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Pearl Farming यानी मोती पालन (Pearl Farming) हमारे देश में अभी बहुत लोकप्रिय नहीं हुआ है, क्योंकि इसमें समय बहुत लगता है, हालांकि ये एक उभरता हुआ व्यवसाय ज़रूर है। भारत में मोती पालन (Pearl Farming) व्यवसाय को एक नई दिशा देने में अशोक मनवानी और उनकी पत्नी कुलजना दुबे मनवानी का बहुत योगदारन रहा है।
दोनों 1997 से प्राकृतिक तरीके से मोती पालन (Pearl Farming) कर रहे हैं। शुरुआत में उन्हें 13 साल तक कोई भी मोती नहीं मिला, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और लगातार कोशिश करते रहे। आज वो सफल मोती पालक हैं। यही नहीं उन्होंने इसमें इस्तेमाल होने वाले उपकरण बनाए और सीप से 300 से ज़्यादा उत्पाद तैयार किए हैं। मोती पालन (Pearl Farming) के अपने सफर और इस व्यवसाय की बारीकियों के बारे में चर्चा की किसान ऑफ इंडिया के संवाददाता सर्वेश बुंदेली से।
कैसे शुरू हुआ मोती पालन का सफर?
मोती पालन (Pearl Farming) की दुनिया में अशोक मनवानी एक जाना माना नाम है, मगर यहां तक पहुंचने के लिए उन्होंने बहुत संघर्ष किया है। अशोक बताते हैं कि स्कूल के दिनों में उनका पढ़ाई मे ज़्यादा मन नहीं लगता था, तो वो गांव में नदियों के पास चले जाते थे और वहां उन्होंने सीप देखी, उस वक्त नहीं पता था कि सीप में होता क्या है, लेकिन ये पता चल गया कि सीप मिलता कहा है। फिर 1997 में उन्होंने मोती पालन (Pearl Farming) की शुरुआत की और 2001 में भुवनेश्वर से ट्रेनिंग ली।
उनकी पत्नी कुलजना दुबे मनवानी ने CIFE (Central Institute of Fisheries Education) मुंबई से प्रशिक्षण लिया। दोनों ने मिलकर पर्ल फार्मिंग में बहुत एकस्पेरिमेंट किए, मगर 13 साल तक वो एक भी मोती उगा नहीं पाए। हालांकि इस असफलता से वो निराश नहीं हुए और लगातार आगे बढ़ते रहे। अशोक मनवानी ने साथ में कई उपकरण भी बनाएं जिनका इस्तेमाल मोती पालन (Pearl Farming) में होता है। अशोक सिर्फ इंटर तक ही पढ़े हैं, लेकिन आज वो BHU में B. SC एग्रीकल्चर के छात्रों को पढ़ाते हैं और वहां पर्ल फार्मिंग का उनका प्रोजेक्ट भी चल रहा है।
कई राज्यों में किए प्रयोग
अशोक बताते हैं कि मोती पालन (Pearl Farming) में उन्होंने अपना पूरा जीवन लगा दिया और 28 साल से अपने गांव नहीं जा पाए हैं। क्योंकि वो देश के अलग-अलग हिस्सों में एक्सपेरिमेंट करने में व्यस्त रहते हैं। आज भारत के 18 राज्यों में मोती उगाने में उनका योगदान है। जिसमें बिहार, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, गोवा, दिल्ली, उड़ीसा, कर्नाटक, छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल, असम, राजस्थान, गुजरात और मध्यप्रदेश शामिल है। इन राज्यों में उन्होंने अपने जीवन के 2-2 साल बिताए हैं। वो कहते हैं कि उनका कहीं ऑफिस नहीं है, लेकिन आज भी वो सीख रहे हैं। वो खुद नदियों से सीप लाते हैं और अपनी पत्नी के साथ उसका अध्ययन करते हैं।
सीप से कैसे बनता है मोती?
अशोक कहते हैं कि वो नेचुरल तरीके से मोती पालन (Pearl Farming) करते हैं, जिसमें वो सीप के खुद मरने का इंतज़ार करते हैं, उसे मारते नहीं है। मोती बनने की प्रक्रिया के बारे में वो बताते हैं कि पहली बारिश में पानी के साथ ही मिट्टी के कण भी होते हैं, तो प्यासा सीप जब पानी के लिए मुंह खोलता है तो उसके अंदर वो कण भी फंस जाते हैं, कण फंस जाने की वजह से सीप से एक द्रव्य निकलता है और यही कण धीरे-धीरे मोती बन जाता है। दरअसल, सीप के अंदर एक छोटा जीव होता है जो वो द्रव्य निकालता है।
ऑर्गेनिक और नेचुरल में फर्क
आमतौर पर हम ऑर्गेनिक और नेचुरल को एक ही समझते हैं, मगर पर्ल फार्मिंग में दोनों के मायने अलग होते हैं। इस बारे में अशोक मनवानी कहते हैं कि ऑर्गेनिक में सीप को जैविक भोजन दिया जाता है, जैसे- गुड़, छाछ, चावल की पॉलिश, मूंगफली- सरसों की खली आदि। नेचुरल का मतलब है कि इस प्रक्रिया में मोती निकालने के लिए सीप को मारा नहीं जाता है, बल्कि जब वो खुद मर जाते हैं तो मोती निकाला जाता है। इसमें 3 साल या उससे अधिक समय भी लग सकता है। इसलिए अशोक मनवानी किसानों को पर्ल फार्मिंग के साथ ही मछली पालन की सलाह देते हैं, ताकि आमदनी होती रहे।
क्या होती है मोती पालन की पहली स्टेज?
जो किसान मोती पालन (Pearl Farming) करना चाहते हैं, उन्हें अशोक सलाह देते हैं कि सबसे पहले मिट्टी का तालाब बनवाएं और जो किसान पहले से ही तालाब में मछली पालन कर रहे हैं, उनके लिए ये काम आसान है। तालाब छोटा या बड़ा कैसा भी हो सकता है। दरअसल, तालाब के पानी में जमने वाली काई ही सीप का भोजन होता है।
ध्यान रहे कि तालाब में पूरे साल पानी होना चाहिए। सीप का चुनाव करते समय इस बात का ध्यान रहे कि उसमें लस्टर यानी चमक होनी चाहिए। वो किसानों को स्थानीय सीप का इस्तेमाल करने की सलाह देते हैं, क्योंकि वो उस जगह की जलवायु में आसानी से ढल जाता है। साथ ही वो कहते हैं कि सीपियों का अध्ययन करना ज़रूरी है तभी उसकी खासियत समझ आएगी। हमेशा चमकदार सीप का ही इस्तेमाल करें, क्योंकि इसमें ही मोती बनते हैं।
कई तरह के उपकरण भी बनाए हैं
अशोक बताते हैं कि मोती पालन (Pearl Farming) के अपने इस सफर में उन्होंने कई तरह के काम किए है जिसमें उपकरण बनाना भी शामिल हैं। उन्होंने सीप ओपनर बनाया है जिसकी मदद से सीप को थोड़ा खोलकर ही काम चल जाता है। इसके अलावा उन्होंने लकड़ी की मशीनों के साथ ही और भी कई तरह के उपकरण बनाए हैं जो मोती पालन (Pearl Farming) में काम आते हैं। मोती बनाने के लिए सीप में न्यूक्लिस डाला जाता है इसके लिए ओपनर की मदद से इसे थोड़ा खोलना होता है। वो बताते हैं कि सीप शांति में खुलता है, इसलिए ये काम शांत वातावरण में ही करें।
न्यूक्लिस डालने के बाद सीप को जाली में डाला जाता है। जाली में एक उंगली का गैप होना चाहिए, एक जाली में दो सीप डाले जा सकते हैं और इसमें दाना डालने के बाद ऊपर से बांध दिया जाता है। इसे पानी में 1-2 मीटर अंदर डालें। ध्यान रहे तालाब का पानी हरा होना चाहिए। अगर ये हरा नहीं है तो चावल की पॉलिश, सरसों-मूंगफली की खली को एक साथ या अलग-अलग भिगो दें, फिर पानी में डालें।
अलग से भोजन की ज़रूरत नहीं होती
सीप को अगर कोई मछली वाले तालाब में ही पाल रहा है तो वो मछली का बचा-खुचा खाना खा लेते हैं। अशोक बताते हैं कि सीप नदी-तालाब जमने वाली काई भी खाता है, तो इसके लिए अलग से भोजन का प्रबंध करने की ज़रूरत नहीं पड़ती है। कई लोगों को लगता है कि मछली वाले तालाब में सीप कैसे डाले तो अशोक सलाह देते हैं कि सीप की जाली को 4 घंटे के लिए बाहर निकाल दें और मछली पकड़ने के बाद उन्हें वापस डाल दें।
इसके अलावा वो बताते हैं कि पर्ल फार्मिंग सिर्फ मछली पालन के साथ ही नहीं कर सकते हैं, बल्कि साथ में बतख भी पाल सकते हैं और उसके ऊपर एक एरिया में मुर्गी पालन भी कर सकते हैं। तो मुर्गी जो भोजन खाकर वेस्ट करती है वो बाकियों का भोजन हो जाएगा। तावाब के आसपाल हल्के पेड़ भी लगा सकते हैं। बहुत घने पेड़ न लगाएं, क्योंकि इससे तालाब में धूप नहीं आएगी और फिर शैवाल नहीं बनेंगे।
पर्ल हार्वेस्टिंग
अशोक कहते हैं कि सीप को बिना मारे भी मोती निकाला जा सकता है। बड़े आकार के सीप में गोल मोती उगाए जा सकते हैं। वो बताते हैं कि सीप को वो मारते नहीं है, जब सीप अपने आप मर जाता है तो सीप को मोती के साथ काटकर वो पेंडेंट बना देते हैं, जब तक सीप जिंदा रहता है मोती बनाता है। आगे वो बताते हैं कि इस बात का ध्यान रखन चाहिए कि सीप पतला होगा तो मोती देर से बनेगा और अगर सीप मोटा होगा तो मोती जल्दी बनेगा। आमतौर पर डेढ़ से दो साल में मोती बन जाता है।
मोतियों की प्रोसेसिंग
जैसे फल और सब्ज़ियों की प्रोसेसिंग की जाती है, वैसे ही मोतियों की भी प्रोसेसिंग की जाती है। ताकि वो सालों साल चले और उनकी अच्छी क़ीमत मिले। इसके अलावा अशोक पर्ल टूरिज़्म के बारे में बताते हुए कहते हैं कि जो लोग उनके यहां आते हैं उनसे वो कहते हैं कि एक मोती खरीदने पर ही उन्हें पूरा फार्म दिखाया जाएगा। उनका मानना है कि पर्ल फार्मिंग में सफल होने के लिए बड़े स्तर पर काम करना ज़रूरी है।
मरी हुई सीपियों का कराया पेटेंट
अशोक बताते हैं कि उन्होंने सीप से पेंडेंट बनाना सीखा जिसमें उन्हें करीब 2 साल का समय लगा। अब तक वो मरी हुई सीपियों से 300 से अधिक प्रोडक्ट बना चुके हैं और उन्होंने इसका पेटेंट भी करा लिया है। जहां तक मोती की क़ीमत का सवाल है तो वो बताते हैं कि दोयम दर्जे का मोती 1100 रुपए में मिलता है, अगर आपको अच्छी क्वालिटी का मोती चाहिए तो उसकी क़ीमत 7 हजार रुपए तक होती है। वो सीप से बने पेंटेंड 1100 रुपए में बेचते हैं।
महत्वपूर्ण बातें
- छोटे बॉक्स में डालने पर सीप मर जाते हैं, उन्हें अकेलापन पसंद नहीं है।
- मोती पालन (Pearl Farming) के लिए तालाब 20 मीटर लंबा, 20 मीटर चौड़ा और 6 फीट गहरा होना चाहिए। यदि 7 फीट का तालाब हो और इसमें 6 फीट पानी रखना अच्छा है, ज़्यादा पानी रहने पर बीमारी नहीं फैलती है।
- हर बार पानी में चूना डालने से रोग खत्म हो जाते हैं।
- सीप के अंदर एक कीड़ा होता है और वही जीव मोती बनाता है।
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