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क्या आप जानते हैं कि महाराष्ट्र (Maharashtra) में खेतों से लेकर पशुशाला तक, अन्न का दाना पानी तक पहुंचाने वाली 81 फीसदी से ज़्यादा महिलाएं हैं? यानी हर पांच किसानों में से चार महिलाएं। लेकिन सच ये है कि इनमें से ज़्यादातर महिलाएं कभी ‘किसान’ कहलाने का हक नहीं रखतीं। क्यों? क्योंकि उनके नाम पर ज़मीन नहीं है।
मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस अब इस अन्याय को ख़त्म करने जा रहे हैं। 22 जून 2026 से शुरू हो रहे विधानसभा के मॉनसून सत्र में सरकार ‘महाराष्ट्र महिला किसान सशक्तिकरण विधेयक, 2026’ (‘Maharashtra Women Farmers’ Empowerment Bill, 2026′) पेश करेगी। ये कानून देश में अपनी तरह का पहला और बेहद क्रांतिकारी कदम है।
क्यों ज़रूरी था यह कानून?
अब तक सरकारी योजनाओं (जैसे फसल बीमा, सब्सिडी, कर्ज) का लाभ पाने के लिए ज़मीन का मालिक होना Mandatory था। यही वो दीवार है, जिसके कारण लाखों महिलाएं:
- पति या परिवार की ज़मीन पर खेती करने वाली महिला को ‘खेत मजदूर’ कहा गया, किसान नहीं।
- पशुपालन, मुर्गी पालन, मछली पालन और वन उपज (जैसे चिंचा, महुआ) बेचने वाली महिलाओं को कभी बराबरी का दर्जा नहीं मिला।
- सरकारी नौकरियों में किसान कोटे का फायदा नहीं मिल पाया।
महिला किसानों को क्या-क्या मिलेगा?
ये विधेयक सिर्फ एक कागज़ नहीं है, बल्कि एक डिजिटल सेतु है। मुख्यमंत्री ने साफ निर्देश दिए हैं कि एक मजबूत डिजिटल सिस्टम बनेगा, जिससे महिला किसान घर बैठे आवेदन कर सकेंगी। नए कानून से फायदे होंगे:
- अलग कानूनी पहचान: अब बिना जमीन के भी महिला खुद को “किसान” लिखवा सकेगी।
- आसान कृषि ऋण: बैंक उन्हें बिना जमानत के लोन देंगे।
- सीधे फायदे: बीज, खाद, फसल बीमा, परिवहन और भंडारण (गोदाम) की सुविधा सीधे उनके खाते में।
- सामाजिक सुरक्षा: कृषि से जुड़ी दुर्घटना या बीमारी पर पेंशन और मुआवजा।
ज़रूरी फैक्ट
ये केवल “महिला सशक्तिकरण” का नारा नहीं है। रिसर्च बताती है कि जब महिला किसान को अधिकार मिलते हैं, तो वह अपनी कमाई का 90 फीसदी हिस्सा परिवार की पोषण, बच्चों की पढ़ाई और स्वास्थ्य पर खर्च करती है, जबकि पुरुष केवल 40 फीसदी । यानी यह कानून पूरे गांव की तरक्की का दरवाजा खोलेगा। अब तक महाराष्ट्र में करीब 1.2 करोड़ महिलाएं खेती से जुड़ी हैं, जिनमें से 85 प्रतिशत के पास अपनी ज़मीन नहीं है। यानी यह कानून 1 करोड़ से अधिक महिलाओं को सीधा फायदा पहुंचाएगा।
सरकार की तैयारी
इस विधेयक की तैयारियों को अंतिम रूप देने के लिए मुख्यमंत्री आवास पर बैठक हुई। इसमें उपमुख्यमंत्री सुनेत्रा अजित पवार (खुद एक महिला नेता), कृषि मंत्री दत्तात्रेय भरणे और राज्य मंत्री आशीष जायसवाल मौजूद थे। सभी ने इसे एक बेहद ज़रूरी और ऐतिहासिक बिल बताया।
क्या मिलेगा सम्मान?
ये कानून आधी आबादी को केवल आर्थिक मदद नहीं देगा, बल्कि सम्मान देगा। महिलाएं अब अपने पसीने को सरकारी दफ्तरों में पहचान दिला सकेंगी। वे केवल ‘खेतिहर मजदूर’ नहीं, बल्कि किसान कहलाएंगी।
बता दें कि पिछले 75 सालों में कोई भी सरकार महिला किसान को अलग पहचान नहीं दे पाई थी। अगर ये विधेयक पास होता है, तो पूरा देश इसकी नकल करेगा।
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