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हिमाचल प्रदेश के फतेहपुर विकास खंड के किसान विजय कुमार पिछले एक दशक से खेती कर रहे थे, लेकिन धीरे-धीरे बढ़ते रासायनिक खादों और दवाइयों के ख़र्चे ने उनकी कमर तोड़ दी। बीमारियों और मिट्टी की खराब हालत ने उन्हें सोचने पर मजबूर कर दिया कि खेती को इस तरीके से जारी रखना अब मुमकिन नहीं।
इसी बीच वर्ष 2018 में उन्हें प्राकृतिक खेती के बारे में पता चला। उन्होंने इस विधि के जनक पद्मश्री सुभाष पालेकर से प्रशिक्षण प्राप्त किया। प्रशिक्षण के बाद विजय ने तय किया कि अब वे अपने खेतों को रासायनिक से मुक्त कर पूरी तरह प्राकृतिक खेती अपनाएंगे। उन्होंने अपने आधे बीघे खेत से इसकी शुरुआत की और कुछ ही समय में परिणाम इतने अच्छे मिले कि आज उनका खेत न सिर्फ़ अपने गांव बल्कि आसपास के किसानों के लिए भी प्रेरणा बन गया है।
शुरुआत से सफलता तक का सफ़र
शुरुआती प्रयोग में विजय कुमार ने देखा कि उनकी फ़सलें अधिक हरी-भरी और मज़बूत हो रही हैं। पहले जहां उन्हें रासायनिक खाद के लिए काफी ख़र्च करना पड़ता था, वहीं प्राकृतिक खेती में लागत कम और उत्पादन अधिक मिला। इससे उत्साहित होकर उन्होंने धीरे-धीरे अपने खेत की पूरी 10 बीघा ज़मीन को प्राकृतिक खेती के तहत लाना शुरू किया।
आज उनका खेत न सिर्फ़ कृषि विश्वविद्यालय के छात्रों के लिए प्रयोगशाला बना हुआ है, बल्कि यहां प्रशिक्षण लेने आने वाले किसान भी इस तकनीक को अपनाने लगे हैं।
कम लागत और बेहतर आमदनी का फ़ार्मूला
विजय कुमार बताते हैं कि प्राकृतिक खेती अपनाने के बाद उनकी फ़सल की गुणवत्ता और उत्पादन दोनों में सुधार हुआ है। पहले रासायनिक खेती में ख़र्च लगभग ₹9,600 आता था और लेकिन अब प्राकृतिक खेती में ख़र्च घटकर ₹7,900 रह गया और आमदनी भी बढ़ गई। यानी ख़र्च में कमी और मुनाफ़े में बढ़ोतरी – यही है प्राकृतिक खेती की सबसे बड़ी ताक़त।
विस्तृत विवरण
| विवरण | रासायनिक खेती | प्राकृतिक खेती |
| कुल भूमि | 20 कनाल (10 बीघा) | 10 कनाल (5 बीघा) |
| मुख्य फ़सलें | गेहूं, मटर, सरसों, मक्की, मूंग, सोयाबीन, गोभी, लौकी, ब्रोकली, आलू, कद्दू, खीरा | वही फ़सलें |
प्राकृतिक खेती के प्रशिक्षण से सैकड़ों किसान लाभान्वित
विजय कुमार ने अपने अनुभव को दूसरों तक पहुंचाने का जिम्मा भी उठाया है। वे अब तक 500 से अधिक किसानों को प्राकृतिक खेती का प्रशिक्षण दे चुके हैं। उन्होंने बताया कि नौणी स्थित वानिकी विश्वविद्यालय के छात्रों ने भी उनके खेत को एक रिसर्च फ़ार्म के रूप में अपनाया है।
उनका कहना है कि “जब मैंने देखा कि मेरी खेती में बिना रासायन के भी मिट्टी उपजाऊ बनी रहती है, तब समझ आया कि यही खेती आने वाले भविष्य की ज़रूरत है।”
घर की ज़रूरत से बाज़ार तक का सफ़र आसान हुआ
विजय कुमार अब अपने खेत की सब्ज़ियों और फ़सलों को बाज़ार नहीं ले जाते। लोग खुद उनके खेत पर आते हैं और ताजी सब्ज़ियां खरीदकर ले जाते हैं। इससे उन्हें बाज़ार पर निर्भर रहने की ज़रूरत नहीं पड़ती।
वे बताते हैं कि आत्मनिर्भर किसान बनने के लिए प्राकृतिक खेती सबसे बेहतर रास्ता है। “अब मुझे अपनी सब्ज़ियां बाज़ार में बेचने की ज़रूरत नहीं पड़ती, ग्राहक खुद खेत पर आकर ले जाते हैं,” वे मुस्कुराते हुए कहते हैं।
प्राकृतिक खेती के परिणाम और किसानों पर प्रभाव
विजय कुमार बताते हैं कि उन्होंने अपने खेत में गेहूं, सरसों और मटर जैसी फ़सलों में बेहतर उत्पादन पाया। उनके अनुसार जब उन्होंने जीवामृत और घनजीवामृत का प्रयोग किया, तो पीली रतुआ जैसे रोगों में भी कमी आई। ये देखकर आसपास के किसान भी प्रेरित हुए और अब कई किसान इस तकनीक को अपनाने लगे हैं।
विजय कुमार का विश्वास
इस तकनीक में फ़सल की उपज और गुणवत्ता दोनों बहुत बेहतर हैं। मुझे पूरा भरोसा है कि अगर किसान इस खेती विधि को अपनाएं तो उनकी आमदनी दोगुनी होगी और ये उनके सामाजिक व आर्थिक जीवन को बदलने में अहम भूमिका निभाएगी।
निष्कर्ष
विजय कुमार की ये कहानी साबित करती है कि जब किसान प्राकृतिक खेती को अपनाते हैं, तो वे सिर्फ़ खेती नहीं करते बल्कि धरती की सेहत और समाज के भविष्य की भी रक्षा करते हैं। कम लागत, शुद्ध उपज और स्थायी जीवन — यही है प्राकृतिक खेती की असली पहचान। विजय कुमार जैसे किसान आने वाले भारत के हरित भविष्य की सच्ची नींव रख रहे हैं।
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