Table of Contents
उत्तराखंड के उधमसिंह नगर जिले में गन्ने की खेती बड़े पैमाने पर होती थी, मगर धीरे-धीरे किसानों ने उत्पादन कम कर दिया, क्योंकि चीनी मिल से उन्हें समय पर पेमेंट नहीं मिलती थी। यही वजह है कि यहां का बाजपुर जैसा इलाका जहां कभी पहली सहकारी चीनी मिल बनी थी और जो क्षेत्र गन्ना उत्पादन के लिए जाना जाता था, वहां के अधिकांश गुड़ बनाने वाले कोल्हू बंद हो चुके हैं। कुछ चुनिंदा कोल्हू चल रहे हैं जो पूरे प्राकृतिक तरीके से देसी गुड़ बना रहे हैं। ऐसा ही एक कोल्हू चला रहे हैं संजय कुमार। संजय ने किसान ऑफ़ इंडिया के संवाददाता सर्वेश बुंदेली से बातचीत में बताया कि कैसे वो ऑर्गेनिक गुड़ बनाते हैं और लोग देसी गुड़ की पहचान कैसे कर सकते हैं ताकि अगली बार गुड़ खाने से पहले आप भी परख सकें कि आप जिसे देसी समझकर खा रहे हैं क्या वो वाकई में देसी है?
बाजपुर में बनी थी देश की पहली सहकारी चीनी मिल
उत्तराखंड के उधमसिंह नगर जिले में गन्ने की खेती बड़े पैमाने पर की जाती है। खासतौर पर यहां के बाजपुर और काशीपुर जैसे इलाकों में। बाजपुर में देश की पहली सहकारी चीनी मिल स्थापित हुई थी, मगर अब वहां गन्ने का उत्पादन कम हो चुका है जिससे गुड़ बनाने का काम भी कम हो गया है। हालांकि कुछ लोग आज भी पारंपरिक तरीके से बिना केमिकल वाला ऑर्गेनिक गुड़ बना रहे हैं। संजय कुमार भी उन्हीं में से एक हैं। संजय उत्तराखंड के ही रहने वाले हैं और वो कहते हैं कि लोगों को ऑर्गेनिक गुड़ मिले इसके लिए उन्होंने एक छोटा सा प्लांट लगा रखा है। दरअसल, ये काम उनके पिता और दादा के समय से ही चलता आ रहा है। बिना किसी मशीन और केमकिल ऑर्गेनिक गुड़ कैसे बनता है इस बारे में वो बताते हैं कि गन्ने को पहले क्रेशर में डाला जाता है जहां से गन्ने का रस निकलकर सीधा एक टंकी जैसी जगह में एकत्र होता है और फिर वहां से पाइपलाइन द्वारा भट्टी तक पहुंचाया जाता है। पहली कड़ाही में कच्चा रस्सा डाला जाता है, फिर दूसरी में सुखलाई नाम के पौधे से गन्ने के रस की सफ़ाई की जाती है। ये सुखलाई का पौधा भिंडी के पौधे की तरह दिखता है जिसकी खेती खासतौर पर गुड़ की सफ़ाई के लिए ही की जाती है। फिर तीसरी कड़ाही में रस को थोड़ा और साफ़ किया जाता है फिर चौथी कड़ाही में पूरी तरह से साफ़ रस डालकर गाढ़ा होने तक पकाया जाता है और उसे चाक में डालकर ठंडा होने पर जमाया जाता है।
मांग के अनुसार गुड़ की पैकिंग
संजय बताते हैं कि आमतौर पर गुड़ को 5-5 किलो के आकार में जमाया जाता है जिसके लिए लकड़ी के सांचों का इस्तेमाल होता है। इसके अलावा जिस तरह का ऑर्डर उन्हें मिलता है उस हिसाब से गुड़ की पैकिंग की जाती है जैसे इसके छोटे-छोटे लड्डू जिसे भेली भी कहते हैं, बनाए जाते हैं। इसके अलावा गुड़ के क्यूब भी बनाए जाते हैं। वो कहते हैं कि आजकल क्यूब बनाने का बहुत ट्रेंड है, ये देखने में भी अच्छा लगता है और इसे गिफ्ट आदि लेने में भी इस्तेमाल किया जाता है।
क्यों कम हो गए कोल्हू?
एक समय था जब उधमसिंह नगर गुड़ के लिए जाना जाता था, लेकिन धीरे-धीरे इलाके में लोगों ने गुड़ के कोल्हू लगाना कम कर दिया संजय कुमार इसकी दो मुख्य वजह मानते हैं। उनके मुताबिक, पहली सबसे बड़ी वजह किसानों को पेमेंट की समस्या है। वो कहते हैं कि किसानों को अगर तुरंत अपनी फसल की सही कीमत मिल जाए, तो वो उसे उगाने के लिए प्रेरित होते हैं, मगर इस इलाके में चीनी मिल की तरफ से किसानों को पेमेंट समय पर नहीं दिया गया, जिससे किसानों ने गन्ने की खेती कम कर दी। अब जब उत्पादन कम हो गया तो कोल्हू भी कम हो गए। दूसरा एक कारण जमीन की समस्या भी है, वो कहते है कि ये तराई क्षेत्र है तो गन्ने की रिकवरी कम है यानी गन्ने से चीनी निकलने की मात्रा भी कम है। इसके अलावा यहां किसानों के पास दूसरे विकल्प भी हैं जैसे गन्ने की बजाय किसान उड़द, सोयाबीन और मटर लगाने लगें। उत्तराखंड की बजाय उत्तर प्रदेश और मेरठ में उगने वाले गन्ने की गुणवत्ता बहुत अच्छी होती है।
अनुभव से बनता है गुड़
गुड़ बनाने की आधुनिक मशीनों में तापमान सेट करके रस को पकाया जाता है, मगर कोल्हू में बनने वाले गुड़ के साथ ऐसा नहीं होता। संजय कुमार कहते हैं कि इसमें कोई तापमान सेट नहीं होता है, ये काम अनुभव से चलता है। जैसे घर में महिलाएं दूध जलाकर खोया बनाती है ठीक उसी तरह रस को पकाकर गुड़ बनाया जाता है, इसे कितना पकाना है ये अनुभव से पता चल जाता है। संजय कहते हैं कि वो केमिकल फ्री गुड़ बनाते हैं, जो खाने में स्वादिष्ट लगता है।
देसी गुड़ की पहचान
सेहत के नाम पर आजकल बहुत से लोग चीनी की बजाय गुड़ खाना पसंद करते हैं, मगर क्या आपको बाज़ार में केमिकल युक्त गुड़ भी खूब बिक रहे हैं जो देसी गुड़ के नाम पर ही बेचे जा रहे हैं। ऐसे में बहुत ज़रूरी है कि लोग असली देसी और केमिकल वाले गुड़ की पहचान कर सकें। इस बारे में संजय सिंह कहते हैं कि देसी गुड़ जब ताज़ा बनकर आता है तो पीला दिखता है, मगर थोड़े दिन बाद इसका रंग हल्का भूरा होने लगता है। ये जैसे-जैसे पुराना होता है जैसे जून-जुलाई में क्योंकि गुड़ अक्टूबर-नवंबर से ही बनने लगता है तो 5-6 महीने बाद इसका रंग काला हो जाता है, कुछ लोगों को लगता है कि काला गुड़ खराब होता है जबकि ये देसी गुड़ की पहचान है। वो लोगों को सलाह देते हैं कि आउट सीज़न यानी मई-जून के बाद बाज़ार में बिकने वाले सफेद, पीला चमकदार या लाल दिखने वाला गुड़ न खरीदें क्योंकि इसमें केमिकल होता है। भूरा या हल्का काला गुड़ ही नेचुरल है।
कब शुरू होता है गुड़ बनना?
संजय कहते हैं कि गुड़ बनाने का काम आमतौर पर अक्टूबर, नवंबर में शुरू हो जाता है, क्योंकि उससे पहले गन्ना कच्चा होता है तो गुड़ सही नहीं बनता। और मार्च के आखिर तक ये बनता है, क्योंकि तभी तक गन्ना अच्छा होता है। जहां तक ऑर्गेनिक गुड़ के थोड़े महंगे होने का सवाल है तो संजय कुमार का मानना है कि अच्छी चीज़ों के लिए लोग 10 रुपए अधिक देने को भी तैयार हो जाते हैं। इसलिए उनकी कोशिश लोगों को अच्छी चीज़ देने की रहती है।
इसे भी पढ़िए: IARI Pusa Krishi Taksay को मिला National Intellectual Property Award 2025, कृषि नवाचार को बढ़ावा देने के लिए सम्मान
सम्पर्क सूत्र: किसान साथी यदि खेती-किसानी से जुड़ी जानकारी या अनुभव हमारे साथ साझा करना चाहें तो हमें फ़ोन नम्बर 9599273766 पर कॉल करके या kisanofindia.mail@gmail.com पर ईमेल लिखकर या फिर अपनी बात को रिकॉर्ड करके हमें भेज सकते हैं। किसान ऑफ़ इंडिया के ज़रिये हम आपकी बात लोगों तक पहुँचाएँगे, क्योंकि हम मानते हैं कि किसान उन्नत तो देश ख़ुशहाल।

