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वित्त वर्ष 2025-26 में भारत का खीरा निर्यात नए रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है। निर्यात मात्रा में 8 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई और ये 2.89 लाख टन से बढ़कर 3.14 लाख टन तक पहुंच गया। वहीं कुल निर्यात मूल्य 307.61 मिलियन डॉलर रहा, जो पिछले साल के मुकाबले थोड़ा अधिक है।
ख़ास बात ये है कि ये वृद्धि ऐसे समय में हुई है जब अमेरिका और यूरोप के कुछ प्रमुख बाज़ारों में मांग कमज़ोर रही। इसके बावजूद भारत का खीरा निर्यात लगातार आगे बढ़ता दिखा।
मूल्य और मात्रा दोनों में बढ़ोतरी
बिजनेस लाइन की रिपोर्ट के अनुसार, वित्त वर्ष 2025-26 में भारत का खीरा निर्यात मूल्य और मात्रा दोनों मामलों में बेहतर रहा। पिछले साल निर्यात का कुल मूल्य 306.72 मिलियन डॉलर था, जो इस बार बढ़कर 307.61 मिलियन डॉलर पहुंच गया। वहीं निर्यात मात्रा 2.89 लाख टन से बढ़कर 3.14 लाख टन दर्ज की गई।
विशेषज्ञों का मानना है कि अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में डॉलर और यूरो जैसी मुद्राओं की मज़बूती का भी इसमें योगदान रहा है।
अमेरिका में मांग घटी, फिर भी बना रिकॉर्ड
अमेरिका भारत के खीरा निर्यात का सबसे बड़ा बाज़ार माना जाता है। लेकिन इस बार वहां निर्यात में गिरावट देखने को मिली। DGCIS के आंकड़ों के अनुसार, अमेरिका को भारत का खीरा निर्यात मूल्य के लिहाज से 27 प्रतिशत घट गया। ये 73.51 मिलियन डॉलर से घटकर 53.61 मिलियन डॉलर रह गया।
मात्रा के हिसाब से भी निर्यात 68,376 टन से घटकर 52,768 टन पर आ गया। बताया गया कि टैरिफ विवाद के कारण शुरुआती दौर में निर्यात प्रभावित हुआ, हालांकि बाद में स्थिति में कुछ सुधार देखा गया।
यूरोप के कुछ बाज़ारों में भी रही सुस्ती
अमेरिका के अलावा यूरोप के कुछ बाज़ारों में भी मांग कमज़ोर रही। स्पेन और फ्रांस जैसे देशों में घरेलू स्टॉक अधिक होने के कारण भारत का खीरा निर्यात प्रभावित हुआ। इन देशों में खरीद की रफ्तार धीमी रही, जिससे निर्यातकों को चुनौतियों का सामना करना पड़ा।
हालांकि दूसरी ओर कुछ देशों ने भारत से खरीद बढ़ाकर इस कमी को काफी हद तक संतुलित कर दिया।
जर्मनी और रूस बने मज़बूत बाज़ार
जहां अमेरिका और कुछ यूरोपीय बाज़ारों में गिरावट रही, वहीं जर्मनी, रूस, कनाडा और नीदरलैंड जैसे देशों ने भारत से खीरे की खरीद बढ़ाई। जर्मनी अमेरिका के बाद दूसरा सबसे बड़ा खरीदार बनकर उभरा। यहां भारत का खीरा निर्यात 35,070 टन रहा और इसका मूल्य 40.09 मिलियन डॉलर दर्ज किया गया।
वहीं रूस तीसरे स्थान पर रहा, जहां निर्यात 43,627 टन तक पहुंच गया और कुल मूल्य 31.76 मिलियन डॉलर रहा।
दक्षिण भारत बना उत्पादन का केंद्र
भारत में gherkin यानी प्रोसेस्ड खीरे का उत्पादन और प्रोसेसिंग मुख्य रूप से कर्नाटक, तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश में होती है। भारत का खीरा निर्यात बड़े स्तर पर कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग मॉडल के जरिए संचालित होता है। किसान कंपनियों के साथ समझौते के तहत उत्पादन करते हैं और बाद में इसे प्रोसेस करके विदेश भेजा जाता है।
ये निर्यात bulk और bottled दोनों रूपों में किया जाता है।
घरेलू मांग कम, निर्यात पर ज़्यादा फ़ोकस
भारत में gherkin की घरेलू मांग सीमित मानी जाती है। यही वजह है कि उत्पादन का बड़ा हिस्सा निर्यात के लिए भेजा जाता है। विशेषज्ञों के अनुसार, भारत का खीरा निर्यात किसानों के लिए आय बढ़ाने का एक अच्छा विकल्प बन रहा है। ख़ासकर दक्षिण भारत के कई किसान इस मॉडल से जुड़े हुए हैं।
कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग और निर्यात आधारित उत्पादन के कारण किसानों को बाज़ार की स्थिरता भी मिलती है।
आगे की संभावनाएं
अमेरिका और यूरोप के कुछ हिस्सों में चुनौतियों के बावजूद भारत का खीरा निर्यात लगातार बढ़ रहा है। जर्मनी, रूस और अन्य देशों की बढ़ती मांग आने वाले समय में निर्यात को और मज़बूत कर सकती है।
साथ ही प्रोसेसिंग और वैल्यू एडिशन पर ध्यान देकर भारत वैश्विक बाज़ार में अपनी स्थिति और मज़बूत कर सकता है।
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