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मशरूम की खेती के साथ ही मशरूम उत्पादन में इस्तेमाल होने वाले कंपोस्ट को बनाना भी एक अच्छा व्यवसाय हो सकता है। उत्तराखंड के रहने वाले शिवम ने नौकरी छोड़कर मशरूम कंपोस्टिंग का सफ़ल व्यवसाय खड़ा कर दिया और अब वो लोगों को मुफ्त में प्रशिक्षण भी देते हैं। सिर्फ़ 2 झोपड़ियों से मशरूम की खेती शुरू करने वाले शिवम के बनाए कंपोस्ट सिर्फ़ उत्तराखंड ही नहीं, बल्कि पड़ोसी राज्यों में भी सप्लाई हो रहे हैं। ग्रामिणों को मशरूम फ़ार्मिंग की ट्रेनिंग फ़्री में देने में वाला शिवम ने किसान ऑफ़ इंडिया के संवाददाता सर्वेश बुंदेली से खास बातचीत में मशरूम की खेती और कंपोस्ट बनाने की तरीकों के साथ ही ये भी बताया कि उत्तराखंड सरकार मशरूम की खेती के लिए कितनी सब्सिडी दे रही है।
6 साल से कर रहे मशरूम उत्पादन का काम
उत्तराखंड के काशीपुर के प्रतापपुर गांव के रहने वाले शिवम बडोला ने जब दिल्ली एनसीआर में अपनी नौकरी छोड़कर मशरूम की खेती का निर्णय लिया तो उनके पि ता को लगा था कि शायद बेटा कुछ दिनों में ही इसे बंद कर देगा। मगर ऐसा नहीं हुआ शिवम पिछले 6 साल से न सिर्फ़ मशरूम का सफ़ल उत्पादन कर रहे हैं, बल्कि वो कंपोस्ट भी बना रहे हैं। शिवम कहते हैं कि मशरूम की खेती में कंपोस्ट की अहम भूमिका होती है। कंपोस्ट जितना अच्छा होगा, मशरूम का उत्पादन उतना ही अच्छा होगा। मशरूम के कंपोस्ट का बिज़नेस शुरू किया। आगे वो बताते हैं कि उन्होंने 2019 में दो झोपड़ी से मशरूम उत्पादन का काम शुरू किया था। फिर 2020 में उन्होंने पिता जी की मदद से अपना फार्म बनाया। शुरुआत में वो कंपोस्ट हरियाणा से मंगाते थे, फिर खुद ही कंपोस्ट भी बनाने लग गए।
अनुभव से सीखा
शिवम बताते हैं कि शुरुआत में उन्हें काफ़ी मुश्किलों का सामना करना पड़ा। जब उन्हें दो झोपड़ी बनाई तो बारिश में एक झोपड़ी गिर गई थी जिसमें बहुत नुकसान हुआ, मगर हार नहीं मानी। मन में एक बात थी कि काम तो करना ही है चाहे जो हो जाए। फ़िर धीरे-धीरे काम करते हुए उन्होंने सीखा कि कहां क्या गलती हो रही है और उसे ठीक किया। वो कहते हैं कि अनुभव से ही उन्होंने काम सीखा।
कैसे बनाते हैं कंपोस्ट?
कंपोस्ट बनाने की प्रक्रिया के बारे में विस्तार से बताते हुए शिवम कहते हैं कि मान लीजिए 1000 बैग कंपोस्ट बनाना है तो भूसा तीन गुना हो जाता है। 40 क्विंटल भूसे में 1000 से 1200 बैग कंपोस्ट बन सकता है। कंपोस्ट बनाने के लिए अगर 40 क्विंटल भूसा है तो उसमें 70 प्रतिशत मुर्गे की बीट (chicken manure) मिलाते हैं। साथ ही एक से दो कट्टे यूरिया डालेंगे ताकि अमोनिया और नाइट्रोजन बनें। इसके बाद इसमें जिप्सम, कैल्शियम, बिनौले की खली और चोकर को अच्छी तरह मिलाया जाता है। मिक्सिंग के बाद इसे बंकरों में पकाना होता है। पकाने की सबकी अलग-अलग रिदम होती है, यानी ब्लोअर चलाने का समय अलग-अलग हो सकता है। शिवम कहते हैं क वो लोग 20 मिनट में 5 मिनट के लिए ब्लोअर चलाते हैं यानी 20 मिनट ब्लोअर बंद रहेगा फिर 5 मिनट के लिए चलाते हैं, कुछ लोग आधा घंटा बंद रखते हैं और 5 मिनट के लिए चलाते हैं। उनका कहना है कि उनके कंपोस्ट में नमी की मात्रा एकदम सटीक रहती है जिससे बीज गलते नहीं है और उत्पादन अच्छा होता है।
कैसे करें अच्छे कंपोस्ट की पहचान?
शिवम कहते हैं कि अच्छे उत्पादन के लिए कंपोस्ट का अच्छा होना बहुत ज़रूरी है। आप आसानी से ये जान सकते हैं कि कंपोस्ट कैसा है। इसके लिए कंपोस्ट को मुट्ठी में दबाएं, अगर पानी निकलकर बह रहा है, तो समझ लीजिए की इसमें नमी बहुत अधिक है और उत्पादन अच्छा नहीं होगा। और यदि पानी सिर्प बहकर कलाई तक आया तो ऐसा कंपोस्ट चल जाएगा, मगर उनके कंपोस्ट में बिल्कुल पानी नहीं निकलता है, क्योंकि वो 52 से 55 प्रतिशत ही नमी रखते हैं। शिवम कहते हैं कि कुछ लोग अधिक मुनाफ़ा कमाने के चक्कर में नमी ज़्यादा रखते हैं जिससे बैग भारी हो जाता है, अपना अनुभव साझा करते हुए वो बताते हैं कि जब वो हरियाणा से कंपोस्ट मंगाते थे तो उन्हें भी बहुत नुकसान हुआ था, क्योंकि कंपोस्ट अच्छी क्वालिटी का नहीं था। अब वो खुद क्वालिटी कंपोस्ट बना रहे हैं और उत्तराखंड के अलावा हरियाणा और उत्तरप्रदेश के कई जिलों में भी सप्लाई करते हैं।
18-21 दिन में बनता है कंपोस्ट
शिवम कहते हैं कि अच्छा कंपोस्ट बनने में 18 से 21 दिन का समय लगता है। सबसे पहले सूखे भूसे को 3-4 दिन के लिए अच्छी तरह भिगोया जाता है। इसे भिगोना ज़रूरी है क्योंकि इसे भिगोएंगे नहीं तो इसमें बाकी चीज़ें मिक्स नहीं होगी। भिगोने के बाद सारा मिश्रण डालकर मिक्सिंग करके एक दिन के लिए इसे बाहर छोड़ देते हैं ताकि उसमें भाप बनें। इसमें मुर्गे की बीट का इस्तेमाल गर्माहट लाने के लिए किया जाता है। उसके बाद मिश्रण को बंकर में डाला है और हर दो दिन बाद पलटी करना पड़ता है, कुल दिन बार ऐसा करना होता है। 9 दिन के बाद इसे टनल में डालकर 6-7 दिन तक पकाया जाता है। शुरुआत में तापमान 80 डिग्री तक रहता है, लेकिन टनल में डालने के बाद तापमान 60 डिग्री के ऊपर नहीं जाने दिया जाता। इस पूरी प्रक्रिया में 18 से 21 का समय लग जाता है।
किस तरह के बीज का करते हैं इस्तेमाल?
शिवम का कहना है कि कंपोस्ट के साथ ही अच्छी क्वालिटी के बीज का इस्तेमाल भी ज़रूरी है। वो बताते हैं कि वो 6 साल से हरियाणा के डॉ. जितेंद्र के बनाए बीजों का इस्तेमाल कर रहे हैं, क्योंकि इसकी क्वालिटी बहुत अच्छी है। जहां तक कंपोस्ट की सप्लाई का सवाल है तो डिमांड के हिसाब से सप्लाई करते हैं। कुछ लोगों को सिर्फ खाद चाहिए तो वो देते हैं, कुछ कंपोस्ट और बीज अलग-अलग लेते हैं। जबकि कुछ लोगों को पूरा बैग चाहिए, तो ऐसे में पहले वो कंपोस्ट को बाहर निकालकर उसमें बीज मिलाते हैं। बीज का अनुपात 7 से 10 प्रतिशत रखा जाता है। वो कहते हैं आमतौर पर वो 100 बैग में 10 पैकेट बीज डालते हैं। दरअसल, ठंड में अगर बीज कम भी डालेंगे तो उत्पादन अच्छा होता है, मगर गर्मियों में खाद में नमी बन जाती है जिससे बीज के गलने की संभावना बढ़ जाती है, ऐसे में बीज ज़्यादा डालने चाहिए।
सरकार दे रही सब्सिडी
शिवम बताते हैं कि उत्तराखंड सरकार कंपोस्ट बैग पर 80 प्रतिशत तक सब्सिडी दे रही है। अगर कोई इस योजना का लाभ उठाना चाहता है तो इसे अपने नज़दीकी बागवानी विभाग के ऑफिस में जाना होगा। वहां वो अपना आधार कार्ड और बाकि डिटेल जमा करा सकते हैं। एक आधार कार्ड पर 200-500 बैग अलॉट हो जाता हैं। अगर किसी के आसपास बागवानी विभाग न हो, तो वो कृषि विज्ञान केंद्र से मदद ले सकता है। वो कुछ मुफ्त में ट्रेनिंग भी दी जाती है और आपको ये भी पता चल सकता है कि अच्छा कंपोस्ट और बीज कहां से लेना है। शिवम खुद कहते हैं कि अगर कोई सीखना चाहता है तो उनसे संपर्क कर सकता है, वो मुफ्त में ट्रेनिंग देते हैं।
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