Table of Contents
सामान्य खरीफ के मौसम में किसान खाद का प्लान लगभग तय तरीके से बनाता है। बुवाई के समय कुछ खाद डाल दी, बाद में ज़रूरत के हिसाब से यूरिया या दूसरी खाद दे दी। कई किसान वही मात्रा डालते हैं जो पिछले साल डाली थी। कुछ किसान फ़सल, मिट्टी और स्थानीय सलाह के हिसाब से थोड़ा-बहुत बदलाव भी करते हैं। जब बारिश ठीक-ठाक चल रही हो और मिट्टी में नमी बनी रहे, तब यह तरीका कई बार काम भी कर जाता है।
लेकिन El Niño वाला साल इस पूरे हिसाब को बिगाड़ सकता है।
समस्या सिर्फ़ इतनी नहीं होती कि बारिश कम हो सकती है। असली दिक्कत यह होती है कि बारिश बेतरतीब हो जाती है। कहीं एक अच्छी बारिश हुई और फिर दस दिन सूखा पड़ गया। कहीं कई दिन सूखा रहा और फिर अचानक तेज बारिश आ गई। ऐसे मौसम में खाद वैसे काम नहीं करती जैसे सामान्य साल में करती है।
यहीं से किसान के सामने एक ज़रूरी सवाल खड़ा होता है:
क्या El Niño वाले साल में खाद का प्लान बदल देना चाहिए?
इसका जवाब है—हाँ, कई बार बदलना चाहिए।
इसलिए नहीं कि फ़सल को पोषण की ज़रूरत नहीं है, बल्कि इसलिए कि पौधा खाद तभी उठाता है जब मिट्टी में सही नमी हो और जड़ें काम कर रही हों। सूखी या पानी भरी मिट्टी में गलत समय पर डाली गई खाद कई बार कम असर करती है, महँगी पड़ती है, और कभी-कभी नुकसान भी कर देती है।
2026 में यह सवाल और ज़्यादा ज़रूरी हो गया है। मौसम विभाग पहले ही सामान्य से कम बारिश और El Niño जैसी स्थिति की आशंका जता चुका है। केंद्र सरकार ने भी राज्यों से कहा है कि जिन जिलों में बारिश कम या अनियमित रहने की आशंका है, वहाँ contingency planning की जाए। ऐसे में खाद का फैसला सिर्फ़ आदत से नहीं, मौसम, मिट्टी की नमी, फ़सल की हालत और जोखिम देखकर करना होगा।
मिट्टी में नमी कम हुई तो खाद का असर क्यों घट जाता है?
खाद सीधे पौधे के अंदर नहीं जाती। पहले वह मिट्टी की नमी में घुलती है, फिर जड़ों तक पहुँचती है, और उसके बाद पौधा उसे उठाता है। इसका मतलब यह है कि पानी सिर्फ़ सिंचाई का साधन नहीं है, वह खाद को काम कराने वाला माध्यम भी है।
जब मिट्टी में नमी कम होती है, तो खाद का असर भी कम हो जाता है। पोषक तत्व मिट्टी में पड़े तो रहते हैं, लेकिन वे ठीक से जड़ों तक नहीं पहुँचते। दूसरी तरफ सूखे में जड़ें भी धीमी पड़ जाती हैं। ऐसे में किसान खाद डाल देता है, लेकिन पौधा वैसा response नहीं देता जैसा उम्मीद थी। किसान को लगता है कि शायद खाद कम पड़ी, जबकि असली दिक्कत यह होती है कि पौधा खाद उठा ही नहीं पा रहा।
यह बात ख़ासकर यूरिया और दूसरी नाइट्रोजन वाली खादों पर ज़्यादा लागू होती है। कई बार किसान dry spell के बाद फ़सल को “हरा” करने के लिए यूरिया डाल देता है। लेकिन अगर मिट्टी सूखी है, तो उसका असर कमज़ोर रह सकता है। ख़र्च बढ़ जाता है, फ़ायदा साफ़ नहीं दिखता।
सीधी बात यह है कि खाद को काम करने के लिए चलती हुई जड़ें चाहिए, और जड़ों को चलने के लिए नमी चाहिए। नमी नहीं, तो खाद भी आधी-अधूरी।
बुवाई के समय पूरी खाद डाल देनी चाहिए या नहीं?
कई फ़सलों में किसान बुवाई के समय ही बेसल डोज़ डाल देता है। इसमें DAP, कॉम्प्लेक्स खाद, पोटाश, सल्फर, जिंक या दूसरी खादें शामिल हो सकती हैं—फ़सल और इलाके के हिसाब से। सामान्य साल में यह सही भी है, क्योंकि शुरुआती बढ़वार के लिए यह मदद करती है।
लेकिन El Niño वाले साल में बुवाई खुद ही जोखिम वाली हो सकती है। मान लीजिए पहली बारिश पर किसान ने बुवाई कर दी, साथ में बेसल खाद भी डाल दी। फिर बारिश रुक गई, फ़सल ठीक से जमी ही नहीं, या दोबारा बुवाई करनी पड़ गई। ऐसे में खाद का पूरा फ़ायदा नहीं मिलता। बीज का नुकसान अलग, खाद का नुकसान अलग।
इसका मतलब यह नहीं कि किसान बेसल खाद डालना ही बंद कर दे। जैसे फॉस्फोरस जड़ों के लिए बहुत ज़रूरी है और उसे शुरुआत में ही देना होता है, क्योंकि वह मिट्टी में धीरे चलता है। लेकिन बात यह है कि अगर बुवाई ही पक्की नहीं है, तो बहुत भारी खाद डाल देना समझदारी नहीं है।
बेहतर तरीका यह है कि किसान यह देखे कि:
* बुवाई कितनी भरोसेमंद बारिश पर हो रही है
* मिट्टी में नमी कितनी है
* re-sowing का खतरा कितना है
अगर स्थिति बहुत अनिश्चित है, तो पिछले साल की आदत के हिसाब से खाद डालने के बजाय स्थानीय advisory देखकर फैसला लेना ज़्यादा ठीक होगा।
El Niño वाले साल में यूरिया का समय सबसे ज़्यादा क्यों मायने रखता है?
नाइट्रोजन वह पोषक तत्व है जिसका असर किसान जल्दी देख लेता है—पौधा हरा हुआ, बढ़वार तेज हुई, crop vigorous दिखी। और नाइट्रोजन का सबसे आम स्रोत है यूरिया।
लेकिन यही नाइट्रोजन सबसे जल्दी नुकसान भी खाती है।
अगर El Niño वाले साल में किसान ने यूरिया डाल दी और उसके बाद लंबा सूखा पड़ गया, तो पौधा उसे ठीक से इस्तेमाल नहीं कर पाएगा। अगर यूरिया डालने के तुरंत बाद तेज बारिश हो गई, तो नाइट्रोजन बह भी सकती है या नीचे चली जा सकती है। अगर खेत में पानी भर गया, तो जड़ों की हालत खराब होगी और nitrogen loss बढ़ सकता है।
इसीलिए ऐसे साल में एक बार में बहुत यूरिया डालना जोखिम भरा हो सकता है।
बेहतर यह है कि यूरिया छोटी-छोटी किस्तों में, फ़सल की stage और मिट्टी की नमी देखकर दी जाए।
सीधी बात—यूरिया तब डालो जब पौधा उसे खा सके।
सूखे के बाद फ़सल पीली दिखे तो क्या ज़्यादा यूरिया डाल देनी चाहिए?
यह बहुत आम स्थिति है। dry spell के बाद फ़सल पीली, धीमी या कमज़ोर दिखती है। किसान का पहला विचार आता है—यूरिया डाल दो, फ़सल संभल जाएगी।
कई बार यह सही भी हो सकता है, लेकिन सिर्फ़ तब जब मिट्टी में नमी हो।
अगर पौधा सूखे से परेशान है, जड़ें धीमी हैं, मिट्टी में पानी नहीं है, तो सिर्फ़ ज़्यादा यूरिया डाल देने से बात नहीं बनेगी। पौधा उसे उठा ही नहीं पाएगा। कुछ हालात में कमज़ोर जड़ों के पास ज़्यादा खाद और stress बढ़ा सकती है।
इसलिए dry spell के बाद पहला सवाल यह नहीं होना चाहिए कि कितनी यूरिया डालें?
पहला सवाल होना चाहिए: क्या मिट्टी में इतनी नमी है कि फ़सल इस यूरिया का इस्तेमाल कर सके?
अगर नमी नहीं है, तो खाद डालने से पहले बारिश या हल्की सिंचाई का इंतज़ार करना कई बार ज़्यादा समझदारी है।
तेज बारिश के बाद खाद कई बार खेत नहीं, पानी के साथ चली जाती है
El Niño की बात आते ही हम सूखे की सोचते हैं। लेकिन El Niño वाले साल का मतलब यह नहीं कि बारिश होगी ही नहीं। कई बार होता यह है कि बीच-बीच में लंबे सूखे के बाद अचानक तेज बारिश हो जाती है।
यहीं दूसरी समस्या शुरू होती है।
अगर किसान ने यूरिया या दूसरी खाद डाली और उसके तुरंत बाद तेज बारिश हो गई, तो खाद का कुछ हिस्सा बह सकता है या नीचे जा सकता है। ढलान वाले खेतों में runoff से नुकसान हो सकता है। हल्की मिट्टी में nitrogen नीचे निकल सकती है। निचले हिस्से में पानी भर जाए तो जड़ें कमज़ोर पड़ती हैं और nitrogen loss और बढ़ सकता है।
इसलिए ऐसी स्थिति में भारी बारिश से ठीक पहले खाद डालना कई बार पैसे बहाने जैसा हो सकता है।
अगर forecast बता रहा है कि अगले 24–48 घंटे में तेज बारिश आ सकती है, तो खाद डालने में थोड़ा रुकना ही बेहतर है।
DAP और फॉस्फोरस: शुरुआत में क्यों ज़रूरी हैं, और El Niño में कहाँ सावधानी चाहिए?
DAP किसान की सबसे जानी-पहचानी खादों में से है, क्योंकि इसमें नाइट्रोजन भी है और फॉस्फोरस भी। फॉस्फोरस ख़ासकर शुरुआत में बहुत ज़रूरी होता है, क्योंकि यह जड़ों की बढ़वार में मदद करता है। मक्का, सोयाबीन, दालें, कपास जैसी फ़सलों में शुरुआती root growth के लिए इसका बड़ा रोल है।
लेकिन फॉस्फोरस नाइट्रोजन जैसा नहीं है। यह मिट्टी में जल्दी इधर-उधर नहीं घूमता। इसलिए इसे शुरुआत में, जड़ के पास या बुवाई के समय देना बेहतर माना जाता है।
समस्या तब आती है जब बुवाई ही जोखिम वाली हो। अगर किसान ने पहली बारिश पर DAP डाल दी, फिर बारिश रुक गई और फ़सल ठीक से जमी नहीं, तो बाद में दोबारा बुवाई की नौबत आ सकती है। ऐसे में पहले डाली गई खाद का पूरा फ़ायदा दूसरी बुवाई को वैसे नहीं मिलेगा जैसा पहली फ़सल को मिलना था।
यानी पहली बारिश पर जल्दबाज़ी सिर्फ़ बीज का जोखिम नहीं बढ़ाती, खाद का जोखिम भी बढ़ाती है।
पोटाश को नज़रअंदाज़ करना stress वाले साल में भारी पड़ सकता है
कई किसान का पूरा ध्यान यूरिया और DAP पर रहता है। पोटाश कई बार पीछे छूट जाती है। लेकिन El Niño जैसे stress वाले साल में पोटाश की अहमियत और बढ़ जाती है।
पोटाश पौधे को पानी के उपयोग, cell strength, stress सहन करने की क्षमता, grain filling और overall मज़बूती में मदद करती है। सूखे, गर्मी और अनियमित नमी के हालात में इसका रोल और महत्वपूर्ण हो जाता है।
अगर फ़सल में पोटाश की कमी है, तो हो सकता है किसान यूरिया डालकर फ़सल को हरा तो कर दे, लेकिन stress आने पर वही फ़सल जल्दी टूट जाए। कमज़ोर तना, दाना भरने में कमी, disease का ज़्यादा असर—ये सब दिख सकता है।
इसका मतलब यह नहीं कि हर खेत में आँख बंद करके पोटाश डाल दें। मिट्टी की जाँच और स्थानीय सलाह ज़रूरी है। लेकिन El Niño वाले साल में किसान को सिर्फ़ यूरिया और DAP की भाषा में नहीं सोचना चाहिए। balanced nutrition और भी ज़रूरी हो जाती है।
सूक्ष्म पोषक तत्व कम मात्रा में लगते हैं, लेकिन काम बड़ा कर सकते हैं
अनिश्चित मानसून वाले साल में कई बार जिंक, बोरॉन, आयरन जैसे सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी ज़्यादा साफ़ दिखने लगती है। ये कम मात्रा में चाहिए होते हैं, लेकिन फ़सल की बढ़वार, फूल, दाना, stress tolerance—सबमें इनकी भूमिका होती है।
जिंक की कमी भारत की बहुत-सी मिट्टियों में आम है, ख़ासकर धान-गेहूँ वाले इलाकों में। बोरॉन कुछ फ़सलों में फूल और फल बनने पर असर डालता है। आयरन की कमी भी कुछ मिट्टियों में दिख सकती है।
लेकिन यहाँ एक गलती बहुत होती है—पौधा पीला दिखा, तो किसान मान लेता है कि जिंक या कोई माइक्रोन्यूट्रिएंट चाहिए। जबकि पीलेपन की वजह नाइट्रोजन की कमी, पानी भरना, जड़ों का stress, खराब aeration या कुछ और भी हो सकता है।
इसलिए micronutrient का फैसला अंदाज़ से नहीं, जितना हो सके diagnosis के साथ होना चाहिए—soil test, local recommendation, KVK की सलाह या clear symptoms देखकर।
खाद का असली रिश्ता जड़ों से है — और यही बात अक्सर छूट जाती है
खाद तभी काम करती है जब जड़ें काम कर रही हों। सुनने में यह सीधी बात है, लेकिन खेती में यही बात सबसे ज़्यादा भूल जाती है।
अगर मिट्टी सूखी है, तो जड़ें धीमी पड़ जाती हैं। अगर पानी भर गया, तो जड़ों को हवा नहीं मिलती। अगर मिट्टी बहुत सख्त है, तो जड़ें फैल नहीं पातीं। अगर तापमान ज़्यादा है, तो root activity भी प्रभावित हो सकती है। ऐसे किसी भी हालात में खाद का response कमज़ोर हो जाएगा।
यानी खाद का प्रबंधन जड़ों से अलग नहीं हो सकता।
अगर फ़सल की परेशानी जड़ों की है—जैसे पानी भरना, सख्त मिट्टी, खरपतवार की मार, oxygen की कमी—तो सिर्फ़ खाद डालकर समस्या नहीं सुलझेगी। किसान को drainage, सिंचाई, खरपतवार, मिट्टी की सतह और overall root zone की हालत भी देखनी होगी।
सीधी बात—पौधा पेट से नहीं, जड़ों से खाता है। जड़ें ही नहीं चल रहीं, तो खाद क्या करेगी?
क्या El Niño वाले साल में खाद कम कर देनी चाहिए?
यह सबसे मुश्किल सवालों में से एक है। इसका जवाब सीधा “हाँ” या “नहीं” में नहीं दिया जा सकता।
अगर बारिश कमज़ोर है, crop stand खराब है, और साफ़ दिख रहा है कि इस साल yield potential कम रहने वाला है, तो बहुत भारी खाद डालना आर्थिक रूप से सही नहीं होगा। फ़सल में उतनी ताकत ही नहीं होगी कि वह खाद को उत्पादन में बदल सके।
लेकिन दूसरी तरफ, अगर किसान बहुत ज़्यादा कटौती कर दे, तो फ़सल और कमज़ोर हो सकती है। पोषण की कमी वाली फ़सल stress और जल्दी खाती है।
इसलिए सही रास्ता यह नहीं है कि खाद आधी कर दो या दोगुनी कर दो। सही रास्ता है समझदारी से adjustment।
* एक बार में बहुत भारी डोज़ न दें
* split dose अपनाएँ
* नमी देखकर timing तय करें
* सिर्फ़ नाइट्रोजन नहीं, balanced nutrition सोचें
* contingency advisory पर ध्यान दें
यानी खाद गायब नहीं करनी, खाद को मौसम के हिसाब से लचीला बनाना है।
हर फ़सल का खाद वाला हिसाब अलग होगा
El Niño वाला साल आया, इसका मतलब यह नहीं कि हर फ़सल के लिए एक ही खाद वाला नियम बन जाएगा।
धान
धान में nitrogen management बहुत सोच-समझकर करना होगा, क्योंकि सूखा भी नुकसान करेगा और पानी भरना भी। delayed monsoon या rainfed धान में contingency advisory के हिसाब से basal dose, nursery, रोपाई और top dressing सब बदल सकते हैं।
सोयाबीन
सोयाबीन में अगर बुवाई की नमी ही पक्की नहीं है, तो किसान को खाद निवेश सोच-समझकर करना होगा। सोयाबीन खुद भी नाइट्रोजन fixation करती है, इसलिए इसमें phosphorus, sulphur, potassium और micronutrients कई बार ज़्यादा अहम हो जाते हैं।
मक्का
मक्का खाद पर अच्छा response देती है, लेकिन तभी जब नमी साथ दे। इसमें nitrogen split करके देना ज़्यादा समझदारी है, ख़ासकर तेज बढ़वार और flowering से पहले।
कपास
कपास लंबी फ़सल है। अगर शुरुआत में ही बहुत नाइट्रोजन दे दी और बाद में नमी टूट गई, तो पौधा vegetative तो हो सकता है लेकिन boll retention पर असर पड़ सकता है।
दालें
दालों को आम तौर पर कम nitrogen चाहिए, लेकिन phosphorus, sulphur और कुछ micronutrients का महत्व रहता है—मिट्टी और फ़सल के हिसाब से।
सबसे ज़रूरी बात यही है—El Niño एक है, लेकिन हर फ़सल की खाद वाली ज़रूरत अलग है।
ऐसे साल में मिट्टी की जाँच और ज़्यादा काम की क्यों हो जाती है?
अच्छे बारिश वाले साल में कई खाद वाली गलतियाँ छिप जाती हैं। फ़सल के पास पानी होता है, मौसम साथ देता है, तो imbalance के बावजूद crop कुछ हद तक संभल जाती है। लेकिन stress वाले साल में वही गलती महँगी पड़ जाती है।
मिट्टी की जाँच किसान को यह समझने में मदद करती है कि खेत में पहले से क्या है और क्या सच में डालने की ज़रूरत है। इससे फालतू ख़र्च कम हो सकता है और imbalance भी बच सकता है।
Soil test से किसान को पता चल सकता है:
* organic carbon कितना है
* phosphorus कितना है
* potash की स्थिति क्या है
* pH कैसा है
* micronutrient की कमी तो नहीं
जब इनपुट महँगे हों और बारिश अनिश्चित हो, तब यह जानकारी और भी कीमती हो जाती है। मकसद ज़्यादा खाद डालना नहीं है। मकसद है सही खाद डालना।
Top dressing तारीख देखकर नहीं, नमी देखकर करें
कई किसान top dressing एक तय तारीख या तय उम्र पर कर देते हैं। लेकिन El Niño वाले साल में यह तरीका हमेशा सही नहीं होगा।
किसान को top dressing से पहले खुद से पूछना चाहिए:
* क्या जड़ वाले हिस्से में नमी है?
* क्या अगले 1–2 दिन में तेज बारिश आने वाली है?
* क्या फ़सल अभी active growth में है?
* क्या खेत में पानी भरा है?
* क्या यह nutrient देने की सही stage है?
अगर खेत सूखा है और बारिश की उम्मीद नहीं है, तो top dressing का response कमज़ोर रहेगा। अगर अगले दिन तेज बारिश है, तो nitrogen loss का खतरा है। अगर खेत पानी से भरा है, तो जड़ें ही ठीक से काम नहीं करेंगी।
यहीं पर IMD, Meghdoot, KVK advisory और स्थानीय कृषि सलाह किसान के बहुत काम आ सकती है।
खाद का प्लान मतलब ख़र्च का प्लान भी
किसान के लिए खाद सिर्फ़ पोषण नहीं है, ख़र्च भी है। और खरीफ के कमज़ोर साल में हर बोरी खाद को इस हिसाब से देखना पड़ेगा कि उससे वापसी कितनी मिलेगी।
अगर crop stand खराब है, नमी कमज़ोर है, और yield potential पहले ही गिर चुका है, तो पूरी ताकत से खाद डालना शायद आर्थिक रूप से सही न हो। लेकिन अगर किसान बिल्कुल खाद ही न दे, तो बची हुई फ़सल भी कमज़ोर पड़ सकती है।
इसलिए किसान को यह सोचना होगा: इस समय मेरी फ़सल की असली क्षमता कितनी है, और उस हिसाब से खाद में कितना ख़र्च सही है? यहीं से खाद का फैसला खेती का नहीं, आर्थिक फैसला भी बन जाता है।
किसान के लिए आसान फैसला-फ्रेम
El Niño वाले साल में खाद डालने से पहले किसान छह सवाल खुद से पूछ सकता है:
- क्या जड़ों वाली मिट्टी में नमी है?
- क्या पौध संख्या इतनी ठीक है कि खाद का ख़र्च जायज़ लगे?
- क्या फ़सल बढ़वार में है या stress में खड़ी है?
- क्या अगले 1–2 दिन में तेज बारिश आने वाली है?
- क्या यह nutrient देने की सही stage है?
- क्या मैं सिर्फ़ यूरिया डाल रहा हूँ या balanced nutrition सोच रहा हूँ?
अगर इन सवालों के जवाब कमज़ोर हैं, तो किसान को रुककर, dose बाँटकर या local advisory देखकर फैसला करना चाहिए।
आख़िरी बात: El Niño वाले साल में खाद की मात्रा से ज़्यादा उसकी timing मायने रखती है
फ़सल को खाद तो चाहिए ही। इसमें कोई शक नहीं। लेकिन El Niño वाले साल में खाद वैसे काम नहीं करती जैसे सामान्य मानसून में करती है।
टूटी-फूटी बारिश, लंबे dry spell, अचानक तेज बारिश और कमज़ोर मिट्टी की नमी—ये सब खाद के असर को बदल देते हैं। इसलिए खाद का प्लान आदत से तय नहीं होना चाहिए। उसे फ़सल, मिट्टी और मौसम के साथ चलना चाहिए।
मकसद सिर्फ़ कम या ज़्यादा खाद डालना नहीं है। असली बात है—सही समय पर, सही मात्रा में, तब खाद देना जब फ़सल उसे सच में उठा सके। क्योंकि मुश्किल मानसून वाले साल में सिर्फ़ खाद की बोरी नहीं, खाद की efficiency भी बहुत मायने रखती है। और कई बार सबसे समझदार खाद वाला फैसला यह नहीं होता कि एक और बोरी डाल दी जाए। सबसे समझदार फैसला यह होता है कि पहले सही नमी आने का इंतज़ार किया जाए, फिर खाद दी जाए।
ये भी पढ़ें : रात में खेती, क्या अंधेरे में फ़सल उगाकर भारत की ज़मीन की कमी दूर हो सकती है?
सम्पर्क सूत्र: किसान साथी यदि खेती-किसानी से जुड़ी जानकारी या अनुभव हमारे साथ साझा करना चाहें तो हमें फ़ोन नम्बर 9599273766 पर कॉल करके या [email protected] पर ईमेल लिखकर या फिर अपनी बात को रिकॉर्ड करके हमें भेज सकते हैं। किसान ऑफ़ इंडिया के ज़रिये हम आपकी बात लोगों तक पहुंचाएँगे, क्योंकि हम मानते हैं कि किसान उन्नत तो देश ख़ुशहाल।

