मछली का कचरा अब बनेगा हड्डियों का सहारा! ICAR-CIFT की Nano Fiber Technology ने बदला खेल

केरल के कोच्चि स्थित ICAR-CIFT (Central Institute of Fisheries Technology) के वैज्ञानिकों ने इसी कचरे को अनमोल खजाना बना दिखाया है। इसी कचरे को नैनोफाइबर टेक्नोलॉजी (Nano Fiber Technology) में बदल दिया है। 

भारत में हर साल 19 मिलियन टन से अधिक मछलियां (Fish) पकड़ी या पैदा की जाती हैं। सोचिए, इतनी मछलियां खाने के बाद कितना कचरा बचेगा? करीब 4-6 मिलियन टन। यानी ढेर सारे छिलके, हड्डियां, सिर, जो अब तक बदबू फैलाने और नदियों-ज़मीन को प्रदूषित करने का कारण बनते थे।

लेकिन केरल के कोच्चि स्थित ICAR-CIFT (Central Institute of Fisheries Technology) के वैज्ञानिकों ने इसी कचरे को अनमोल खजाना बना दिखाया है। इसी कचरे को नैनोफाइबर टेक्नोलॉजी (Nano Fiber Technology) में बदल दिया है। 

 क्या है ये Nano Fiber Technology

वैज्ञानिकों की टीम-डॉ. बिंसी पीके, डॉ. सोबी के चाको, डॉ. रनीश बी, डॉ. नेबू जॉर्ज थॉमस (Dr. Binsi PK, Dr. Sobi K Chacko, Dr. Ranish B, Dr. Nebu George Thomas) ने मछली के छिलकों से एक ऐसा नैनोफाइबर बेस्ड ग्राफ्ट बनाया है, जो हड्डियों और दांतों के घावों को तेजी से भरता है।

कैसे? मछली के छिलकों में पाया जाने वाला हाइड्रॉक्सीएपेटाइट नामक मिनरल (Mineral called hydroxyapatite) इंसान की हड्डियों और दांतों से काफी मिलता-जुलता है। इसे इलेक्ट्रो-स्पिनिंग नामक प्रोसेस से बेहद पतले नैनोफाइबर में बदल दिया जाता है। ये फाइबर शरीर में जाकर नई हड्डी के ऊतक बनाने में मदद करते हैं।

 आम ग्राफ्ट से कैसे बेहतर है ये?

आमतौर पर लगने वाले graft सिर्फ जगह भरते हैं। लेकिन ये नैनोफाइबर:

  • शरीर की कोशिकाओं को जोड़ने और बढ़ने में मदद करते हैं
  • घाव को तेजी से भरते हैं
  • दवाइयों को धीरे-धीरे छोड़ सकते हैं, जिससे संक्रमण का खतरा कम होता है

यानी ये सिर्फ ग्राफ्ट नहीं, बल्कि एक स्मार्ट मेडिकल डिवाइस है।

पर्यावरण और अर्थव्यवस्था-दोनों को फायदा

  • भारत में हर साल लाखों टन मछली का कचरा प्रदूषण फैलाता था
  • अगर इसी कचरे का थोड़ा सा हिस्सा भी मेडिकल उत्पादों में बदला जाए, तो बड़ी आर्थिक कमाई हो सकती है
  • ये “वेस्ट टू वेल्थ” का शानदार उदाहरण है

ये तकनीक सर्कुलर बायो-इकोनॉमी की ओर एक बड़ा कदम है। जहां कचरा ही दूसरे उद्योग का कच्चा माल बन जाता है।

 चुनौतियां क्या हैं?

भारत में मछली उद्योग की सप्लाई चेन अभी बिखरी हुई है। कचरे को अलग-अलग तरीके से इकट्ठा करने और प्रोसेस करने की मजबूत व्यवस्था नहीं है। जापान और नॉर्वे जैसे देश इस मामले में हमसे काफी आगे हैं।

लेकिन अच्छी बात यह है कि ये तकनीक पेटेंट हो चुकी है। अब जरूरत है:

  • सरकार और उद्योगों के सहयोग की
  • कचरा संग्रहण की बेहतर व्यवस्था की
  • स्टार्टअप्स और निवेशकों के आगे आने की

 आपके लिए क्या मायने रखती है ये खबर?

अगर ये तकनीक सफल होती है, तो:

  • मछुआरों और तटीय इलाकों में नए रोजगार बनेंगे
  • मेडिकल क्षेत्र को सस्ता और बेहतर ग्राफ्ट मिलेगा
  • प्रदूषण कम होगा
  • भारत दुनिया को नई मेडिकल तकनीक दे सकता है

मछली का छिलका, जो आज तक बेकार समझा जाता था, कल किसी की टूटी हड्डी को जोड़ने का काम करेगा। यही असली विज्ञान है — जो कूड़े में भी कीमत देखना सिखाता है।

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