डेयरी बिज़नेस करने वाले आमतौर गाय और भैंस ही पालते है बकरियां नहीं. क्योंकि आमतौर पर बकरियों की दूध देने की क्षमता 1-3 लीटर ही होती है। मगर कश्मीर की खूबसूरत वादियों में आई दूधिया सफेद बकरियां पहाड़ों के डेयरी बिज़नेस की तस्वीर बदल सकती है। स्विट्ज़रलैंड से लाई गई सानेन नस्ल की बकरियों पर इन दिनों कश्मीर में प्रयोग चल रहा है।
अगर ये प्रयोग सफल रहा तो Milk Queen कही जाने वाली सानेन नस्ल की बकरियां कश्मीर के डेयरी सेक्टर के लिए गेमचेंजर साबित हो सकती है, क्योंकि ये 3-7 लीटर दूध देती है। मगर स्विट्जरलैंड में 3-7 लीटर दूध देने वाली ये बकरी कश्मीर के वातावरण में ढल पाएगी और इससे किसानों को कितना फायदा होगा? इस पर विस्तृत जानकारी दी SKUAST-K के सीनियर साइंटिस्ट डॉ. परवेज अहमद रेशी ने।
सबसे ज़्याद दूध देने वाली नस्लों में से एक है
स्विट्ज़रलैंड की वादियों की तरह ही वहां से आई सानेन नस्ल की बकरियां भी बहुत खूबसूरत हैं। सफेद रंग की इन बकिरयों के सींग मोटे और नुकीले हैं। श्रीनगर की शेर-ए कश्मीर यूनिवर्सिटी ऑफ एग्रीकल्चरर साइंसेस एंड टेक्नोलॉजी के रिसर्च सेंटर में 24 स्विटज़रलैंड saanen बकरियां लाई गई हैं। दरअसल, कश्मीर जैसे पहाड़ी इलाके में हर परिवार घर का शुद्ध दूध तो चाहता है, लेकिन जगह की कमी और अधिक लागत की वजह से गाय पालना सबके बस की बात नहीं है। ऐसे में वैज्ञानिको का मानना है कि सानेन बकरियां अच्छा विकल्प हो सकती हैं।
SKUAST-K के सीनियर साइंटिस्ट डॉ. परवेज अहमद रेशी कहते हैं, सानेन नस्ल की बकरी सामान्य बकरियों से ज़्यादा दूध देती है। स्विट्ज़रलैंड में ये 3-7 लीटर तक दूध देती हैं और इनकी गनती दुनिया में सबसे ज़्यादा दूध देने वाली बकरियों में होती है। इसे Holstein of the goat भी कहा जाता है। होल्स्टीन सबसे ज़्यादा दूध देने वाली गाय की एक नस्ल है। आगे वो बताते हैं कि एक्सपेरिमेंट के लिए सानेन बकरियों को रिसर्च सेंटर में लाया गया है, इन बकरियों की उम्र 7-8 महीने है और इन पर अभी 2-3 साल तक रिसर्च किया जाएगा तभी पता चलेगा कि ये कश्मीर के मौसम में रह सकती हैं या नहीं।
युवाओं के लिए अच्छा विकल्प
डॉ. परवेज अहमद रेशी बताते हैं कि सानेन नस्ल की बकरियां एग्रेसिव ब्रीड नहीं होती हैं और डेयरी बिज़नेस में करियर बनाने की चाह रखने वाले युवाओं के लिए ये एक अच्छा विकल्प साबित हो सकता है। इन बकरियों की खासियत है कि इन्हें कम जारे की ज़रूरत होती है और इनडोर भी इन्हें पाला जा सकता है। आगे वो बताते हैं कि प्रयोगशाला में अगले 3 साल तक इन बकरियों के आहार, दवा, स्वास्थ्य और प्रजनन क्षमता पर रिसर्च की जाएगी। उसके बाद ही कहा जा सकता है कि स्विट्जरलैंड में 3-7 लीटर दूध देने वाली ये बकरी यहां कितना दूध देगी।
परवेज़ अहमद रिसर्च को लेकर काफी सकारात्मक नज़र आते हैं उनका कहना है कि कश्मीर की जलवायु भी स्विट्ज़रलैंड से काफी मिलती जुलती है तो उम्मीद की जा सकती है ये बकरियां यहां के मौसम में ढल जाएंगी। आमतौर पर सानेन बकरियां 2-3 बच्चे देती हैं और 12-14 महीने में बच्चा रखने की क्षमता विकसित हो जाती है।
क्रॉस ब्रीडिंग की संभावना
सानेन नस्ल अगर यहां के माहौल मे ढल गई तो आगे लोकल नस्ल के साथ उसकी क्रॉस ब्रीडिंग की भी योजना है। डॉ. परवेज कहते हैं कि कश्मीर की लोकल बकरवाल नस्ल पहाड़ों के मौसम में तो खुद को ढाल चुकी है लेकिन दूध सिर्फ आधा लीटर ही देती है।
इसलिए भविष्य में इनके जेनेटिक अपग्रेडेशन या क्रॉस ब्रीडिंग के लिए सानेन नस्ल का इस्तेमाल किया जा सकता है, जिससे एक ऐसी नस्ल तैयार हो, जो दूध ज़्यादा दे और कश्मीर की जलवायु में भी आसानी से रह सके। वो बताते हैं कि बकरी का दूध बच्चों और बुज़ुर्गों के लिए फायदेमंद माना जाता है, क्योंकि ये A2 बीटा-कैसीन प्रोटीन से भरपूर होता है। सानेन नस्ल पर किया जा रहा एक्सपेरिमेंट अगर सफल रहा तो कश्मीर के डेयरी बिज़नेस की तस्वीर बदल सकती है।
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