बाद वैज्ञानिकों ने उन्हें एक महत्वपूर्ण सलाह दी कि पराली को खेत में जोतकर जितना संभव हो सके मल्चिंग कर देनी चाहिए।

पराली प्रबंधन: भूमि के लिए वरदान
गुरमीत सिंह की यात्रा 2012 में शुरू हुई जब उन्होंने अपने खेतों को जलाना बंद कर दिया। उन्होंने न केवल अपने खेतों से पराली इकट्ठा की, बल्कि अपने पड़ोसियों के खेतों से भी पराली लाकर अपनी ज़मीन पर जोती। इस मेहनत के फलस्वरूप मिट्टी में जैविक पदार्थ की मात्रा बढ़ गई और पीएच स्तर कम हो गया, जिससे खारापन दूर हो गया। गौरतलब है कि जिस ज़मीन से उन्हें प्रति एकड़ 1 लाख रुपये की आय होती थी, अब उससे उन्हें सालाना 20 से 22 लाख रुपये की आमदनी होने लगी है।
मछली पालन: एक अपूर्ण अनुभव
अपने सफ़र के दौरान, गुरमीत सिंह ने मछली पालन को भी एक वैकल्पिक व्यवसाय के रूप में आजमाया। सरकार से वित्तीय सहायता मिलने के बावजूद, वे इस व्यवसाय में पूरी तरह सफल नहीं हो सके। इसके मुख्य कारण विपणन की समस्या, परिवहन की कमी और बीजों की उचित वृद्धि न होना थे। परिणामस्वरूप, उन्हें आर्थिक चुनौतियों का सामना करना पड़ा, लेकिन फिर भी, इस असफ़लता ने उन्हें बहुत कुछ सिखाया और कृषि क्षेत्र में कुछ अलग और अनूठा करने के लिए प्रेरित किया।

बीज उत्पादन की दिशा में उठाए गए कदम
भूमि सुधार के बाद, वर्ष 2017 में, डॉ. ए. के. सिंह ने उन्हें किसानों की आय दोगुनी करने के प्रधानमंत्री के अभियान के बारे में बताया और उन्हें बीज उत्पादन के क्षेत्र में उतरने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने विश्वविद्यालय से बीज उत्पादन में विशेष प्रशिक्षण प्राप्त किया, जिसमें उन्हें प्रजनक बीजों से प्रमाणित बीज तैयार करने, खेत की सफ़ाई (रोगिंग), कटाई और सबसे महत्वपूर्ण रूप से भंडारण के बारे में विस्तार से सिखाया गया। बीजों को कीटों से बचाने के लिए वे हर 15 दिन में सल्फास और मैलाथीन का प्रयोग करते हैं और पूरी सावधानी बरतते हैं। आज उनके पास 16 एकड़ जमीन है और पिछले कई वर्षों से वे अपनी फसलें बाजार जाने के बजाय सीधे किसानों को बीजों के रूप में बेच रहे हैं।

नवीनतम किस्में और गुणवत्ता
गुरमीत सिंह HD 3385, 3386, 3471 और DBW187, 303, 327 जैसी गेहूं की नवीनतम किस्मों पर काम कर रहे हैं। इसके साथ ही, वे धान और मूंग की कम अवधि वाली किस्मों का भी उत्पादन करते हैं। उनके बीजों की मांग केवल पंजाब में ही नहीं, बल्कि हरियाणा, राजस्थान और मध्य प्रदेश के होशंगाबाद, उज्जैन और इंदौर जैसे शहरों में भी है। यही कारण है कि वे स्वयं खेतों में बीजों की शुद्धता और गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए उचित व्यवस्था करते हैं।
लाभ और राष्ट्रीय सम्मान
गुरमीत सिंह का मानना है कि “खुद बीजो, खुद बेचो” का नारा किसानों की आर्थिक स्थिति में बदलाव ला सकता है। मछली पालन में सफ़लता न मिलने के बावजूद, वे बीज उत्पादन में पारंपरिक खेती की तुलना में ढाई गुना अधिक लाभ कमा रहे हैं। उनके इन नवोन्मेषी प्रयासों के कारण, भारत सरकार ने उन्हें वर्ष 2020 में ‘नवोन्मेषी किसान’ और ‘सहयोगी किसान’ पुरस्कारों से सम्मानित किया है।
वे आज के युवा किसानों के लिए एक आदर्श बनकर उभरे हैं। इसके अलावा, गुरमीत सिंह कहते हैं कि वे विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों के साथ लगातार संपर्क में रहते हैं ताकि किसानों को नवीनतम जानकारी और तकनीकें उपलब्ध कराई जा सकें।
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सम्पर्क सूत्र: किसान साथी यदि खेती-किसानी से जुड़ी जानकारी या अनुभव हमारे साथ साझा करना चाहें तो हमें फ़ोन नम्बर 9599273766 पर कॉल करके या [email protected] पर ईमेल लिखकर या फिर अपनी बात को रिकॉर्ड करके हमें भेज सकते हैं। किसान ऑफ़ इंडिया के ज़रिये हम आपकी बात लोगों तक पहुँचाएँगे, क्योंकि हम मानते हैं कि किसान उन्नत तो देश ख़ुशहाल।

