Green Urea: आंध्र प्रदेश में बनेगा देश का पहला पायलट प्लांट, भारत की कृषि क्रांति की नई पहल

आंध्र प्रदेश के पुडिमदाका (Pudimadaka of Andhra Pradesh) में 150 टन प्रतिदिन क्षमता वाला एक पायलट ग्रीन यूरिया प्लांट (Pilot Green Urea Plant) बनाया जाएगा।

दोस्तों, क्या आप जानते हैं कि हर साल भारत को लगभग 100 लाख टन यूरिया आयात करना पड़ता है? ये एक बहुत बड़ी संख्या है,  लेकिन अब सरकार ने इस परेशानी का समाधान ढूंढ लिया है वो है  ग्रीन यूरिया।

ग्रीन यूरिया (Green Urea) एक ऐसा Fertilizer है जो पर्यावरण को कम नुकसान पहुंचाता है और आयात पर निर्भरता कम करता है। ये सामान्य यूरिया से इस मायने में अलग है कि इसे बनाने में क्लीन एनर्जी और कार्बन कैप्चर टेक्नोलॉजी (Clean Energy and Carbon Capture Technology) का इस्तेमाल होता है।

आंध्र प्रदेश में बनेगा देश का पहला पायलट प्लांट

सरकार ने इस दिशा में एक बड़ा कदम उठाया है! आंध्र प्रदेश के पुडिमदाका (Pudimadaka of Andhra Pradesh) में 150 टन प्रतिदिन क्षमता वाला एक पायलट ग्रीन यूरिया प्लांट (Pilot Green Urea Plant) बनाया जाएगा। ये प्लांट NTPC की रिसर्च इकाई NETRA द्वारा विकसित किया जाएगा।

इस प्लांट की ख़ासियत ये है कि ये दो अत्याधुनिक तकनीकों को जोड़कर काम करेगा-

  • CCUS (Carbon capture technology) – प्रदूषण को रोकना
  • हाइड्रोजन उत्पादन तकनीक – पानी से हाइड्रोजन बनाना

 क्यों है ये योजना ख़ास?

1. किसानों को होगा फायदा

ICAR (Indian Council of Agricultural Research) पिछले कई महीनों से धान, तिलहन और गन्ना जैसी फसलों पर ग्रीन अमोनिया का परीक्षण कर रही है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, ग्रीन अमोनिया पारंपरिक उर्वरकों की तरह ही प्रभावी है।

2. पर्यावरण को होगा फायदा

ग्रीन यूरिया (Green Urea) बनाने में जो CO₂ इस्तेमाल होगी, वो थर्मल पावर प्लांट्स, सीमेंट और स्टील उद्योगों (Thermal power plants, and cement and steel industries) से कैप्चर की जाएगी। इससे प्रदूषण कम होगा और 2070 तक नेट जीरो के टारगेट को पाने में मदद मिलेगी।

3. आयात पर निर्भरता घटेगी

भारत अभी बड़ी मात्रा में यूरिया आयात करता है। ग्रीन यूरिया का उत्पादन बढ़ने से हम आत्मनिर्भर बनेंगे और विदेशी मुद्रा की बचत होगी।

सरकार की बड़ी तैयारी

हाल ही में उर्वरक विभाग ने एक उच्च स्तरीय बैठक की जिसमें NTPC, SECI, बड़ी उर्वरक कंपनियां और तकनीकी विशेषज्ञ शामिल हुए। सभी ने इस परियोजना में बहुत रुचि दिखाई है।

सरकार इस परियोजना के लिए अलग-अलग मंत्रालयों के ज़रीये से आर्थिक मदद देगी-

  • नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय (Ministry of New and Renewable Energy)को 19,744 करोड़ रुपये दिए जाएंगे
  • उर्वरक विभाग (Department of Fertilizers) एक ऐसा सिस्टम बनाएगा जिससे ग्रीन अमोनिया को आसानी से खाद व्यवस्था से जोड़ा जा सके

 क्या होगी कीमत?

यह सबसे बड़ा सवाल है! अभी ग्रीन अमोनिया की उत्पादन लागत पारंपरिक अमोनिया से ज्यादा है, लेकिन सरकार इस अंतर को कम करने के लिए सब्सिडी और नई नीतियों पर काम कर रही है।

SECI कंपनी ग्रीन अमोनिया खरीदकर उर्वरक कंपनियों को समान कीमत पर उपलब्ध कराएगी, ताकि किसानों पर अतिरिक्त बोझ न पड़े।

 आगे की राह

ये परियोजना भारत की कृषि और ऊर्जा नीति (Agriculture and Energy Policy) में एक बड़ा बदलाव ला सकती है। आंध्र प्रदेश का पायलट प्लांट (Andhra Pradesh’s pilot plant) इस दिशा में पहला महत्वपूर्ण कदम होगा।

अगर ये मॉडल सफल रहता है, तो आने वाले वक्त में India’s Fertilizer Production में आत्मनिर्भर बन सकता है। ये न केवल किसानों के लिए वरदान होगा, बल्कि पर्यावरण संरक्षण और स्वच्छ ऊर्जा के उपयोग को भी बढ़ावा देगा।

ग्रीन यूरिया परियोजना (Green Urea Project) भारत की बदलती सोच का प्रतीक है, जहां हम विकास और पर्यावरण दोनों को साथ लेकर चलना चाहते हैं। ये पहल ‘आत्मनिर्भर भारत’ और ‘हरित भारत’ दोनों के सपने को साकार करने की दिशा में एक बड़ा कदम है।

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