आज भारत का किसान सिर्फ अनाज उगाने वाला नहीं रहा। वो एक जलवायु योद्धा, एक इनोवेटर और एक बिज़नेसमैन बन गया है। क्लाइमेट चेंज की मार, अनियमित बारिश, सूखा, बाढ़, मिट्टी की ख़राब हेल्थ के कारण किसान को काफी कुछ झेलना पड़ जाता है। लेकिन छोटी जोत वाले किसान ही हैं जिन्होंने देश की खाद्य सुरक्षा की डोर थाम रखी है, और अब वे जलवायु-लचीली कृषि (Climate-Resilient Agriculture – CRA) के ज़रिए दुनिया को रास्ता दिखा रहे हैं।
जलवायु हमारी फसलों को कैसे ख़त्म कर रही है?
पिछले 40 सालों के आंकड़े डराते हैं-
1.देश के 30 फीसदी ज़िले बार-बार सूखे का शिकार हुए।
2.38 फीसदी जिलों ने अचानक आई भारी बारिश और बाढ़ की मार झेली।
3.इसका सीधा असर फसलों पर पड़ा, जिससे साउथ इंडिया में चावल की पैदावार 8 फीसदी और ईस्ट इंडिया में 5 प्रतिशत गिर गई।
4.वैज्ञानिक चेतावनी दे रहे हैं कि आने वाले दिनों में गर्मी और मौसम का उलट-फेर और बढ़ेगा।
5.इसके साथ ही, परंपरागत खेती के कुछ तरीके भी जलवायु परिवर्तन को बढ़ावा दे रहे हैं, जैसे पराली जलाना, धान की खेती से निकलने वाली मीथेन गैस, और जंगल काटकर खेत बनाना।
एक तरफ खेती जलवायु परिवर्तन से प्रभावित हो रही है, दूसरी तरफ वो उसे बढ़ावा भी रही है।
जलवायु-लचीली और स्मार्ट खेती
भारत के पास इस चुनौती का जवाब है। सरकारी मिशन जैसे NMSA, NICRA और ग्रामीण कृषि मौसम सेवा (GKMS) ने 30 से ज़्यादा Sustainable agricultural practices (SAPs) की पहचान की है, जो किसानों की आमदनी बढ़ाती हैं, मिट्टी को स्वस्थ बनाती हैं और जलवायु के झटकों को सहने की ताकत देती हैं।
1. मिट्टी और पानी बचाने वाली तकनीकें
- वर्षा जल संचयन: बारिश के पानी को खेत में ही रोकना।
- ‘ऑप्शनल गीलापन और सुखाना’ (AWD): धान की खेती में ये तरीका पानी की 40 फीसदी बचत कराता है और हानिकारक मीथेन गैस के उत्सर्जन में 23 प्रतिशत कटौती करता है। साथ ही उपज भी 5 फीसदी तक बढ़ जाती है।
- ड्रिप सिंचाई: पानी की बर्बादी रोककर दक्षता बढ़ाती है।
2. प्रकृति के साथ तालमेल
- प्राकृतिक/जैविक खेती: गोबर की खाद, वर्मीकम्पोस्ट, जीवामृत, नीम के तेल जैसे ऑर्गेनिक उपायों से मिट्टी जिंदा होती है और कीट नियंत्रित (Pest controlled) होते हैं।
- एग्रोफॉरेस्ट्री : फसलों के साथ पेड़ लगाना। ये पेड़ कार्बन सोखते हैं, मिट्टी को बांधते हैं और एक्स्ट्रा इनकम देते हैं।
- कीट प्रबंधन: केमिकल कीटनाशकों पर निर्भरता कम करना।
3. फसल मैनेजमेंट में बदलाव:
- क्रॉप रोटेशन: एक ही खेत में अलग-अलग मौसम में अलग फसलें उगाना, जिससे मिट्टी की उर्वरता बनी रहे।
- मल्टी क्रॉपिंग सिस्टम: एक साथ एक से ज्यादा फसल उगाकर जोखिम कम करना और आय बढ़ाना।
किसान,जो बना रहे हैं नया इतिहास
Policies and plans तब तक सफल नहीं होतीं, जब तक उन्हें खेत तक पहुंचाने वाले और अपनाने वाले किसान न हों। बिहार और ओडिशा जैसे राज्य, जो क्लाइमेट चेंज की मार झेल रहे हैं, वहां के किसानों ने अद्भुत मिसाल कायम की है।
सफलता की कहानियां:
- योगेश कुमार: गन्ने की प्राकृतिक खेती अपनाई और साथ ही उसकी प्रोसेसिंग कर नए उत्पाद बनाकर अपनी आय में भारी बढ़ोतरी की।
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- डोंडुबाई चव्हाण: एकीकृत कृषि प्रणाली (बागवानी, मुर्गीपालन, मछलीपालन सब एक साथ) अपनाकर कम जमीन पर ही लाखों रुपए की कमाई की और राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान पाया।
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- युवा एग्री-स्टार्टअप: अब खेती सिर्फ खेत तक सीमित नहीं। युवा मशरूम, ड्रैगन फ्रूट, औषधीय पौधों की खेती कर रहे हैं। शहद उत्पादन, फूलों की खेती और हर्बल उत्पादों के बिजनेस खड़े कर रहे हैं। ऑनलाइन मार्केटिंग के ज़रिए सीधे ग्राहकों से जुड़ रहे हैं।
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आगे का रास्ता
चुनौती ये है कि खेती राज्यों का विषय है। इसलिए जलवायु-लचीली खेती (Climate-resilient agriculture) को बढ़ावा देने के लिए राज्य-स्तर पर संस्थाओं की क्षमता मज़बूत करनी होगी। किसानों तक सही जानकारी, टेक्नोलॉजी, बीज और फाइनेंशियल मदद पहुंचाने के लिए एक मजबूत ढांचा चाहिए।
खेत ही भविष्य के हीरो
जलवायु परिवर्तन (Climate Change) का सामना करना अब option नहीं, ज़रूरत है और ये लड़ाई खेतों के मोर्चे से जीती जाएगी। भारत का किसान, अपने अनुभव, लगन और इनोवेशन से, दुनिया को दिखा रहा है कि टिकाऊ विकास और समृद्धि का रास्ता खेतों से होकर गुज़रता है।
सम्पर्क सूत्र: किसान साथी यदि खेती-किसानी से जुड़ी जानकारी या अनुभव हमारे साथ साझा करना चाहें तो हमें फ़ोन नम्बर 9599273766 पर कॉल करके या [email protected] पर ईमेल लिखकर या फिर अपनी बात को रिकॉर्ड करके हमें भेज सकते हैं। किसान ऑफ़ इंडिया के ज़रिये हम आपकी बात लोगों तक पहुँचाएँगे, क्योंकि हम मानते हैं कि किसान उन्नत तो देश ख़ुशहाल।
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