खुशख़बरी: हिमाचल के 8 अनमोल खज़ाने को मिला GI Tag, अब दुनिया में बजेगा डंका!

यह उपलब्धि राज्य की सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने के साथ-साथ ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी मजबूती देगी।

हिमाचल प्रदेश के किसानों, बुनकरों और कारीगरों के लिए एक बहुत बड़ी और ऐतिहासिक खुशखबरी आई है। राज्य के आठ पारंपरिक उत्पादों को भौगोलिक संकेतक (Geographical Indication – GI) GI Tag  मिला है। ये टैग किसी उत्पाद को उसकी भौगोलिक पहचान के आधार पर कानूनी सुरक्षा देता है और उसे नेशनल और इंटरनेशनल लेवल पर एक नई पहचान दिलाता है।

मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू (Chief Minister Sukhvinder Singh Sukhu) ने प्रदेशवासियों को बधाई देते हुए कहा कि यह राज्य सरकार के पिछले साढ़े तीन सालों के लगातार प्रयासों का नतीजा है।

किन 8 उत्पादों को मिला GI टैग?

ये हैं वे 8 खास उत्पाद जिन्हें यह सम्मान मिला है:

1.स्पीति का सीबकथॉर्न (छरमा) : हिमालयी बेरी, जो विटामिन और एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर है। इसका उपयोग जूस, हर्बल दवाओं और स्किनकेयर उत्पादों में होता है।

2.सलूणी का सफेद मक्का : चंबा के सलूणी क्षेत्र का पारंपरिक सफेद मक्का, जो अपने अनोखे स्वाद के लिए जाना जाता है।

3.चंबा मेटल आर्ट : पीतल, तांबे और बेल-मेटल के बर्तन, धार्मिक वस्तुएं और सजावटी सामान बनाने की सदियों पुरानी कला।

4.सिरमौरी लोइया : सिरमौर के कारीगरों द्वारा बनाई गई हाथ से बुनी ऊनी शॉल, जो अपनी गर्मी, मजबूती और पारंपरिक डिजाइनों के लिए मशहूर है।

5.किन्नौरी टोपी : किन्नौर की प्रतिष्ठित ऊनी टोपी, जो रंगीन वेलवेट बैंड से सजी होती है और क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक है।

6.मंडी की सेपुवड़ी : मंडी जिले का पारंपरिक व्यंजन, जो दालों से बनता है और मंडयाली धाम का अहम हिस्सा है।

7.किन्नौरी सेब : ऊंचाई वाले बगीचों में उगाया जाने वाला सेब, जो अपनी कुरकुरी बनावट, मिठास और लंबी शेल्फ लाइफ के लिए जाना जाता है।

8.किन्नौरी ज्वेलरी : चांदी से हाथ से बनाए गए गहने, जिनमें किन्नौर की संस्कृति और प्रकृति से प्रेरित नक्काशी होती है।

क्यों है GI टैग इतना ख़ास?

पर्यावरण, विज्ञान, प्रौद्योगिकी और जलवायु परिवर्तन विभाग के सचिव सुशील कुमार सिंगला के अनुसार, GI टैग उत्पाद को कानूनी सुरक्षा प्रदान करता है:

  • नकली उत्पादों पर रोक : बिना अनुमति किसी को भी GI टैग वाले उत्पाद की नकल करने या गलत इस्तेमाल करने पर रोक लगती है।
  • बेहतर ब्रांडिंग : उत्पाद की ब्रांडिंग मजबूत होती है और बाजार में उसकी अलग पहचान बनती है।
  • बढ़ती मांग : राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उत्पाद की मांग बढ़ती है।
  • बेहतर कीमत : किसानों और कारीगरों को अपनी मेहनत का बेहतर दाम मिलने की संभावना बढ़ जाती है।
  • रोजगार के अवसर : ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के नए अवसर पैदा होते हैं।

अब तक 17 उत्पादों को मिला GI टैग

इन नए उत्पादों के जुड़ने के बाद अब हिमाचल प्रदेश के कुल 17 पारंपरिक उत्पादों को GI टैग मिल चुका है। इससे पहले कुल्लू शॉल, कांगड़ा चाय, चंबा रूमाल, किन्नौरी शॉल, कांगड़ा पेंटिंग, हिमाचली काला जीरा, हिमाचली चुल्ली तेल, चंबा चप्पल और लाहौली बुने हुए मोजे व दस्ताने जैसे उत्पादों को यह सम्मान मिल चुका है।

चार और उत्पादों की तैयारी

मुख्यमंत्री सुक्खू ने बताया कि राज्य सरकार चार अन्य पारंबरिक उत्पादों को भी GI टैग दिलाने की दिशा में काम कर रही है:

  • चंबा के पांगी क्षेत्र का भोट जौ
  • चंबा चुख (पारंपरिक मिर्च का पेस्ट)
  • भरमौर का प्लेक्ट्रेंथस शहद
  • सिरमौर का अदरक

ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मिलेगा बल

यह उपलब्धि राज्य की सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने के साथ-साथ ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी मजबूती देगी। GI टैग मिलने से स्थानीय उत्पादों का मूल्य बढ़ेगा, जिससे किसानों और कारीगरों की आमदनी में सुधार होगा और ग्रामीण उद्यमिता को बढ़ावा मिलेगा।

यह हिमाचल के उन लाखों लोगों के लिए एक सुनहरा अवसर है जो पीढ़ियों से इन पारंपरिक उत्पादों को बना रहे हैं। अब इनकी मेहनत को सही पहचान और सही दाम मिलेगा, और हिमाचल की समृद्ध विरासत पूरी दुनिया में अपना डंका बजाएगी।

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