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भारत के ताजे फलों के निर्यात क्षेत्र में एक बड़ी उपलब्धि हासिल हुई है। ICAR-CISH और APEDA के सहयोग से विकसित नई समुद्री परिवहन तकनीक के जरिए भारतीय आम सफलतापूर्वक सिंगापुर पहुंच गए हैं। यह उपलब्धि कम लागत में बड़े स्तर पर आम के निर्यात का नया रास्ता खोल सकती है।
सिंगापुर में भारतीय आमों की गुणवत्ता, स्वाद और खुशबू को काफ़ी पसंद किया जाता है। ख़ासतौर पर बंगनपल्ली और केसर जैसी किस्मों की वहां अच्छी मांग है। इसी मांग को देखते हुए ICAR-CISH ने APEDA के साथ मिलकर आमों के समुद्री निर्यात के लिए वैज्ञानिक Sea Shipment Protocol तैयार किया है।
4.3 टन बंगनपल्ली आम पहुंचे सिंगापुर
इस पहल के तहत आंध्र प्रदेश से 4.3 टन बंगनपल्ली आम रीफर कंटेनर के माध्यम से समुद्री रास्ते सिंगापुर भेजे गए। ICAR-CISH द्वारा विकसित इस तकनीक ने यह साबित कर दिया कि लंबी दूरी तक समुद्री परिवहन के बाद भी आमों की गुणवत्ता को सुरक्षित रखा जा सकता है।
समुद्री मार्ग से आम भेजने पर परिवहन लागत में भी बड़ी कमी आती है। जहां हवाई मार्ग से आम भेजने की लागत लगभग 150 से 250 रुपये प्रति किलोग्राम होती है, वहीं समुद्री मार्ग से यह खर्च घटकर केवल 13 से 20 रुपये प्रति किलोग्राम रह जाता है। इससे ICAR-CISH की यह तकनीक किसानों और निर्यातकों दोनों के लिए फ़ायदेमंद साबित हो सकती है।
ICAR-CISH ने तैयार किया वैज्ञानिक प्रोटोकॉल
ICAR-CISH द्वारा विकसित इस प्रोटोकॉल में उत्पादन से लेकर निर्यात तक हर चरण का वैज्ञानिक तरीके से ध्यान रखा गया है। इसमें अवशेष मुक्त उत्पादन, Good Agricultural Practices (GAP), वैज्ञानिक तरीके से तुड़ाई, ग्रेडिंग, पैकिंग और फ़सल कटाई के बाद की प्रक्रियाओं को शामिल किया गया है।
इसके अलावा निर्यात से पहले आमों पर Hot Water Treatment (HWT) और ICAR-CISH की विकसित CISH-Met Wash तकनीक का उपयोग किया गया। यह तकनीक फलों की शेल्फ लाइफ बढ़ाने, बीमारियों की संभावना कम करने और लंबी दूरी तक गुणवत्ता बनाए रखने में मदद करती है।
30 दिन तक सुरक्षित रह सकते हैं आम
ICAR-CISH के वैज्ञानिकों ने फल बनने से लेकर तुड़ाई तक पूरे बाग की लगातार निगरानी की। इस दौरान संस्थान द्वारा विकसित FUSICONT बायोकंट्रोल तकनीक का भी उपयोग किया गया। निर्यात से पहले आमों की गुणवत्ता और Maximum Residue Limits (MRLs) की जांच APEDA से मान्यता प्राप्त पैकहाउस में की गई।
ICAR-CISH की इस तकनीक की सबसे बड़ी सफलता यह रही कि समुद्री परिवहन के दौरान आमों की शेल्फ लाइफ 30 दिनों तक बढ़ाई जा सकी। सिंगापुर तक यह खेप 16 दिनों में पहुंची और वहां आमों की गुणवत्ता पूरी तरह बेहतर पाई गई।
जांच में फलों का TSS स्तर 20.1°Brix दर्ज किया गया। साथ ही किसी भी प्रकार की बीमारी नहीं मिली और गुणवत्ता हवाई मार्ग से भेजे गए आमों के बराबर रही।
कई देशों में बढ़ेंगे निर्यात के अवसर
ICAR-CISH की इस सफलता से अब भारतीय आमों के निर्यात को नया विस्तार मिलने की उम्मीद है। सिंगापुर के अलावा मलेशिया, हांगकांग जैसे बाजारों में भारतीय आमों की मांग बढ़ सकती है। वहीं संयुक्त अरब अमीरात जैसे बड़े बाजारों में भी समुद्री मार्ग से निर्यात की संभावनाएं मज़बूत होंगी।
इस तकनीक से कम लागत पर बड़े स्तर पर निर्यात संभव होगा, जिससे भारतीय आम वैश्विक बाजार में और अधिक प्रतिस्पर्धी बन सकेंगे।
किसानों और निर्यातकों को मिलेगा लाभ
ICAR-CISH द्वारा विकसित समुद्री निर्यात तकनीक केवल लागत कम करने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह किसानों की आय बढ़ाने, निर्यातकों की प्रतिस्पर्धा मज़बूत करने और बागवानी क्षेत्र के टिकाऊ विकास में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
यह सफल समुद्री खेप इस बात का संकेत है कि वैज्ञानिक तकनीकों के उपयोग से भारतीय आमों का निर्यात अधिक किफायती, सुरक्षित और व्यापक बनाया जा सकता है। आने वाले समय में ICAR-CISH की यह पहल किसानों, निर्यातकों और अंतरराष्ट्रीय उपभोक्ताओं तीनों के लिए लाभकारी साबित हो सकती है।
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