प्राकृतिक खेती से अपनी पहचान बनाने वाली महिला किसान रिशु कुमारी की कहानी

रिशु कुमारी ने प्राकृतिक खेती अपनाकर कम ख़र्च में अधिक आय पाई और महिला किसानों के लिए आत्मनिर्भरता की नई मिसाल पेश की।

प्राकृतिक खेती Natural farming

शादी से पहले पिता के नाम से और शादी के बाद पति के नाम से पहचानी जाने वाली महिलाओं के लिए अपनी अलग पहचान बनाना आसान नहीं होता। हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा ज़िले के जमानाबाद गांव की रिशु कुमारी के सामने भी यही चुनौती थी। उनके ससुर खेती से परिवार का भरण-पोषण करते थे। ऐसे में रिशु के लिए खेती में कुछ नया करना और अपनी पहचान बनाना एक बड़ा फैसला था।

इसी तलाश में रिशु कुमारी का परिचय प्राकृतिक खेती से हुआ। उन्होंने न सिर्फ़ इस खेती विधि को समझा, बल्कि पूरे आत्मविश्वास के साथ इसे अपनाने का निर्णय लिया। शुरुआत आसान नहीं थी, परिवार में विरोध भी हुआ, लेकिन रिशु ने धैर्य और विश्वास के साथ आगे बढ़ने का रास्ता चुना।

प्रशिक्षण से आत्मविश्वास तक का सफ़र

रिशु कुमारी ने सबसे पहले प्राकृतिक खेती का विधिवत प्रशिक्षण लिया। प्रशिक्षण के दौरान उन्होंने सीखा कि बिना रासायनिक खाद और दवाइयों के भी खेती संभव है और लागत को काफी हद तक कम किया जा सकता है। उन्होंने इस खेती विधि को सीधे बड़े खेत में अपनाने के बजाय पहले छोटे स्तर पर प्रयोग के तौर पर शुरू किया। जब परिणाम सामने आए फ़सल की गुणवत्ता बेहतर हुई, ख़र्च कम हुआ और आमदनी बढ़ी तो उनका भरोसा और मज़बूत हो गया। आज रिशु अपनी पूरी 6 बीघा (12 कनाल) ज़मीन पर सफलतापूर्वक प्राकृतिक खेती कर रही हैं।

परिवार के सहयोग से बदली तस्वीर

रिशु बताती हैं कि शुरू में परिवार पूरी तरह आश्वस्त नहीं था, लेकिन जैसे-जैसे प्राकृतिक खेती के फायदे सामने आए, परिवार का नजरिया भी बदलता गया। उनके पति पेशे से शिक्षक हैं और उन्होंने रिशु को खेती के लिए हमेशा प्रोत्साहित किया। आज रिशु अपने खेतों की पूरी देखरेख खुद करती हैं—बीज चयन से लेकर फ़सल की कटाई और बिक्री तक। खेती अब सिर्फ़ परिवार की ज़रूरत नहीं, बल्कि उनकी पहचान बन चुकी है।

प्राकृतिक खेती से अपनी पहचान बनाने वाली महिला किसान रिशु कुमारी की कहानी

खेती में बदलाव से बदली आमदनी

पहले जब परिवार रासायनिक खेती करता था, तब ख़र्च ज़्यादा और मुनाफ़ा सीमित था। रिशु कुमारी बताती हैं कि पहले खेती में करीब 20,500 रुपये ख़र्च आता था और आमदनी भी कम होती थी। लेकिन प्राकृतिक खेती अपनाने के बाद तस्वीर पूरी तरह बदल गई। अब खेती में ख़र्च घटकर करीब 5,000 रुपये रह गया है, जबकि आमदनी भी बढ़ गई। कम लागत और बेहतर आमदनी ने परिवार की आर्थिक स्थिति को मज़बूत किया और खेती के प्रति भरोसा बढ़ाया।

फ़सलों की विविधता बनी ताकत

रिशु कुमारी ने एक ही फ़सल पर निर्भर रहने के बजाय विविध फ़सलों को अपनाया। उनके खेतों में आज प्याज, लहसुन, मटर, गेहूं, धान, मक्की, गोभी, मूली, शलजम, धनिया और पालक जैसी फ़सलें उगाई जाती हैं। इस विविधता का फ़ायदा ये हुआ कि साल भर कुछ न कुछ उत्पादन मिलता रहता है और बाज़ार पर निर्भरता कम हो जाती है। रिशु अपनी सब्जियों को सड़क किनारे कियोस्क लगाकर बेचती हैं, जिससे बिचौलियों की ज़रूरत नहीं पड़ती और सीधा मुनाफ़ा मिलता है।

पहचान सिर्फ़ घर तक नहीं, पूरे ज़िले में

रिशु बताती हैं कि शादी के बाद जब वे गांव आई थीं, तो उन्हें सिर्फ़ पति के नाम से जाना जाता था। लेकिन प्राकृतिक खेती से जुड़ने के बाद उनकी पहचान बदल गई। आज न सिर्फ़ उनका इलाका, बल्कि पूरा ज़िला उन्हें एक सफल महिला किसान के रूप में जानता है। उनके खेती मॉडल को देखने के लिए आसपास के किसान उनके खेतों में आते हैं और सीखते हैं कि कम ख़र्च में बेहतर खेती कैसे की जा सकती है।

प्रशिक्षण देकर बन रहीं बदलाव की वाहक

रिशु कुमारी अब सिर्फ़ खुद तक सीमित नहीं हैं। वे चाहती हैं कि दूसरी महिलाएं भी खेती के जरिए आत्मनिर्भर बनें। इसी सोच के साथ उन्होंने अपने पास एक प्रशिक्षु किसान को 6 महीने का प्राकृतिक खेती प्रशिक्षण देना शुरू किया है।इसके अलावा प्राकृतिक खेती खुशहाल किसान योजना के तहत उन्हें तीन पंचायतों में प्राकृतिक खेती के प्रसार की जिम्मेदारी भी सौंपी गई है। अब तक वे 300 से अधिक किसानों को इस खेती विधि के बारे में प्रशिक्षण दे चुकी हैं।

प्राकृतिक खेती से अपनी पहचान बनाने वाली महिला किसान रिशु कुमारी की कहानी

महिला किसानों के लिए रिशु का संदेश

रिशु कुमारी कहती हैं—

“इस खेती विधि ने मुझे अपनी एक पहचान दिलाई है। मैं चाहती हूं कि दूसरी महिला किसान भी प्राकृतिक खेती से जुड़ें और अपने दम पर आगे बढ़ें।”

उनका मानना है कि खेती सिर्फ़ पुरुषों का काम नहीं है। सही जानकारी, प्रशिक्षण और आत्मविश्वास के साथ महिलाएं भी खेती को सफल व्यवसाय बना सकती हैं।

निष्कर्ष

रिशु कुमारी की कहानी ये साबित करती है कि प्राकृतिक खेती सिर्फ़ खेती की एक विधि नहीं, बल्कि महिलाओं के लिए आत्मनिर्भरता और पहचान का रास्ता भी है। कम ख़र्च, बेहतर आमदनी और समाज में सम्मान—इन तीनों ने रिशु को एक साधारण किसान से प्रेरणा का स्रोत बना दिया है। उनकी ये जर्नी हर उस महिला के लिए संदेश है, जो अपने दम पर कुछ करना चाहती है और खेती को सम्मान के साथ आगे बढ़ाना चाहती है।

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