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राजस्थान के जयपुर ग्रामीण क्षेत्र में इन दिनों किसान एक ऐसी खेती की ओर बढ़ रहे हैं, जो उन्हें कम लागत में अच्छा मुनाफ़ा दे रही है। ये खेती है लसोड़े की खेती, जो अब किसानों के लिए अतिरिक्त आय का मज़बूत ज़रिया बनती जा रही है। जोबनेर, फुलेरा, सांभरलेक, रेनवाल, बगरू, चौंमू और गोविंदगढ़ जैसे इलाकों में किसान बड़े स्तर पर लसोड़े की खेती से जुड़े हुए हैं और इससे अच्छा लाभ कमा रहे हैं।
खेत की मेड़ पर भी हो रही लसोड़े की खेती
यहां के किसान लसोड़े की खेती को अपने खेतों की मेड़ और बंजर ज़मीन पर भी कर रहे हैं। इसकी ख़ास बात ये है कि इसे लगाने के लिए अलग से ज़्यादा जगह की ज़रूरत नहीं होती। यही कारण है कि इसकी खेती किसानों के लिए एक आसान और लाभदायक विकल्प बन रही है।
एक बार पौधा लगाने के बाद ये 5 से 7 साल में फल देना शुरू कर देता है और 30 से 40 साल तक लगातार उत्पादन देता रहता है। एक पेड़ से क़रीब एक क्विंटल तक फल मिल सकता है, जिससे किसानों को नियमित आय मिलती रहती है।
कर्ण लसोड़े की खेती क़िस्म से बढ़ा मुनाफ़ा
जयपुर के श्री कर्ण नरेन्द्र कृषि विश्वविद्यालय, जोबनेर द्वारा विकसित लसोड़े की खेती क़िस्म ‘कर्ण’ ने किसानों के बीच ख़ास पहचान बनाई है। इस लसोड़े की खेती क़िस्म की मांग बाज़ार में तेजी से बढ़ रही है, क्योंकि इससे अच्छी गुणवत्ता और ज़्यादा उत्पादन मिलता है।
विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों के अनुसार, इस लसोड़े की खेती क़िस्म से किसान साल में दो बार उपज ले सकते हैं। इससे किसानों की आय में और बढ़ोतरी हो रही है और वे लसोड़े की खेती को और तेजी से अपना रहे हैं।
कम लागत में ज़्यादा मुनाफ़ा
लसोड़े की खेती की सबसे बड़ी ख़ासियत ये है कि इसमें ज़्यादा लागत नहीं आती। किसान इसे आसानी से अपने खेतों के किनारे या खाली ज़मीन पर लगा सकते हैं। इस कारण इसकी खेती छोटे और बड़े दोनों किसानों के लिए फ़ायदेमंद साबित हो रही है।
प्रगतिशील किसान भी मानते हैं कि इसकी खेती से उन्हें अतिरिक्त आय का एक स्थायी स्रोत मिला है। इससे खेती में जोखिम भी कम होता है और आय के नए रास्ते खुलते हैं।
अचार की बढ़ती मांग से बढ़ा बाज़ार
लसोड़े की खेती का एक बड़ा फ़ायदा ये भी है कि इसके फल का उपयोग अचार बनाने में किया जाता है, जिसकी मांग बाज़ार में लगातार बढ़ रही है। जैसे ही अचार का मौसम आता है, लसोड़े की मांग और ज़्यादा बढ़ जाती है।
इसी वजह से किसान इसकी खेती को एक भरोसेमंद फ़सल मानने लगे हैं। बाज़ार में अच्छी कीमत मिलने से किसानों को बेहतर मुनाफ़ा मिल रहा है।
वैज्ञानिकों का मार्गदर्शन बना सहारा
श्री कर्ण नरेन्द्र कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों द्वारा किसानों को लगातार मार्गदर्शन दिया जा रहा है। डॉ. ओपी गढ़वाल ने बताया कि सही तकनीक और सही लसोड़े की खेती क़िस्म अपनाने से किसान कम मेहनत में बेहतर उत्पादन हासिल कर सकते हैं।
शोधार्थी और अन्य विशेषज्ञ भी किसानों को नई जानकारी दे रहे हैं, जिससे इसकी खेती और अधिक सफल बन रही है।
किसानों के लिए बन रही नई पहचान
जयपुर ग्रामीण क्षेत्र में इसकी खेती अब सिर्फ एक फ़सल नहीं, बल्कि किसानों के लिए एक नई पहचान बन रही है। किसान इसे अपनी मुख्य खेती के साथ जोड़कर अतिरिक्त आय कमा रहे हैं। लसोड़े की खेती क़िस्म ‘कर्ण’ के सफल उपयोग से ये साफ़ हो गया है कि सही क़िस्म और सही तरीक़ा अपनाकर खेती को और लाभकारी बनाया जा सकता है।
खेती में नई दिशा की ओर बढ़ते किसान
इस तरह लसोड़े की खेती किसानों को एक नई दिशा दे रही है। कम लागत, आसान देखभाल और बाज़ार में बढ़ती मांग के कारण ये खेती तेजी से लोकप्रिय हो रही है। जयपुर ग्रामीण के किसान अब इस खेती के जरिए अपनी आय बढ़ा रहे हैं और खेती को एक मज़बूत व्यवसाय के रूप में आगे बढ़ा रहे हैं।
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Pic Credit: PB-SHABD

