हिमाचल के सेवानिवृत्त फ़ौजी किसान सुरेश कुमार ने मिट्टी बचाने की राह पर अपनाई प्राकृतिक खेती

धर्मशाला के किसान सुरेश कुमार ने प्राकृतिक खेती अपनाकर मिट्टी की रक्षा और आमदनी दोनों बढ़ाई, बन गए किसानों के प्रेरणा स्रोत।

प्राकृतिक खेती Natural Farming

सीमा पर देश की रक्षा करने के बाद अब हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला ब्लॉक के डगवार पंचायत के किसान सुरेश कुमार ने मिट्टी और पर्यावरण की रक्षा का जिम्मा उठाया है। उन्होंने रासायनिक खेती को छोड़कर पूरी तरह प्राकृतिक खेती को अपनाया है। सुरेश 2018 से प्राकृतिक खेती कर रहे हैं और अब तक लगभग 200 से अधिक किसानों को भी रासायन-मुक्त खेती से जोड़ चुके हैं।

उन्होंने प्राकृतिक खेती के जनक पद्मश्री सुभाष पालेकर से भरतपुर, राजस्थान में प्रशिक्षण प्राप्त किया। इसके बाद उन्होंने अपने खेतों में इस तकनीक को अपनाने का प्रयोग किया और नतीजे इतने सकारात्मक मिले कि अब पूरी तरह इसी खेती पद्धति पर निर्भर हैं।

प्राकृतिक खेती से मिट्टी और आमदनी दोनों में सुधार

सुरेश कुमार बताते हैं कि उन्होंने शुरुआत में अपने खेत की आधी ज़मीन, यानी 7.5 बीघा पर प्राकृतिक खेती का प्रयोग किया था। पहले ही साल उन्हें इसके शानदार परिणाम देखने को मिले — फ़सलों की गुणवत्ता बेहतर हुई, उत्पादन बढ़ा और मिट्टी की उर्वरता में भी सुधार आया। बाद में उन्होंने अपनी पूरी 15 कनाल (7.5 बीघा) ज़मीन को प्राकृतिक खेती के लिए समर्पित कर दिया। आज उनके खेतों में मटर, गेहूं, धान, मक्की, गोभी, मूली, शलजम, धनिया, पालक जैसी फ़सलें उगाई जाती हैं।

प्राकृतिक खेती उत्पादों की बढ़ती मांग

जब सुरेश कुमार ने अपनी उपज को धर्मशाला जिला कार्यालय के बाहर प्राकृतिक खेती उत्पाद बिक्री केंद्र पर बेचना शुरू किया तो लोगों ने इसे हाथों-हाथ खरीदा। कुछ समय बाद बिक्री केंद्र बंद हो गया, लेकिन ग्राहकों की मांग बनी रही।

सुरेश कहते हैं,

“प्राकृतिक खेती के उत्पादों की मार्केट में बहुत मांग है। जब अपने उत्पाद को धर्मशाला बिक्री केंद्र में ले गया तो हाथों-हाथ बिक गया। आज भी लोग मुझे सब्जियों के लिए संपर्क करते हैं।”

ग्राहक सीधे उन्हें फोन कर ताजी सब्जियां खेत से ही खरीद लेते हैं। यह सफलता सुरेश के लिए आत्मविश्वास का बड़ा स्रोत बन गई है।

प्राकृतिक खेती और किसान योजनाओं से जुड़ाव

सुरेश कुमार अब ‘कृषक खुशहाल किसान योजना’ के तहत अन्य किसानों को भी प्रशिक्षण दे रहे हैं। वे अपनी पंचायत के साथ-साथ आस-पास की पंचायतों में जाकर किसानों को प्राकृतिक खेती सिखा रहे हैं ताकि वे भी इस विधि को अपनाकर लाभ कमा सकें। वे बताते हैं कि उन्होंने योजना की मदद से संवर्धन भंडार भी खोला है, जहां किसानों को तैयार खाद, जीवामृत और बीज उपलब्ध कराए जाते हैं।

हिमाचल के सेवानिवृत्त फ़ौजी किसान सुरेश कुमार ने मिट्टी बचाने की राह पर अपनाई प्राकृतिक खेती

सुरेश कुमार का खेत बन गया मॉडल फ़ार्म 

सुरेश का खेत आज एक मॉडल फ़ार्म के रूप में जाना जाता है। यहां वे आने वाले किसानों को दिखाते हैं कि कैसे कम खर्च में ज़्यादा आमदनी ली जा सकती है। वे किसानों को बताते हैं कि रासायनिक खेती की तुलना में प्राकृतिक खेती न केवल लागत घटाती है बल्कि मिट्टी को जिंदा रखती है और फ़सल की गुणवत्ता बढ़ाती है।

प्राकृतिक खेती और रासायनिक खेती का विवरण

विवरण रासायनिक खेती प्राकृतिक खेती
कुल खर्च ₹5,000 ₹1,000
भूमि 15 कनाल (7.5 बीघा) 15 कनाल (7.5 बीघा)
फ़सलें मटर, गेहूं, धान, मक्की, गोभी, मूली, शलजम, धनिया, पालक आदि वही फ़सलें, बेहतर गुणवत्ता में

प्राकृतिक खेती के फ़ायदे जो सुरेश ने महसूस किए

  1. मिट्टी की उर्वरता में सुधार
  2. फ़सल की गुणवत्ता और स्वाद में बढ़ोतरी
  3. रासायनिक खाद और कीटनाशकों पर निर्भरता खत्म
  4. ग्राहक सीधे खेत से ताजा उत्पाद खरीदते हैं
  5. किसानों की आमदनी में उल्लेखनीय वृद्धि

किसानों के लिए प्रेरणा बनी सुरेश की कहानी

आज सुरेश कुमार का नाम धर्मशाला ही नहीं, बल्कि पूरे कांगड़ा जिले में प्राकृतिक खेती के मिसाल के रूप में लिया जाता है। वे अपनी मेहनत और अनुभव से अन्य किसानों को प्रेरित कर रहे हैं कि प्राकृतिक खेती से न केवल मिट्टी की रक्षा होती है, बल्कि किसान का जीवन भी सुरक्षित और समृद्ध बनता है। उनकी कहानी यह बताती है कि जब एक किसान बदलाव की पहल करता है, तो वह केवल अपने खेत की मिट्टी नहीं, बल्कि पूरी धरती को जीवित रखता है।

निष्कर्ष

सुरेश कुमार का यह सफर हमें यह सिखाता है कि प्राकृतिक खेती सिर्फ़ खेती की एक पद्धति नहीं, बल्कि एक आंदोलन है — जो मिट्टी, फ़सल, किसान और उपभोक्ता, सभी के हित में काम करता है।

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सम्पर्क सूत्र: किसान साथी यदि खेती-किसानी से जुड़ी जानकारी या अनुभव हमारे साथ साझा करना चाहें तो हमें फ़ोन नम्बर 9599273766 पर कॉल करके या kisanofindia.mail@gmail.com पर ईमेल लिखकर या फिर अपनी बात को रिकॉर्ड करके हमें भेज सकते हैं। किसान ऑफ़ इंडिया के ज़रिये हम आपकी बात लोगों तक पहुंचाएँगे, क्योंकि हम मानते हैं कि किसान उन्नत तो देश ख़ुशहाल।

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